औरों से अलग थे शमशेर

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शमशेर बहादुर सिंह से मेरी मुलाक़ात 1971 में हुई थी और मेरा उनसे संबंध बहुत ही आत्मीय और निजी क़िस्म का रहा.

ये संबंध मेरी कविता और अपनी ज़िंदगी के लिए आवश्यक था. उनकी जगह मेरी ज़िंदगी में वैसी ही थी जैसी कि मेरे पिता की हो सकती थी.

इसलिए जब जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में जब मैंने फॉर्म भरा तो स्थानीय अभिभावक के कॉलम में मैंने शमशेर का ही नाम लिखा था.

लेकिन शमशेर का दर्जा मेरी निगाह में बहुत बड़ा सिर्फ़ इसलिए नहीं है क्योंकि मैं उनसे व्यक्तिगत तौर पर जुड़ा हुआ था. इसका एक कारण यह भी है कि मैं अपने आपको उस मनोभूमि के क़रीब पाता हूँ जो शमशेर की मनोभूमि है.

शमशेर की आवाज़, उनके बिंब और उनके सरोकार सब मेरी निजी ज़िंदगी में गूंजते रहते हैं.

वे एक प्रगतिवादी कवि के रुप में जाने गए लेकिन बाद में जब प्रगतिवाद कुछ धीमा और शिथिल हुआ तब भी शमशेर की प्रतिबद्धता बदली नहीं.

शमशेर निहायत ही ऐंद्रिय कवि थे. आज भी उनकी कविता जिंदगी के तमाम हल्क़ों में सहजता से जाती हैं. उनकी कविताओं में प्रेम की विरल प्रगाढ़ता है और विराट बिंब हैं. लेकिन छोटी-छोटी चीज़ों में उनकी रचना शामिल होती है और बड़ा अर्थ पाती हैं.

शमशेर की कविता को लेकर कई बार लोग जटिलता या दुरुहता का आरोप लगाते हैं लेकिन उनके जैसे किसी कविता को सही ढंग से जानने, परखने और कविता का आस्वाद लेने के लिए आवश्यक है कि आप शमशेर की कविता के उत्स को, स्रोतों को समझें, जहाँ से वो कविता जन्म लेती है और अपना मिज़ाज पाती है.

भाषा के स्तर पर देखें तो उनकी कविताओं में उर्दू-फ़ारसी के बहुत सारे शब्द आते हैं. उनकी बहुत सी रचनाएँ ऐसी हैं जैसे वो किसी उर्दू शायर की रचनाएँ हों.

मुक्तिबोध की मृत्यु पर उन्होंने चंद कता'त लिखे थे. उनमें से एक था,

"ज़माने भर का कोई इस क़दर अपना ना हो जाए कि अपनी ज़िंदगी ख़ुद आपको बेगाना हो जाए."

उनकी एक और कविता आ अंश है,

"एक फ़ाहा भी मेरे ज़ख़्म पर रखा न गया और एहसान मेरे सर पर दवा का बांधा"

उर्दू-फ़ारसी की सुदीर्घ परंपरा शमशेर को घुट्टी में मिली थी और हिंदी की तरफ़ वे कुछ देर से आए.

उर्दू-फ़ारसी में तो उनकी आरंभिक शिक्षा दीक्षा हुई थी लेकिन हिंदी के लिए उनके प्रेरणास्रोत हिंदी के कई बड़े कवि रहे.

निराला को शमशेर अपना काव्य गुरु मानते थे और पंत के प्रति भी उन्होंने बराबर सम्मान का भाव रखा.

वैसे तो दुनिया का हर बडा़ कवि प्रेम, सौंदर्य और मुक्ति का कवि होता है. लेकिन शमशेर इन अर्थों में भी औरों से काफ़ी अलग थे. ख़ासकर अपनी रचना शैली, शिल्प और प्रविधि की वजह से.

उनकी प्रेरणा का एक बहुत बड़ा स्रोत फ़्रांस के सुरियलिस्ट आंदोलन था, जिसने फ़्रांसिसी कवियों को एक हद तक मुक्त किया.

उन आंदोलनों ने जो बड़े कवि बनाए, उनमें पाल एलवार और लुई एरागाँ प्रमुख हैं. ये दोनों पहले मार्क्सवाद की ओर गए और फिर कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने.

