सरल-सहज व्यक्तित्व वाला एक बड़ा कवि

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शमशेर बहादुर सिंह यानी प्रगतिवाद के पहली पंक्ति के कवि.

सहजता अगर इंसान का गुण है तो शमशेर बहादुर सिंह जीवन इसका एक उदाहरण है, न औपचारिकता न पाखंड...जैसा जीवन, वैसा लेखन.

अंग्रेज़ी कवि एज़रा पाउंड का ख़ासा प्रभाव और निराला उनके प्रिय कवि थे. उन्हें याद करते हुए शमशेर ने लिखा था,

भूल कर जब राह जब जब राह भटका मैं तुम्हीं झलके हे महाकवि सघन तम की आँख बन मेरे लिए

शमशेर का जन्म 13 जनवरी, 1911 को देहरादून में हुआ. 18 वर्ष की उम्र में उनका विवाह हुआ. छह साल बाद उनकी पत्नी नहीं रही. चौबीस बरस के शमशेर को मिला जीवन का ये अभाव कविता में विभाव बनकर हमेशा मौजूद रहा. काल ने जिसे छीन लिया, उसे अपनी कविता में सजीव रहकर वो काल से होड़ लेते रहे.

शमशेर में एक ऐसा ठोसपन है जो उनकी विनम्रता को ढुलमुल नहीं बनने देता. उनके लिए निजता और सामाजिकता में अलगाव और विरोध नहीं था बल्कि दोनों एक ही अस्तित्व के दो छोर थे.

शख़्सियत

नीलाभ शमशेर की पीढ़ी के कवि तो नहीं हैं लेकिन उन्होंने शमशेर को क़रीब से देखा ज़रुर है.

वे कहते हैं, "उनकी शख़्सियत में उनकी कविता की तरह ही एक तरह की गर्माहट, नरमी, गर्माहट, शीतलता और एक तरह की कठोरता सभी एक साथ मौजूद थी. सर्दियों की धूप की तरह गर्माहट और गर्मी में किसी बरगद की छाँह तले की नमी और शीतलता की तरह. उनके साथ एक साथीपन का कैमेरेडरी का अहसास होता था."

पंकज सिंह ने भी शमशेर को बहूत नज़दीक से देखा. बल्कि जब वो दिल्ली आए को शमशेर उनके स्थानीय अभिभावक बने.

वे याद करते हैं, "एक संयोग ही था कि मैं कविता लिखता था और जब दिल्ली आया तो एक कवि के रुप में परिचित हो चला था.यह स्वाभाविक ही था कि मैं दिल्ली आकर सोचता कि शमशेर से मुलाक़ात होनी चाहिए. मेरा एक साथी उन दिनों उनके साथ रह रहा था.उनकी वजह से 1971 में उनसे मुलाक़ात हुई.तब से शमशेर मेरी कविता के लिए और मेरी अपनी ज़िंदगी के लिए उनका होना वैसा ही रहा जैसा कि मेरे पिता का हो सकता था."

वे कहते हैं, "जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधार्थी के लिए जब मैंने फॉर्म भरा तो उसमें एक कॉलम होता था, स्थानीय अभिभावक का. मैंने उसमें शमशेर का नाम लिखा और फिर शमशेर ने उस पर दस्तख़त किए. जब कभी हम वैचारिक रुप से असहमत हो जाते तो शमशेर मुझसे मज़ाकिया लहज़े में कहते थे कि मुझे भूलना नहीं चाहिए वे मेरे अभिभावक हैं और वे वीसी से मेरी शिकायत कर सकते हैं कि मेरा वार्ड मुझे दुखी करता है."

शेमशेर ने अपने जीवन के अंतिम नौ साल उन पर शोध कर रही रंजना अरगड़े के यहाँ बिताए. इस समय रंजना अरगड़े अहमदाबाद में गुजरात विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग की अध्यक्षा हैं.

