मैं शांति चाहता हूँ: रमन सिंह

  • 13 फरवरी 2011
रमन सिंह
Image caption छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह कहते हैं कि नक्सल समस्या विकास में बाधा बनी हुई है

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह से दिल्ली से पहुंचे कुछ पत्रकारों से राज्य के विकास और नक्सल समस्या पर चर्चा की.

बातचीत में रमन सिंह ने कहा कि राज्य की आर्थिक विकास दर देश में सबसे ज़्यादा है पर नक्सल समस्या गले की फांस बनी हुई है. बातचीत के प्रमुख अंश.

छत्तीसगढ़ को आप कैसे देखना चाहते हैं?

इस राज्य को बने दस साल हो गए है. यहां पिछले पांच वर्षों में आर्थिक विकास दर 10.4 की औसत रही है. इस साल विकास दर गुजरात से ज़्यादा है और देश में सबसे अधिक 11.47 रही है. अगले साल ये और अधिक होगी.

देश में कृषि विकास दर का लक्ष्य 2.3 है वही राज्य में ये 4.9 प्रतिशत है और अगले साल कृषि विकास दर छह प्रतिशत होने का अनुमान है. औद्योगिक विकास दर भी अच्छी है, सर्विस क्षेत्र में हम थोड़ा पिछड़े हैं.

हमारे बजट का 65 प्रतिशत हिस्सा खुद का है जो देश के लिए एक मिसाल है. हमने वित्तीय अनुशासन बनाए रखा है.

हमारे राज्य में अनुसूचित जाति और जनजाति की आबादी 44 प्रतिशत है और बजट का 45 प्रतिशत हम इनपर खर्च करते हैं. हमारी विश्वसनीयता इतनी है कि कोई भी हमें पैसा देने को तैयार है. हमारी नई राजधानी के लिए भी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के ज़रिए पैसा आ रहा है.

नक्सल समस्या के मद्देनज़र राज्य सरकार को सुरक्षा पर बड़ी रक़म खर्च करनी पड़ रही है और सुरक्षाकर्मियों की संख्या भी बढ़ रही है. क्या आप इस से निजात पाना नहीं चाहते?

मैं तो हमेशा बोलता हूँ और आज भी बोलता हूँ, मेरा (सुरक्षा पर) 300 करोड़ का बजट 1200 करोड़ का हो गया है, मुझे पसंद नहीं है कि मै बजट बढ़ाता जाऊं. मै तो चाहता हूँ कि शांति हो और सारा पैसा विकास में लगे काहे बंदूक गोली में लगे.

मैं हर हफ्ते नक्सल प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करता हूँ और उनसे (नक्सलियों से) पूछता हूँ कि तुम्हारी समस्या क्या है --सरकार से या डॉ रमन सिंह से. आमने सामने बैठो न, मेरी शक्ल पसंद नहीं तो दूसरा आ जाएगा, मेरी सोच पसंद नहीं तो दूसरी आ जाएगी.

पर तुम क्या चाहते हो चालीस वर्षों से ये बताओ. भूमि सुधार चाहते हो हम कर रहे है, पट्टा बांटना है तो दो लाख को हमने बांट दिया, चावल देना है तो हम दे रहे हैं, तेन्दू पत्ते का 100 प्रतिशत भाव दे रहे है. जंगल उपज का अधिकार उनको दे दिया है.

आखिर आप चाहते क्या हो? मेरे बजट का 45 प्रतिशत सोशल सेक्टर में खर्च हो रहा है.

क्या सेना अबुजमाढ़ में प्रशिक्षण शिविर स्थापित कर रही है?

सेना को प्रशिक्षण के लिए जगह चाहिए. तीन चार जगह उन्होंने देश में देखी हैं. छत्तीसगढ़ में भी दो तीन जगह देखी हैं. यहां कोई फायरिंग वगैरह के लिए नहीं पर प्रशिक्षण के लिए जगह ढ़ूंढ़ रहे है. अब वो स्वयं तय करेंगे कि छत्तीसगढ में ये जगह होगी या बाहर जाना चाहते हैं.

नक्सल समस्या के लिए आर्मी का उपयोग न अभी है न बाद में होगा.

नक्सल समस्या का निदान कब होगा?

होगा. इसमे समय लगेगा. ये समस्या आज की नहीं है इसे 40 साल हो गए है. जब में पहली बार सात साल पहले उनके इलाके में गया तो मुझे लगा कि उन्होंने लोगों को बंधक बना के रखा है.