अगर इन कवियों की ज़िंदगी की ओर नज़र डालें तो उन कवियों की ज़िंदगियों और चेतना यात्रा में और शमशेर की ज़िंदगी और चेतना यात्रा में काफ़ी समानता नज़र आती है.

शमशेर के काव्यबोध में इन्हीं दोनों के काव्यबोध की तरह सुरियलिज़्म एक स्थाई प्रभाव की तरह ताज़िंदगी रहा.

इसलिए मैं कहता हूँ कि कवि के काव्यबोध को जानना ज़रुरी है.

'एक नीला दरिया बह रहा' और 'टूटी हुई बिखरी हुई' जैसी कविता लोगों तो दुरूह लग सकती हैं लेकिन अपनी रचना प्रक्रिया, प्रविधि और आख़िरकार शिल्प के धरातल पर शमशेर की कविता सुरियलिस्ट कविताओं की याद दिलाती हैं.

उनकी कविताओं को पढ़ते हुए सुरियलिस्टों के नेता आंद्रे ब्रेताँ का वर्ष 1924 का घोषणा पत्र याद आता है. वे एक प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक थे और उन्होंने फ़्रायडियन फ़ॉर्मूले को रचनाशीलता की कुंजी बनाने की कोशिश की. उनका कहना था कि जो अवचेतन है वही वास्तविक व्यक्तित्व है और अगर हम अवचेतन को मुक्त करें तो जो उन्मुक्तता होगी वह रचना के लिए कारगर और मुफ़ीद होगी.

शमशेर के ज़हन में वो भी ख़याल लगातार एक संचालक की भूमिका निभाता है.

मार्क्सवादी

मुझे लगता है कि अगर हम मार्क्सवादी कहते हैं तो एक ख़ासतरह की प्रतिबद्धता और विश्व दृष्टि का पता चलता है.

इस तरह से देखें तो शमशेर आजीवन मार्क्सवादी रहे.

लेकिन अगर शमशेर को मार्क्सवादी कवि कहने से उनकी कविता की जो बहुत बड़ी व्याप्ति है, बहुत बड़ा धरातल है, अनुभवों की विविधता है उसे संकीर्ण करना हो, तो मुझे इस पर ऐतराज़ होगा.शमशेर मार्क्सवाद के प्रति प्रतिबद्ध रहे लेकिन उनकी फुटकर कविताओं को उठाकर कोई कहे कि इसमें मार्क्सवाद कहाँ है तो मुझे इस पर ऐतराज़ होगा.

वो तरह-तरह की कविताओं के कवि हैं और तमाम क़िस्म के जीवन अनुभव उनके यहाँ सामग्री की तरह इस्तेमाल में आते हैं.

उनकी बहुत सी कविताएँ लिरिकल हैं. गेय हैं. और ज़ाहिर है कि ऐसी कविताओं में आपको मार्क्सवाद की छाया दिखाई नहीं देगी.

शेमशेर जिन कविताओं के बारे में जाने गए उनमें से एक कविता, 'वाम वाम वाम दिशा समय साम्यवादी' है. वो बहुत ही ख़ूबसूरत और उम्मीद से भरी कविता है. यह शोषित, पीड़ित और दुखी सामान्यजन की मुक्ति की कविता है.

या एक कविता 'एक हिलोर उठी गाओ' है जो शमशेर ने कम्युनिस्टों की प्रभात फेरी के लिए लिखी थी. इसमें उनका पूरा कम्युनिस्ट व्यक्तित्व उभर कर सामने आता है.

उनकी एक कविता 'ये शाम है' की कुछ पंक्तियाँ हैं, 'ये शाम है कि आसमान खेत हैं पके हुए अनाज का, लपक उठीं लहू भरी दरातियाँ की आग, सुलग रहा गवालियार के मजूर का हृदय, गवालियार के बाज़ार में.'

ये कविता तब लिखी गई थी जब ग्वालियर में मंज़दूरों के जुलूस पर गोली चली थी. इस जुलूस में झंडे के साथ रोटियाँ टांग रखी थीं कि हम इसके लिए संघर्ष कर रहे हैं.

ये सारा दृश्य जिस तरह से कविता में उभरता है वो दिखाता कि शमशेर कहाँ और किस आवाम के साथ और किस संकल्प के साथ खड़े हैं.

वो संकल्प उनका जीवन भर रहा.

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