वे कहती हैं, "मेरे यहाँ शमशेर का आकर रहना मैं एक तरह का ऋणानुबंध मैं मानती हूँ. मैं इसे इसलिए स्वाभाविक भी मानती हूँ क्योंकि उन्होंने उज्जैन में मुझसे कहा भी था कि जब मेरा यहाँ का कार्यकाल पूरा हो जाएगा तो मैं अपना सामान तुम्हारे यहाँ रखूँगा और मैं घूमता रहूँगा."

रंजना याद करती हैं, "संयोग या दुर्भाग्य कहिए कि जब वे अस्वस्थ हुए तो उनकी उसी बात को याद करते हुए मैं उन्हें अपने यहाँ ले आई. जब उनका कार्यकाल ख़त्म हो रहा था तो मैंने उनके स्वजनों को पत्र लिखा था लेकिन नियती में उनका मेरे साथ रहना तय रहा होगा इसलिए कहीं से उत्तर नहीं आए."

इतने बरस शमशेर के साथ रहने के अवसर के बारे में वे कहती हैं,"ये मुझे स्वीकार करना चाहिए कि शमशेर की का अपना व्यक्तित्व स्वभाव और जीवन को देखने का उनका नज़रिया ऐसा था कि इतने बरस मेरा उनके साथ रहना संभव हुआ. इसमें मेरा अपना कोई योगदान मैं नहीं मानती. उनकी जीवन शैली अत्यंत सरल थी और कोई दुराग्रह और हठाग्रह नहीं होता था. मेरे लिए यह कोई कठिन नहीं था."

रंजना अरगड़े मानती हैं कि शमशेर के साथ रहने से जीवन को समझने की एक ऐसी दृष्टि उन्हें मिली जो शायद उन्हें और किसी तरह से नहीं मिल सकती थी.

नम्रता और दृढ़ता, फ़ाकामस्ती और जीवन के मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता उनकी शख़्सियत का एक हिस्सा था.

नीलाभ एक दिलचस्प वाकया सुनाते हैं,"उन दिनों वे इलाहाबाद से दिल्ली आ गए थे. एक बार मैं और मेरी पत्नी और मेरा बच्चा तीनों वहाँ गए. गप्पबाज़ी होने लगी और जब चाय आई तो मैंने यूँ ही कह दिया कि मुझे चीनी के दाने चिपके हुए बिस्कुट बहुत पसंद हैं. उसी समय मेरी पत्नी ने भी टिप्पणी की कि बच्चे को भी वो बिस्कुट बहुत पसंद हैं. मैंने देखा कि शमशेर उठकर कहीं चले गए. पहले तो मैंने सोचा कि वे हाथ धोने गए होंगे आ जाएँगे लेकिन थोड़ी देर बाद वे सीढ़ियों से ऊपर चढ़कर आए और उन्होंने अपनी परिचित सी शर्मीली अदा के साथ हमारे सामने उसी बिस्कुट का डिब्बा रख दिया. ये बात मुझे छू गई."

वाद का सवाल

शमशेर की कविताओं में मार्क्सवादी आग्रहों को लेकर कई अटकलें लगाई जाती रही हैं जब सच्चाई ये है कि वे किसी भी वाद से परे हैं. वस्तुत: शमशेर ने मार्क्सवादी दर्शन को पूरी तरह से आत्मसात कर लिया था इसलिए उनमें अपने को मार्क्सवादी कहलाने का प्रचारात्मक आग्रह नहीं पाया जाता.

पंकज सिंह कहते हैं, "शमशेर आजीवन मार्क्सवादी रहे.लेकिन अगर शमशेर को मार्क्सवादी कवि कहने से उनकी कविता की जो बहुत बड़ी व्याप्ति है, बहुत बड़ा धरातल है, अनुभवों की विविधता है उसे संकीर्ण करना हो, तो मुझे इस पर ऐतराज़ होगा.शमशेर मार्क्सवाद के प्रति प्रतिबद्ध रहे लेकिन उनकी फुटकर कविताओं को उठाकर कोई कहे कि इसमें मार्क्सवाद कहाँ है तो मुझे इस पर ऐतराज़ होगा."

