'हम वहीं खड़े होंगे जहाँ से चले थे'

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सरकार ने चुनाव सुधार पर एक और कमेटी बना दी है. इस ख़बर से न कोई हैरानी होती है, न किसी के मन में डर पैदा होता है न ही कोई आस बंधती है.

लोक और तंत्र के बीच गहराते फासले को कागजी रपटों से पाटने की कई कवायद पहले भी हो चुकी हैं. इस नई कवायद में फिलहाल ऐसा कुछ नहीं है जिससे कुछ नया होने की कोई उम्मीद हो.

न तो विधि मंत्री वीरप्पा मोइली पर आज तक कोई ज़ोखिम भरा काम करने का आरोप लगा है. न ही विधि मंत्रालय, सरकार और चुनाव आयोग के बाबुओं से भरी इस समिति से किसी हिम्मत की उम्मीद करना ठीक होगा.

समिति में एक-दो समझदार विधि विशेषज्ञ ज़रूर हैं, लेकिन चुनावी राजनीति केवल क़ानूनी सवाल नहीं हैं. समिति में एक भी शख्स ऐसा नहीं जिसने खुद चुनाव लड़ा हो या जिसे चुनावी राजनीति की कोई समझ हो.

इन सब के बावजूद भी इस समिति की कारगुज़ारी पर एक नज़र रखने की ज़रूरत है.

चुनाव सुधार पर चर्चा का मिजाज़ भले ही न बदला हो, उसका संदर्भ ज़रूर बदला है. पिछले कुछ सालों से देश में लोकतांत्रिक सुधारों के लिए प्रतिबद्ध नागरिकों का एक आंदोलन बन रहा है.

यह आंदोलन कभी-कभी राजनीतिक द्वेष की बीमारी का शिकार हो जाता हैं. फिर भी कुल मिलाकर इनके प्रयास से लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्थक बदलाव की गुंजाइश बढ़ी है.

राजकीय कोष

इन प्रयासों का सत्ता के शिखर पर भी कुछ असर होता दिखता है. बुराड़ी में कांग्रेस राष्ट्रीय समिति को संबोधित करते समय सोनिया गाँधी ने चुनाव के लिए राजकीय कोष के सुझाव पर अपनी मुहर लगाई थी.

पिछले कुछ समय से राहुल गाँधी ने युवा कांग्रेस में खुले आतंरिक चुनाव की प्रक्रिया चलाई है. पिछले हफ़्ते यह घोषणा भी की है कि इन संगठनों के शीर्ष पदों के लिए मनोनयन की कांग्रेसी रवायत की जगह खुले चुनाव होंगे. सरकार द्वारा इस समिति के गठन को भी इसी संदर्भ में देखने की ज़रूरत है.

Image caption कांग्रेस के सम्मेलन में सोनिया गांधी ने चुनाव के लिए राजकीय कोष के सुझाव पर अपनी मुहर लगाई थी.

वैसे तो इस समिति ने अपने एजेंडा में वो सब विषय शामिल किए हैं जिनपर चर्चा होनी चाहिए. चुनावों में बढ़ता धन और बल का असर, राजनीतिक दलों को मर्यादित करने की ज़रूरत, चुनाव में राजकीय कोष, चुनावी प्रक्रिया को ज़्यादा सुचारू बनाना, चुनावी विवादों का बेहतर निपटारा, दलबदल विरोधी क़ानून को बेहतर बनाना.

पिछले दो दशक से चुनावी सुधारों की कवायद इन्हीं मुद्दों के इर्द-गिर्द हो रही है. समिति ने कहा है कि वह संवैधानिक व्यवस्था में बुनियादी बदलाव के किसी प्रस्ताव पर गौर नहीं कर रही है.

एक मायने में ठीक ही है चूंकि इससे अनुपातिक व्यवस्था जैसे प्रस्तावों पर ज़्यादा बहस नहीं होगी. ऐसे प्रस्तावों से पूरी बहस पटरी से उतर जाती है. लेकिन फ़िलहाल यह भी साफ़ नहीं है कि यह समिति पुराने मुद्दों पर घिसी पिटी बातों से आगे कैसे बढ़ पाएगी.

काला धन

चुनाव में पैसे के सवाल को ही लें. हर कोई यह मान कर चलता है कि राजनीति में असली समस्या काले धन के असर को रोकना है. इसलिए सारा ध्यान काले धन पर पाबंदी लगाने वाले क़ानूनों पर रहता है. अगर ये क़ानून असरदार हो पाएं तो ज़रूर कुछ फ़ायदा होगा.

लेकिन काले धन को रोकना सिर्फ चुनावी क़ानूनों और चुनाव आयोग के बस की बात नहीं है. यह मामला पूरी आर्थिक व्यवस्था को बदलने का है.

ऐसे किसी बदलाव के अभाव में चुनाव में काला धन रोकने वाले क़ानून सिर्फ कागज़ी शेर बन कर रह जाते हैं. बल्कि चुनावी खर्च पर लगाने वाली अव्यवहारिक बंदिशें हर चुने हुए प्रतिनिधि को झूठ बोलने पर मजबूर करती हैं.

आए दिन चुनावी खर्च का हिसाब देने के 'कड़े' नियम ईमानदार और गरीब उम्मीदवारों की नाक में दम कर देते हैं.

