'न हकलाने वाले कवि थे नागार्जुन'

  • 6 मार्च 2011
बाबा नागार्जुन इमेज कॉपीरइट BBC World Service

आजकल भारत में इतिहास लेखन में एक नई परंपरा शुरु हुई है. 'सबॉल्टर्न हिस्ट्री' यानी समाज के पराधीन, दुखी, सताए हुए और निचले तबके के लोगों का इतिहास.

इतिहास लिखने वालों के लिए यह ज़रुर नई परंपरा है लेकिन जो बाबा नागार्जुन की कविता को जानते हैं वो जानते हैं कि उनकी कविता दरअसल सबॉल्टर्न वर्ग की ही कविता है. वे उनकी यातनाओं और यातना से मुक्ति की ही कविता लिखते रहे हैं.

मेरी समझ से भारतीय समाज के तीन वर्ग सबसे अधिक सबॉल्टर्न कहे जाने लायक हैं. एक हैं आदिवासी, दूसरी औरतें और तीसरे दलित. बाबा नागार्जुन ने इन तीनों के ही बारे में ख़ूब लिखा है.

आदिवासी समाज को लेकर इन दिनों भारतीय समाज में जो द्वंद्व चल रहा है, उसकी बड़ी बहसें हो रही हैं. आदिवासियों का सत्ताओं से संघर्ष हो रहा है और बहुत सी बातें हो रही हैं. नागार्जुन ने भारत के आदिवासियों की यातनाओं, पराधीनताओं आदि की कविता तब लिखी थी जब हिंदुस्तानी समाज में उस तरह की कविता लिखने की प्रवृत्ति ही नहीं थी. अनेक कविताएँ हैं उनकी, 'साल वनों के टापू में' या 'सघन बगीची में' या दूसरी कई अन्य.

दूसरा सबॉल्टर्न समाज भारत में है औरतों का. सारी दुनिया में औरतें पराधीन और सताई हुई रही हैं. भारत में और भी ज़्यादा क्योंकि दुनिया के जो भी देश जितने पुराने हैं, वे उतने ही दकियानूसी देश भी हैं. परंपराओं और रूढ़ियों के ग़ुलाम. नागार्जुन ने स्त्रियों की यातना और उन यातनाओं से मुक्ति की आकांक्षाओं की कोशिश पर बहुत सारा साहित्य लिखा है.

नागार्जुन का लगभग अस्सी प्रतिशत जो उपन्यास साहित्य है, जैसे 'रतिनाथ की चाची', 'कुंभी पाक' और दूसरे अनेक, इन सबमें किसी न किसी स्त्री की यातना और उससे मुक्त होने की छटपटाहट मौजूद है. नागार्जुन ने मैथिली में एक बहुत ही मार्मिक और लगभग प्रगीतात्मक उपन्यास लिखा है, 'पारो'. उसमें भी उसी तरह से मिथिला के पुराने पुरातनपंथी समाज में जो विवाह को लेकर लड़कियों की जो यातना थी, उसे बहुत ही मार्मिक ढंग से उन्होंने पेश किया है.

इसके अलावा हिंदी में उनकी एक और कविता है 'तालाब की मछलियाँ'. यह कविता स्त्री की पराधीनता की वास्तविकता और स्वाधीनता की आकांक्षा को व्यक्त करने वाली कविता है.

भारत में जो तीसरा बड़ा सबॉल्टर्न समाज है दलितों का. नागार्जुन ने और कविताओं में भी दलितों की पीड़ा की चर्चा की है. लेकिन इस प्रसंग में उनकी सबसे महत्वपूर्ण कविता 'हरिजन गाथा' है. लंबी कविता है और ये बिहार के एक गांव बेचछी में हरिजनों को ज़िंदा जलाए जाने की घटना पर आधारित है.

इस घटना पर हिंदी में दो बड़ी रचनाएँ लिखी गईं. एक तो नागार्जुन की यह कविता और दूसरा मन्नू भंडारी का उपन्यास 'महाभोज'. अगर आप 'हरिजन गाथा' को देखें तो उसमें एक ओर उच्च वर्ग और वर्ण की ज़्यादती है तो दूसरी ओर दलितों की यातना और हत्या का वर्णन है. उस कविता के अंत में नागार्जुन दलितों की मुक्ति की संभावना को लेकर एक तरह से यूटोपिया रचते हुए दिखाई देते हैं.

मुझे लगता है कि यह जो भारत का सबॉल्टर्न समाज है, उसके कवि हैं नागार्जुन.

विविधता का कवि

वैसे तो भारतीय समाज में जितनी व्यापकता और विविधता है वह सब नागार्जुन की कविता में है. उनकी कविताओं में हिमालय है, कश्मीर है, केरल है तो गुजरात भी है और मिजोरम भी.

लेकिन वर्ष 1935-36 से 90 के दशक तक के भारतीय समाज में स्वाधीनता आंदोलन से लेकर आम जनता की बदहाली, तबाही और तंगी के बीच जनता के विद्रोह, प्रतिरोध और सत्ता में संघर्ष का इतिहास अगर आप एक जगह देखना चाहते हैं तो वह नागार्जुन की कविताओं में मौजूद है.

वे एक ऐसे कवि भी हैं जिन्होंने अंग्रेज़ी राज के ज़माने से बाद के दिनों तक भी साम्राज्यवाद की खुली आलोचना की.

चाहे वह इंग्लैंड की रानी के भारत आगमन पर लिखी कविता 'आओ रानी हम ढोएंगे पालकी हो' या फिर अमरीकी राष्ट्रपति जॉनसन पर लिखी कविता 'प्रभु तुम चंदन हम पानी' हो.

यह सिर्फ़ संयोग नहीं है कि नागार्जुन की कविता में जहाँ जनसंघर्ष का वर्णन सबसे अधिक है, उनकी कविता जनसंघर्षों के दौरान सबसे अधिक गाई जाने वाली कविता बनी.

वे सजग और सचेत रुप से जनता के कवि थे. इसलिए तो वे कह सके,

'जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊँ,

जनकवि हूँ मैं साफ़ कहूँगा क्यों हकलाऊँ.'

सारी दुनिया में बहुत सारे कवि आपको मिलेंगे, वे हिंदी में भीं हैं जो हकलाहट को ही कविता समझते हैं.

असल में जो लोग समाज और जीवन से सुविधा चाहते हैं वे साहित्य में दुविधा की भाषा बोलते हैं और दुविधा की भाषा को ही कविता की कला समझते और बनाते हैं.

नागार्जन हकलाने वाले या दुविधा की भाषा वाले कवि नहीं थे.

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