'संपूर्णता के कवि थे शमशेर'

  • 6 मार्च 2011
शमशेर इमेज कॉपीरइट BBC World Service

शमशेर को कवियों का कवि कहा गया है. अज्ञेय जी ने यह बात कही थी. मुझे लगता है कि ऐसा कहे जाने की वजह से उनकी थोड़ी अपेक्षा भी हुई.

ऐसा कहने का यह अर्थ निकाला गया कि वे एक बहुत बड़े कवि पहले ही बन चुके हैं इसलिए उन पर विचार करने की ज़रुरत ही नहीं है. इसकी वजह से शमशेर की कविता थोड़ी कम चर्चित रही.

दूसरे शमशेर ख़ुद भी एक विनम्र और सीधे-सादे व्यक्ति थे. वे ख़ुद को हमेशा थोड़ा पीछे ही रखते थे. इसलिए कहा जा सकता है कि ख़ुद उनकी वजह से भी उनकी कविता कुछ कम चर्चित रही.

लेकिन उनकी कविताओं का असर बहुत ज़्यादा है. आज अगर हम शमशेर को देखते हैं तो पाते हैं कि उनकी कविताओं का रेंज इतना बड़ा है कि वैसा किसी और कवि का नहीं है.

प्रेम और सौंदर्य की अथाह और गहरी भावना से लेकर आम आदमी तक और जनसाधारण, शोषित, दलित से लेकर मज़दूरों तक उनकी कविता का एक व्यापक फ़लक दिखाई देता है.

दिलचस्प ये है कि शमशेर ने लिखा कम है लेकिन इस कम लिखने में जितना बड़ा दायरा शमशेर का है, उतना बड़ा दायरा शायद कोई और कवि नहीं समेट पाता.

शमशेर की एक महान कविता है, 'टूटी हुई, बिखरी हुई' वो बड़ी प्रेम कविताओं में से एक है. लेकिन वही शमशेर एक दूसरी कविता में लिखते हैं, 'वाम वाम वाम दिशा समय साम्यवादी' या 'बात बोलेगी हम नहीं, भेद खोलेगी बात ही'.

संपूर्णता के कवि

तो शमशेर प्रेम और क्रांति की कल्पना एक साथ ही कर लेते हैं. कई आलोचकों को लगता है कि शमशेर की अनुभूति या संवेदना में एक तरह की दो फाँक है, एक तरह की दरार है. इस तरह से मानों दो शमशेर हों. एक और प्रेम और सौंदर्य के कवि शमशेर और दूसरी ओर जनसाधारण, शोषितों और दलितों-मज़दूरों के कवि शमशेर.

लेकिन ऐसा है नहीं. उनमें कोई फाँक नहीं है. असल में शमशेर को हम समग्रता में ही देख सकते हैं. शमशेर जीवन की संपूर्णता के कवि हैं. जीवन की संपूर्णता का इतना बड़ा कवि शायद कोई दूसरा नहीं है.

उन्होंने अपनी एक कविता में लिखा है, 'फूल से बिछुड़ी हुई पंखुड़ी, आ फिर फूल पर लग जा' ये अपने आपमें एक जटिल सी बात है, फूल की जो पंखुड़ी उससे बिछुड़ गई है वो फिर फूल पर कैसे लग सकती है? लेकिन शमशेर संपूर्णता का आह्वान करते हैं. वो एक फूल को संपूर्ण बनाने के लिए पंखुड़ी को पुकारते हैं कि वो फिर से आकर फूल से जुड़ जाए. यह एक ऐसा अनुभव है जिसे जीवन की संपूर्णता का कवि ही अनुभव कर सकता है.

दूसरी बात ये है कि शमशेर की कविता में एक सघन बिंबात्मकता है, जो उन्होंने प्रतीकवादियों से ली हैं, और वह अपने आपमें हिंदी साहित्य की एक बड़ी धरोहर है. इस तरह के बिंबों को कविता में किस तरह से बरता जाए, यह भी उनकी कविताओं में ही दिखता है. जैसे उनकी एक कविता में दिखता है, 'प्रात नभ था ख़ूब नीला शंख जैसे' इसी तरह सूर्योदय पर उनकी एक कविता है.

शमशेर का एक पहलू वो है जो उनकी उर्दू की कविताओं में है. शमशेर उन कवियों में से भी हैं जिन्होंने हिंदी में ग़ज़ल के फार्म को ज़िंदा रखने की कोशिश की.

वे हिंदी-उर्दू की साझा संस्कृति के बहुत बड़े कवि भी हैं. उनकी कुछ गज़लें बहुत सरल भी हैं और कुछ बहुत जटिल भी हैं.'दिल को लगती है तेरी बात खरी है शायद, फिर वही शमशेर मुजफ़्फ़र नगरी है शायद' और एक ग़ज़ल है, 'बहुत देर से लौटा हूँ रात गए, मेरे हिस्से की ताक पर धरी है शायद'

एक ओर शमशेर निराला, पंत और हरिवंश राय बच्चन से प्रभावित हैं और दूसरी ओर वे मीर, ग़ालिब और इक़बाल से भी उतने ही प्रभावित हैं. ज़बान के लिहाज से तो वे इक़बाल को अपने गुरु जैसा मानते हैं.

दरअसल भाषाओं के प्रति इतना प्रेम शायद किसी दूसरे कवि में नहीं रहा. उनकी अनेक कविताएँ हैं जो भाषाओं पर लिखी गई हैं. एक कविता उन्होंने चीनी चित्रलिपि पर लिखी है.

एक कविता में उन्होंने लिखा है, 'सारी भाषाएँ एक हैं, जैसा मेरा ख़ून' तो वे सारी भाषाओं को अपने रक्त में महसूस करते हैं. ये भाषाओं के प्रति उनका लगाव ही है. बहुत ही कम लोगों को पता है कि शमशेर असल में फ़ारसी में लिखते थे और फिर हिंदी में उसका उल्था करते थे.

प्रतीकों का जहाँ तक सवाल है तो शमशेर एक अद्भुत कवि हैं.

उनकी एक कविता का अंश है, 'ओ स्पर्श मुझे क्षमा करना कि मैं तुमसे होकर भी तुमसे परे हूँ, ओ माध्यम मुझे क्षमा करना मैं तुम्हारे पार जाना चाहता हूँ' ये जो माध्यम के पार जाने की इच्छा है, एक स्पर्श के माध्यम से स्पर्श से भी परे जाने की इच्छा है, ये शमशेर को तमाम कला माध्यमों से जोड़ती है और कला माध्यमों को लांघने की इच्छा की ओर चली जाती है, स्वप्न की ओर चली जाती है.

शमशेर ने चित्रकलाओं पर भी कई कविताएँ लिखी हैं, अपने समय के कई चित्रकारों पर कविताएँ लिखीं हैं.

सारी कलाओं के प्रति शमशेर का आग्रह अद्भुत था. एक वक्तव्य में उन्होंने कहा था कि हमारे सामने हर पल कला के एक नए रूप का अवतार होता रहता है, जो कुछ छिपी रहती है, कुछ दिखती रहती है.

मुझे लगता है कि जिस तरह से शमशेर कलात्मक गतिविधियों को अपना विषय बनाते हैं वह भी संपूर्णता की खोज की शमशेर की एक कोशिश है.

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार