'मोदी पर सवाल, पर सबूत नहीं'

Image caption नरेंद्र मोदी पर पहले भी गुजरात में हुए दंगों में पक्षपातपूर्ण भूमिका अपनाने का आरोप लगता रहा है.

जानी मानी पत्रिका तहलका ने दावा किया है कि उसके पास गुजरात में 2002 में हुए दंगों की जांच कर रही विशेष जांच टीम की रिपोर्ट है.

तहलका के मुताबिक़ इस रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य सरकार और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्थिति को गंभीरता से नहीं लिया लेकिन मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ मामला बनाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं.

विशेष जांच टीम यानी एसआईटी ने अपनी जांच रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के समक्ष 12 मई 2010 को रखी थी जो अभी सार्वजनिक नहीं हुई है.

इस रिपोर्ट में एसआईटी के चेयरमैन आरके राघवन लिखते हैं, ''हमने कुल 32 मामलों में आरोपों की जांच की. इसमें हमने पाया कि कई मामलों में राज्य सरकार और राज्य सरकार से जुड़े लोगों, मुख्यमंत्री ने ऐसे काम किए जो ग़लत दिख सकते हैं लेकिन इन मामलों को साबित करने के लिए पर्याप्त चीज़ें नहीं है जिससे क़ानून के तहत उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जा सके.''

तहलका ने अपनी वेबसाइट पर दी गई ख़बर में एसआईटी रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि नरेंद्र मोदी ने गुलबर्ग सोसाइटी, नरोडा पाटिया और अन्य स्थानों पर मुस्लिमों पर हुए हमलों की गंभीरता को यह कहते हुए कम कर दिया कि हर ऐक्शन का बराबर और उलटा रिऐक्शन होता है.

रिपोर्ट के अनुसार जांच अधिकारी लिखते हैं, "‘जब राज्य में सांप्रदायिक हिंसा का माहौल था तब मोदी ने न तो गोधरा के बाद हुए दंगों की कड़ी आलोचना की और न मुस्लिम समुदाय के बेकसूर लोगों के मारे जाने को किसी न किसी तरह उचित ठहराया."

पत्रिका के अनुसार एसआईटी प्रमुख राघवन रिपोर्ट में लिखते हैं कि मोदी का यह कहना बहुत ही आक्रामक और ग़लत था कि गोधरा और उसके आसपास के लोगों में आपराधिक भावना है, वो भी ऐसे समय जब राज्य में हिंदू-मुस्लिम तनाव चरम पर था.

रिपोर्ट आगे कहती है कि गुजरात सरकार ने दंगों के दौरान दो वरिष्ठ मंत्रियों अशोक भट्ट और आईके जडेजा को अहमदाबाद और राज्य पुलिस कंट्रोल रुम की ज़िम्मेदारी देने का ‘विवादास्पद’ फ़ैसला किया.

इन दोनों मंत्रियों के काम की कोई परिभाषा नहीं दी गई जिससे इन अफ़वाहों को बल मिला कि वो पुलिस के काम में हस्तक्षेप करने और मौक़े पर तैनात पुलिसवालों को ग़लत निर्देश देने आए हैं.

तहलका की ख़बर में एसआईटी रिपोर्ट से 13 प्रमुख बिंदु उठाए गए हैं.

सवाल

रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि की गई है कि जिन अधिकारियों ने दंगों के दौरान निष्पक्ष बर्ताव अपनाया उनका बाद में ट्रांसफर किया गया. राघवन लिखते हैं कि इन ट्रांसफरों पर प्रश्नचिन्ह लगता है क्योंकि ये फ़ैसले घटना के तुरंत बाद किए गए और जिन अधिकारियों को ट्रांसफर किया गया उनसे पार्टी के सदस्य नाराज़ थे.

रिपोर्ट कहती है कि गुज़रात सरकार ने दंगों से पहले वायरलेस पर दिए गए सारे संदेशों को नष्ट कर दिया. दंगों के दौरान होने वाली बैठकों के मिनट्स और आदेशों का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा गया है.

एसआईटी रिपोर्ट कहती है कि मुख्यमंत्री मोदी ने अहमदाबाद में दंगा प्रभावित इलाक़ों (जहां मुस्लिमों की मौत हुई थी) का दौरा नहीं करके भी भेदभाव के रवैए का परिचय दिया जबकि वो 300 किलोमीटर की यात्रा करके गोधरा उसी दिन गए जिस दिन गोधरा में ट्रेन में आग लगी थी.

एसआईटी की रिपोर्ट इस बात की पुष्टि भी करती है कि राज्य सरकार ने कई संवेदनशील दंगा मामलों में वकील के रूप में विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोगों की नियुक्ति की. रिपोर्ट के अनुसार दंगा मामलों में सरकारी वकीलों की नियुक्ति में राजनीतिक पृष्ठभूमि का काफ़ी ज़ोर रहा.

रिपोर्ट के अनुसार राज्य सरकार ने 28 फरवरी को विश्व हिंदू परिषद के अवैध बंद को रोकने की कोशिश नहीं की. इतना ही नहीं मुख्यमंत्री की पार्टी भाजपा ने बंद का समर्थन भी किया.

तहलका का कहना है कि कई अख़बारों में ये ख़बर छपी थी कि एसआईटी की रिपोर्ट में नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दी गई है लेकिन किसी के पास ये रिपोर्ट नहीं थी. तहलका के अनुसार उनके पास 600 पन्नों की ये रिपोर्ट है.

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