आत्महत्या के आंकड़ों पर विवाद

  • 30 जनवरी 2011
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Image caption किसान संगठनों आंकड़ों को कम बताते हैं

राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के हिसाब से वर्ष 2009 में छत्तीसगढ़ में 1802 किसानों ने आत्महत्या की है. लेकिन इन आंकड़ों पर अब विवाद खड़ा हो गया है.

जहाँ कृषि संबंधित मामलों के जानकार मानते हैं कि छत्तीसगढ़ से संबंधित ये आंकड़े वर्तमान 1802 से भी ज़्यादा हो सकते हैं क्योंकि इस तरह की आत्महत्याओं का सही ढंग से आकलन नहीं किया जा रहा है.

उधर अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक रामनिवास का कहना है, "छत्तीसगढ़ में एक भी किसान ने कृषि संबंधित परेशानी के कारण आत्महत्या नहीं की है. राष्ट्रीय क्राइम रिकार्ड ब्यूरो ने ग्रामीण इलाकों में हुई आत्महत्याओं को किसानों की आत्महत्या मान लिया गया है."

पुलिस की ओर से थाना स्तर पर जिस तरह आत्महत्याओं के मामले निपटाए जाते हैं उससे उनके वास्तविक कारणों का पता नहीं चल पाता है. क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के यह आंकड़े राज्यों की पुलिस की ओर से ही भेजे जाते हैं.

संकलन

छत्तीसगढ़ में भी इन आंकड़ों का संकलन अपराध अनुसंधान विभाग करता है. पुलिस के थाने एक पुराने छपे हुए फ़ार्मूले पर ही आत्महत्याओं का संकलन करते हैं.

राज्य के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक रामनिवास कहते हैं कि थानों में छपा हुआ एक प्रारूप होता है जिसमें केवल अंकित किया जाता है कि आत्महत्याओं का कारण क्या है.

उदहारण के तौर पर उनका कहना है कि अगर किसी की आत्महत्या बीमारी की वजह से होती है तो पुलिस अधिकारी फ़ार्म में लिखे बीमारी के कालम के सामने निशान लगा देते हैं.

ग़ौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में आत्महत्या करने वालों में से 33 प्रतिशत किसान हैं. राज्य सरकार मानती है कि आत्महत्याओं से संबंधित आंकड़े सही नहीं हैं.

रामनिवास कहते हैं कि इन आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया है. उधर किसानों से जुड़े संगठनों का मानना है कि आत्महत्याओं को कम करके आँका गया है.

एक किसान संगठन 'छत्तीसगढ़ एग्रीकान' से जुड़े संकेत ठाकुर कहते हैं, "ये कहीं नहीं बताया जाता है कि आत्महत्या करने वाले ने आर्थिक कारणों से ऐसा किया है. गंभीर बात यह है कि अधिकतर मामलों में पुलिस अन्य कारणों का उल्लेख करते हुए मामले का निपटारा कर देती है. किसानों की आत्महत्या का एक सबसे बड़ा कारण है आर्थिक तंगी. जबसे किसानों की आत्महत्या के मामले उजागर होने लगे तबसे पुलिस ने किसानी की वजह से आत्महत्या के खाने को एक तरह से हटा ही दिया है. उसकी जगह पर अब लिखा जाता है - "अज्ञात कारणों" से आत्महत्या."

समीक्षा

उनका कहना है कि अज्ञात कारण, मानसिक असंतुलन और बीमारी ही मुख्य तौर पर पुलिस के प्रतिवेदनों में बताया जाता है. उनका कहना है कि जो किसान दूसरों के खेतों में काम करते हैं और अगर वे आत्महत्या करते हैं तो पुलिस उन्हें किसान नहीं बल्कि मज़दूरों की श्रेणी में रखती है.

ठाकुर कहते हैं, "कृषि मज़दूर की मौत को किसान की मौत नहीं माना जाता. पुलिस कह देती है कि बेरोज़गारी की वजह से आत्महत्या की है. सरकार इस चीज़ को दबाना चाहती है की किसान खेती में हो रहे घाटे की वजह से आत्महत्या कर रहे हैं."

किसानों की आत्महत्या के मामले में शोध कर चुके पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी का कहना है कि उन्होंने अपने अध्ययन में 100 मामलों की प्रमुख रूप से समीक्षा की था.

उनका कहना है, "छत्तीसगढ़ में हो यह रहा है कि किसान की आय लगातार कम हो रही है और उसके ख़र्च बढ़ रहे हैं. किसान को कोई भी बीमारी होती है और अगर वह उससे हताश होकर आत्महत्या करता है तो उसे बीमारी की श्रेणी में रखा जाता है."

वे कहते हैं कि जिस तरह से महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और तमिलनाडु में किसानों की आत्महत्याओं पर अध्ययन हो रहा है वैसा छत्तीसगढ़ में भी होना चाहिए.

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