इस सवाल पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है. धन बल के असर को कम करने के लिये पहले कदम के बतौर ज़रूरत से ज़्यादा खर्च रोकने की बजाय ज़रूरी खर्चा सभी उम्मीदवारों को उपलब्ध करवाने की ज़रूरत है.

राजनीति में 'ब्लैक' को रोकने से पहले पर्याप्त मात्रा में 'व्हाइट' का इंतज़ाम करना ज़रूरी है. राजकीय कोष से चुनाव खर्च का प्रस्ताव इसी दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है.

इससे ब्लैक रुकेगा नहीं. यह संभव है कि काले धन के मालिकों को कुछ और पैसा भी मिल जाए. लेकिन इसका असल फ़ायदा यह होगा कि जनाधार वाले साधारण कार्यकर्ताओं और नेताओं को अपनी पार्टी से टिकट मिलने की संभावना बढ़ेगी. अगर टिकट ना भी मिले तो थैलीशाहों के बरक्स ईमानदार उम्मीदवारों को चुनाव में उतरने की हिम्मत बढ़ेगी. आशा करनी चाहिए कि यह नयी समिति इस सवाल पर एक नई दृष्टि से गौर करेगी.

चुनाव व्यवस्था में सुधार करने वालों को कम से कम यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके सद्प्रयासों से हालात पहले से बदतर न हो जाएँ. दलबदल विरोधी कानून इस लिहाज से एक नजीर बन सकता है.

Image caption काले धन को रोकना एक बड़ी चुनौती होगी.

जब यह क़ानून बना था तो सब किस्म के सुधारकों ने इसका स्वागत किया था. फिर जब इससे थोक का दल बदल नहीं रुका तो इस कानून को और कड़ा बनाने की मांग उठी. और ऐसा हो भी गया. कुल मिलकर नतीजा यह निकला है कि एक बीमारी कम हुई लेकिन एक नई बीमारी पैदा हो गई.

नए दल-बदल कानून का नतीजा यह हुआ है कि दलों पर हाइकमान की गिरफ़्त मजबूत हो गई है. किसी सांसद विधायक की मज़ाल नहीं कि वह पार्टी नेतृत्व का विरोध करे. साथ ही संसद और विधान सभाओं में होने वाली बहसें बेमानी हो गई हैं.

बाहुबली

चुनाव में बाहुबलियों के असर को कम करने के सदप्रयासों की भी यही गति हो सकती है.

ले-देकर इस विषय पर चुनाव सुधार के प्रस्ताव 'आपराधिक पृष्ठभूमि' के उम्मीदवारों पर पाबंदियां लगाने पर सिमट जाते हैं. यानि वो उम्मीदवार जिनके खिलाफ़ कचहरी में मामले दर्ज हैं या चार्जशीट दाखिल हो चुकी है.

ज़मीनी राजनीति कि जानकारी रखने वाला हर व्यक्ति जानता है कि स्थानीय दबदबे के चलते सचमुच बड़े दबंग लोगों के खिलाफ़ मामले दर्ज नहीं होते हैं. उधर देश भर में तमाम ईमानदार सामाजिक और राजनैतिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ झूठे मुकदमों की कमी नहीं है. यह संभव है कि सिर्फ कानूनी बंदिशों को कड़ा करने भर से बाहुबली तो फसेंगे नहीं, राजनीति में बचे खुचे ज़मीनी कार्यकर्ता का रास्ता और कठिन हो जाएगा.

समिति के एजेंडे को पढ़ने से कुछ चिंताओं को बल मिलता है. ऐसा लगता है कि यह समिति अपना समय उन वाहियात सुझावों पर गौर करने में लगाएगी जो यदा कदा राजनीति से अनजान विशेषज्ञ या चुनाव आयोग के बाबू लोग दिया करते हैं.

मसलन चुनावों में उम्मीदवारों और पार्टियों की संख्या कैसे घटाई जाए, चुनावी प्रचार पर पाबंदियां कैसे कड़ी की जाएँ. इस किस्म की लोकतंत्र विरोधी बातों का एजेंडा में आना भी चिंता का विषय है.

उधर समिति ने अब तक कुछ गंभीर विषयों पर विचार करने की कोई इच्छा शक्ति नहीं दिखलाई है.

मसलन चुनावों में मीडिया तंत्र के दुरुपयोग पर पाबंदी कैसे लगे? राजनीति में चंद पार्टियों के एकाधिकार को कैसे तोडा जाए? यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि पार्टियाँ अपनी टिकट बांटते समय अपने सदस्यों और कार्यकर्ताओं की राय सुनने पर मजबूर हों? चुनावी वादों के लिये नेताओं और पार्टियों कि जवाबदेही कैसे मजबूत की जाये? इन सवालों को उठाए बिना चुनावी सुधार कि कवायद तो हो जाएगी लेकिन लोकतांत्रिक बदलाव कि गुंजाइश नहीं बनती.

यूं तो आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए, लेकिन चुनाव सुधार पर बनी यह नवीनतम समिति जिस नक़्शे-कदम पर चल रही है उससे संभावना यही बनती है कि इस कवायद के बाद हम वहीं खड़े होंगे जहाँ से चले थे.

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