लोकतंत्र का नया शास्त्र गढ़ना होगा

  • 28 फरवरी 2011
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Image caption लोकतंत्र के इस नए शास्त्र को गढ़ने में भारत एक विशिष्ट भूमिका अदा कर सकता है.

पहले टुनिशिया, फिर मिस्र और अब लीबिया, तो क्या लोकतंत्र की बयार अरब दुनिया तक पंहुचेगी? लोकतंत्र के ठेकेदार बड़ी मासूमियत से यह सवाल पूछते हैं.

इस सवाल में संदेह का बीज छुपा है कि क्या मुस्लिम समाज अपने आप को आधुनिक लोकतान्त्रिक व्यवस्था के अनुरूप ढाल पायेगा?

लोकतंत्र के हर पश्चिमी विशेषज्ञ के पास इन दकियानूसी समाजों को लोकतान्त्रिक बनाने के नुस्खे हैं. यहाँ लोकतंत्र का भविष्य जो भी हो, लोकतंत्र के पंडे-पुजारियों का भविष्य बहुत उज्ज्वल है. चाहे काशी हो, अजमेर शरीफ या फिर रोम, इस दुनिया का हर पवित्र विचार देर-सबेर एक व्यवसाय बन जता है.

पंडों की फ़ौज के साथ एक प्रतिष्ठान उसपर काबिज़ हो जाता है. यही लोकतंत्र के साथ हुआ है.

गोरी दुनिया ने लोकतंत्र के विशेषज्ञों की एक फ़ौज तैयार कर रखी है. जैसे ही तख्ता पलट की गर्द छंट जायेगी और हवाई अड्डे सुरक्षित हो जायेंगे, वैसे ही ये ‘रायबाज़’ टिड्डियों के दल की तरह उतरने लगेंगे.

विचार बनाम व्यवसाय

देश का नाम भले ही न जानते हों, उसे लोकतान्त्रिक संविधान का खाका बनाकर देने के लिये तत्पर रहेंगे.

जीवन में एक दिन भी चाहे राजनीति न की हो, राजनीतिक दलों को प्रशिक्षण देना शुरू कर देंगे. बड़े होटलों में भले सेमिनार शुरू हो जायेंगे. जाहिर है इस धंधे में ज्यादा सोचने की गुंजाइश नहीं रहती. विचार बने-बनाए हैं और दृष्टी सुस्थिर.

उत्तरी अफ्रीका और पश्चिमी एशिया को ‘मध्य-पूर्व’ कहने की रवायत इस दृष्टी का परिचायक है.

अगर भारत से देखें तो इस क्षेत्र को ‘मध्य-पश्चिम’ कहना चाहिए. निगाह दक्षिण अफ्रीकी हो तो यह ‘उत्तर कहलायेगा और अगर लातिन अमरीका के देश चिली में बैठे हों तो ‘पूर्वोत्तर’.

सिर्फ यूरोप में बैठकर ही इस इलाके को ‘मध्य-पूर्व’ कहा जा सकता है ! यह दृष्टीदोष लोकतंत्र के स्थापित शास्त्र में घुस गया है.

यानि ‘कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना’, मसला दुनिया भर का है, लेकिन दृष्टी यूरोपीय ही है.

लोकतंत्र के नाम पर अश्वेत दुनिया को यूरोप और उत्तरी अमरीका की जीवन शैली दिखाई जा रही है, पश्चिमी उदारवार की घुट्टी पिलाई जा रही है, पूँजीवाद की व्याकरण सिखाई जा रही है.

आकाँक्षाओं का विस्फोट

तानाशाही या राजतन्त्र तले पिस रही जनता के विद्रोह और उसकी आकाँक्षाओं के विस्फोट को एक विशेष दिशा में मोड़ा जा रहा है.

अगर जनता इस तयशुदा मॉडल के हिसाब से विद्रोह करने को तैयार न हो तो उसे बन्दूक की नोक से तोड़ा जा रहा है.

इराक़ और अफ़गानिस्तान की तरह दुनिया के कई इलाकों में लोकतंत्र राजनैतिक स्वतंत्रता की जगह पराधीनता का पर्याय बन चुका है. लोकतंत्र का स्थापित शास्त्र यह मान कर चलता है कि लोकतंत्र का विचार दुनिया को पश्चिमी सभ्यता की सौगात है.

दुनिया भर में नागरिक शास्त्र की पाठ्यपुस्तकें प्राचीन एथेन्स और अब्राहम लिंकन के हवाले से लिखी जाती हैं.

इसे स्वयं सिद्ध मान कर चलती हैं कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था का मतलब है कमोबेश वही संस्थागत ढांचा जैसा कि यूरोप और अमरीका के लोकतान्त्रिक समाजों ने अपनाया.

इस ढांचे में चुनाव हैं, प्रतिनिधि हैं, संसद है, उसके प्रति जवाबदेह सरकार है, कोर्ट-कचहरी है और अधिकारों की रक्षा करने वाला लिखित संविधान भी है.

लेकिन लोक और तंत्र के बीच बनी खाई तो पाटने की कोई व्यवस्था नहीं है, स्वराज कि कोई गारंटी नहीं है.

अंतरराष्ट्रीय चौकीदार

लोकतंत्र की इस समझ के चलते दुनिया भर में लोकतंत्र के नाम पर खानापूरी वाले निजाम कायम हो रहे हैं.

स्वाधीनता की आकांक्षा को जल्द ही एक बने बनाए खांचे में ढाल दिया जाता है. अंतरराष्ट्रीय चौकीदारों की उपस्थिति में चुनाव हो जाते हैं.