आप उनके बच्चों को 12 साल की उम्र में बंदूक पकड़ा देते हो, स्कूल नहीं बनने देते, अस्पताल नहीं बनने देते, सड़क नहीं बनने देते. सवाल ये है कि चाहते क्या हो. क्या केवल शासन पर कब्ज़ा करने के लिए है, तो ये निरर्थक पहल है.

तीस पैंतीस साल की क्रांति से बस्तर को क्या मिला. अठारहवी सदी में जीने को अगर वो मजबूर हैं, स्कूल और सड़क नहीं बन रहे, बीआरओ की एक सड़क पिछले 12 वर्षों से नहीं बन पाई है. इससे किसको फ़ायदा है.

मेरे बस्तर के लोगों को तो इससे फ़ायदा नहीं है. आप लोकतांत्रिक तरीके से हटाओ किसी को अगर आपको लगता है कि जनमत आप के साथ है, तो आप सामने आओ चुनावी मैदान में और कहो कि मै सबसे अच्छा हूँ.

क्या आपने नक्सलियों से बातचीत की कोई पहल की है?

पिछले दस वर्षों से चंद्रबाबू नायडू ने फिर राजशेखर रेड्डी ने की है. बातचीत किससे, कब और कहा.. कोई विषय होना चाहिए—मसलन सरकार भूमि सुधार करे, उनके खेत ठीक करे, शिक्षा, स्वास्थ्य पर ध्यान दे. लोगों के यही तो मुद्दे है और बस्तर के भी यहीं मुद्दे हैं.

हम इसके लिए लड़ रहे है, मेरी लड़ाई कुपोषण से है, बाल मृत्यु दर कम करने से है. मैं काहे बंदूक चलाऊंगा. मेरे जैसा अहिंसक आदमी, मैने जीवन में किसी को झापड़ नहीं मारा है, तो मैं काहे लडूंगा.

आप इस देश की संविधान को मानो, प्रक्रियाओ को मानो फिर बातचीत करो या उसके पहले बता दो कि क्या चाहते हो. ऐसा तो नहीं चल सकता कि आप दंतेवाड़ा नहीं जा सकते, बीजापुर नहीं जा सकते, अबुजमाढ़ नहीं जा सकते, जनगणना नहीं हो सकती, मतदान नहीं हो सकता. बुलैट को छोड़ बैलट अपना लीजिए.

उनका आरोप है कि आप उद्योग की मदद करते है, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मदद करते है?

आप बता दे बस्तर के इलाक़े में कौन सा उद्योग है, कौनसी मल्टीनेशनल कंपनी है, किस बहुराष्ट्रीय कंपनी ने पिछले 50 वर्षों में वहां से एक किलो भी लोह अयस्क निकाला है.

नेशनल मिनरल डेवलप्मेंट कॉर्परेशन (एनएमडीसी) पिछले 30 वर्षों से आयरनओर का विदेश निर्यात कर रहा हैं, हम कह रहे है इसे बाहर मत भेजो यही इस्तेमाल करो तो इसमे क्या ग़लत है.

लड़कों को रोज़गार मिलेगा आर्थिक सुधार आएगा और पत्थर को बेच के कोई पैसा कमाता है क्या -- आप स्टील बनाइए. बस्तर में सरकारी कंपनियां ही काम कर रही है. टाटा को ठेका दिया है पर अभी वो माइनिंग नहीं कर रहे. अभी प्रोस्पेरक्टिंग स्टेज में है.

क्या आप बस्तर के घने जंगलों को सुरक्षित रखना चाहते हैं या फिर खदानों से कमाई करना चाहते हैं?

बस्तर के जंगलो को कोई छू भी नहीं सकता. जहां माइन्स है वहा सभी नियमों का पालन हो रहा है, पर्यावरण क्लियरेंस आदि की ज़रुरत है. मैं चाहता हूँ कि हम ये तय कर ले कि क्या कोयला और आयरनओर निकालना हमेशा के लिए बंद हो जाए.

क्या देश को बिजली की ज़रुरत नहीं है, स्टील की ज़रुरत नहीं है, ये तो भारत सरकार तय करती है कि किसे कहा माइन देनी है.

अच्छा क़ानून बनना चाहिए और देश को तय करना है कि उसे बिजली, स्टील और सीमेंट चाहिए या नहीं. मेरे पास तो 30 साल की बिजली है. मुझे फर्क नहीं पड़ता है.

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