उड़ीसा अपहरण: क्या कहते हैं मध्यस्थ ?

  • 23 फरवरी 2011
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Image caption अपहृत जिलाधिकारी विनील कृष्ण की रिहाई किसी भी क्षण संभव है

उड़ीसा के ज़िलाधिकारी आर विनील कृष्ण और एक जूनियर इंजीनियर पबित्र माझी के माओवादियों द्वारा अपहरण के बाद माओवादियों ने मानवाधिकार कार्यकर्ता जी हरगोपाल और प्रोफ़ेसर आरएस राव को सरकार के साथ बातचीत के लिए मनोनीत किया था.

चीन दिन तक चली बातचीत के बाद दोनों पक्षों के बीच चौदह माँगों पर सहमति बन गई और जी हरगोपाल ने बीबीसी के साथ विशेष बातचीत में बताया की सभी माँगें मान ली गई हैं.

उन्होंने बीबीसी संवाददाता अविनाश दत्त को फ़ोन पर बताया, "उड़ीसा सरकार के साथ जो हमारी बातचीत चली, वो संतोषजनक रही और हमारा मानना है कि अब इन लोगों को छोड़ दिया जाना चाहिए."

अपहृत डीएम की रिहाई का रास्ता साफ़ हुआ

हरगोपाल का कहना था, "चौदह माँगे थीं. इनमें कोरापुट, मलकानगिरी और उड़ीसा के अन्य हिस्सों में आदिवासियों के ख़िलाफ़ ज़मीन से संबंधित या फिर माओवाद से संबंधित जो भी मामले चल रहे हैं उन सभी पर 15 दिनों में पुनर्विचार होगा. उड़ीसा की सरकार पहले ही 9000 ऐसे मामले बंद कर चुकी है."

उनका कहना था कि अभी भी ऐसे 500 से 600 मामले लंबित पड़े हैं.

बीबीसी के साथ बातचीत में हरगोपाल ने स्पष्ट किया कि प्रमुख माओवादी नेता गांटी प्रसादम और सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति के एक सदस्य की पत्नी पद्मा को कल या परसों रिहा कर दिया जाएगा.

ग़ौरतलब है कि मलकानगिरी की एक अदालत गांटी प्रसादम की ज़मानत अर्ज़ी ठुकरा चुकी है लेकिन अब ये मामला बुधवार को उच्च न्यायलय में आना है.

मध्यस्थ हरगोपाल ने बीबीसी को ये भी बताया कि सीतना के एक मामले में प्रशासनिक जाँच शुरु हो जाएगी और फिर सरकार की ओर से आदिवासियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई बंद करने की प्रक्रिया शुरु होगी.

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