जो तबका कल तक तानाशाही या राजतन्त्र के नाम पर राज कर रहा था, उसी तबके के कुछ नए चेहरे अब लोकतंत्र के नाम पर राज करने लगते हैं.

नए राज में जनता की आवाज़ सुनी जाती है या नहीं, इसकी किसे परवाह है. बस खेल ख़त्म, डॉलर हज़म.

अभी से हम नहीं कह सकते कि मिस्र, टुनिशिया और लीबिया में यही होगा. लेकिन अगर पूरी दुनिया में लोकतंत्र विस्तार की कहानी को देखें तो यही संभावना सबसे अधिक है. यह त्रासदी अपने भयावह स्वरुप में इराक़ और अफ़गानिस्तान में देखी जा सकती है.

लोकतंत्र के इस नाटक में लोगों को न तो स्वराज मिला न ही सुशासन, बल्कि जो रहा सहा राज-काज और अमन था वो भी जाता रहा.

जब सोवियत संघ के टुकडे़ हुए, उसके अधिकाँश देशों में भी लोकतंत्र का ढकोसला हुआ, तरह तरह की लोकतान्त्रिक तानाशाहियाँ स्थापित हुईं, लोकतंत्र का इस्तेमाल एक बर्बर पूंजीवादी व्यवस्था को लादने के लिए किया गया.

लोकतंत्र का परचम

नतीजतन लोकतंत्र का परचम अपनी आभा खो बैठता है.

लोकतंत्र की हिमायत करने वाला एक छोटा सा आधुनिकता-पसंद अभिजात्यवर्ग होता है. लेकिन जनता जनार्दन इस विचार से जुड़ नहीं पाती है.

पाकिस्तान में पंजाब सूबे के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या इस अलगाव की एक नवीनतम मिसाल है.

उदारपंथी सलमान तासीर यूं तो अल्पसंख्यक समुदाय के लोकतान्त्रिक अधिकारों की रक्षा के लिये शहीद हुए. लेकिन उनके हत्यारे के समर्थन में पाकिस्तान में स्वतस्फूर्त जुलूस निकले, हजारों आम लोगो ने हत्यारे के साथ सहानुभूति जताई.

दूसरे देशों में इस अलगाव का फायदा उठाकर शासक लोग यह दावा करते हैं कि लोकतंत्र का विचार एक विदेशी विचार है.

सिंगापुर के पूर्व-शासक ली क्वान यु तो सरेआम कहते थे कि लोकतंत्र का विचार एशिया की संस्कृति के अनुरूप नहीं है.

एक नया शास्त्र

लोकतंत्र की पश्चिमी ठेकेदारी इस खूबसूरत सपने का दम घोंट रही है. कहने को दुनिया भर में लोकतंत्र फैल रहा है.

हर शासक लोकतान्त्रिक होने का तगमा लटकाना चाहता है. लेकिन लोकतंत्र के विचार को इकहरा बनाये रखने की ज़िद इसे सार्वभौमिक होने से रोकती है. इसलिए जो लोग लोकतंत्र को सचमुच सार्वभौमिक विचार के रूप में स्थापित करना चाहते हैं उन्हें लोकतंत्र के नया शास्त्र गढ़ना होगा.

यह शास्त्र प्राचीन यूनान के साथ साथ उन तमाम धाराओं और उपधाराओं की शिनाख्त करेगा जो आज लोकतंत्र के विचार का स्त्रोत हैं.

यह भारत में गणतंत्र की संस्था हो सकती है, बुद्ध संघ की परंपरा हो सकती है, इस्लाम में उम्मा कि परिकल्पना हो सकती है या फिर दुनिया भर में आदिवासी समाज के रीति-रिवाज.

बेशक इनमें से कोई भी परंपरा जैसी की तैसी लोकतान्त्रिक नहीं होगी, लेकिन कुछ अंश जरूर बहुमूल्य होंगे.

साथ ही साथ पश्चिम की लोकतान्त्रिक परंपरा की जाँच करके उसमे स्थानीय और सार्वभौम हिस्सों को अलग करना होगा. पश्चिम के लोकतान्त्रिक विचार की दुनिया भर में अलग अलग व्याख्या हुई.

आधुनिक लोकतंत्र

भारत, दक्षिण अफ्रीका और बोलिविया जैसे देशों ने पश्चिमी लोकतंत्र के ढांचे में ही अनूठे प्रयोग किये. आज यह सब एक वैश्विक विरासत का हिस्सा हैं. जिस मिस्र ने दुनिया को सभ्यता का पाठ पढाया, उसे आज लोकतंत्र का निर्माण करने के लिये नए सिरे से राजनीति का कायदा सीखने कि जरूरत नहीं है.

बेशक लोकतान्त्रिक मिस्र, दुनिया भर के लोकतान्त्रिक प्रयोग के सबक अपने सामने रखना चाहेगा.

जैसे मिस्र की सभ्यता आज पूरी दुनिया की विरासत है, वैसे ही मिस्र आधुनिक लोकतंत्र के अनुभव का वारिस है.

लेकिन मिस्र के लोकतंत्र में उसकी अपनी सभ्यता का ताना-बाना होगा, उसके अपने अनुभव का रंग होगा, उसके धर्म और मूल्यों की छाप होगी. लोकतंत्र के इस नए शास्त्र को गढ़ने में भारत एक विशिष्ट भूमिका अदा कर सकता है.

बशर्ते हम भारतीय लोकतंत्र के भारतीय स्वरुप को चिन्हित करने और उसे अपनाने का साहस कर सकें.

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