सेना से माड़िया जनजाति, खनिज संपदा को ख़तरा: माओवादी

  • 23 फरवरी 2011
माओवादी (फ़ाइल फ़ोटो) इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption छत्तीगसगढ़ के नारायणपुर ज़िले में सेना का प्रशिक्षण केंद्र बनाया जाना है

छत्तीसगढ़ के नारायणपुर ज़िले में सेना के एक प्रस्तावित प्रशिक्षण केंद्र को माओवादियों ने माड़िया जनजाति की सभ्यता, संस्कृति और जीवन-शैली के लिए ख़तरा बताया है.

उन्होंने आरोप लगाया है, "सेना की वहाँ मौजूदगी का असली मक़सद माड़िया जनजाति के नष्ट करना और उस इलाक़े के खनिज पदार्थों के दोहन का रास्ता साफ़ करना है."

बीबीसी के छत्तीगढ़ संवाददाता सलमान रावी के अनुसार बिलासपुर में थल सेना का एक केंद्र और नारायणपुर के ओर्छा ब्लाक में सैन्य प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने की एक योजना है. हालाँकि योजना कई साल पुरानी है लेकिन हाल में वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के इलाक़े का दौरा करने के बाद वहाँ भू-अधिगृहण के लिए कार्रवाई शुरु हुई है."

किसी समय विशाल बस्तर ज़िले का हिस्सा रहे नारायणपुर में माओवादियों की अच्छी ख़ासी मौजूदगी है और ये लोग वहाँ काफ़ी सक्रिय हैं. ग़ौरतलब है कि भारत सरकार ने फ़िलहाल कभी स्पष्ट तौर पर नहीं कहा है कि वह माओवादी हिंसा के ख़िलाफ़ सेना का इस्तेमाल करने जा रही है.

'कंपनियों, उद्योगपतियों की नज़रें टिकीं'

सीपीआई (माओवादी) की उत्तर बस्तर डिविज़नल समिति के प्रवक्ता राकेश ने बीबीसी को फ़ोन पर बताया, "समाजशास्त्री पहले ही ये मान चुके हैं कि माड़िया जनजाति की भाषा, संस्कृति, परंपरा, रीति-रिवाज़ को ख़तरा है. इसी के साथ बहुराष्ट्रीय कंपनियों और उद्योगपतियों की नज़र इस क्षेत्र के खनिज़ों पर है. इस क्षेत्र की संपदा यहाँ के लोगों की है, भारत की जनता की है और हम किसी को इसे लूटने नहीं देंगे."

माओवादी प्रवक्ता का कहना था कि 'प्रशिक्षण केंद्र तो केवल धोखा है और खनिज़ संपदा को लूटने के लिए, खदानों में काम शुरु करने के लिए सेना की तैनाती हो रही है.'

उनका कहना था कि अनेक सालों से जनता संघर्ष कर रही है ताकि बड़े पूँजीपतियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को इस संपदा से दूर रखा जाए.

राकेश का कहना था कि उस इलाक़े में प्रशिक्षण केंद्र की कोई ज़रूरत नहीं है और वैसे भी सेना देश की सीमाओं पर लड़ने के लिए होती है, अपने लोगों के ख़िलाफ़ के लिए नहीं.

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