उनका कहना है, "वो तरह-तरह की कविताओं के कवि हैं और तमाम क़िस्म के जीवन अनुभव उनके यहाँ सामग्री की तरह इस्तेमाल में आते हैं.उनकी बहुत सी कविताएँ लिरिकल हैं. गेय हैं. और ज़ाहिर है कि ऐसी कविताओं में आपको मार्क्सवाद की छाया दिखाई नहीं देगी."

शमशेर की कविताओं पर तो सबकी नज़र गई लेकिन उनका गद्य भी उनके पद्य से कम नहीं है. एक आलोचक का कहना है कि शमशेर का गद्य इतना पद्यमय है कि इसे गाया जा सकता है.

रंजना अरगड़े भी मानती हैं कि उनका गद्य भी उतना ही प्रभावशाली है जितना कि उनका पद्य, "बड़ा अद्भुत गद्य है. निर्मल वर्मा ने इस पर बहुत अच्छी टिप्पणी की है. वे महादेवी के बाद शमशेर जी के गद्य की बात करते हैं. उनका गद्य दो तरह का था. एक आलोचनात्मक लेखों का गद्य और दूसरा रेखाचित्रों और कहानियों का गद्य. अगर आप आलोचनात्मक गद्य पढ़े तो आपको पता चलेगा कि वे जो लिख रहे हैं वो ऐसा इसलिए लिख रहे हैं कि वे चाहते हैं कि लोग इसे समझ जाएँ. लेकिन जब रेखाचित्रों और कहानियों को देखेंगे तो आप पाएंगे कि उसकी वाक्य रचना है ऐसी है कि कविता के क़रीब पहुँचती है."

शमशेर बहुर्मुखी तो नहीं थे. गांभीर्य उनमें ज़रुर था लेकिन आम आदमी की तरह उनको भी हँसना आता था. पंकज सिंह एक दिलचस्प वाकया याद करते हैं,"एक दिन शाम को मैं शमशेर के घर पहुँचा तो वे लगातार हँस रहे थे. बच्चों की तरह. हँसते-हँसते उनकी आँखों में आँसू आ गए थे. मैंने उन्हें इस मुद्रा में इससे पहले कभी नहीं देखा था कि वे अकेले में हँस रहे हों. मैंने उनसे इस हँसी की वजह जाननी चाही तो उन्होंने आलोचना का पृष्ठ मेरे सामने रख दिया."

पंकज याद करते हैं, "उसमें अफ़्रीकन कवि लियोपोर्ड सिंगोर की कविता का अनुवाद प्रकाशित हुआ था. हमारे ही एक समकालीन कवि ने उसका अनुवाद किया था. उसमें एक जगह लिखा था कि नाचती हुई लड़की के पाँव भारी हो रहे हैं. शायद उन कवि महोदय को यह अंदाज़ा नहीं था हिंदी-उर्दू में पाँव भारी होना एक मुहावरा है जिसका मतलब गर्भवती होना होता है. शमशेर हँस रहे थे कि नाचते-नाचते नर्तकी के पाँव कैसे भारी हो सकते हैं."

वे बताते हैं कि उस कवि का ध्यान भी इस ओर आकर्षित किया गया और बाद में वे और शमशेर जी उसे याद करके अक्सर हँसते रहे.

शमशेर एक तरफ़ उर्दू-फ़ारसी की परंपरा का निर्वाह करते हैं तो दूसरी तरफ़ चित्रकारी भी करते हैं शब्दों की भी और कूची की भी.

एक तरफ़ उनमें अपने आपको ख़याल से भी कम समझने का विनय है तो दूसरी तरफ़ 'मैं तो इसी शरीर से अमर हूँ' कहने का साहस भी है.

रंजना अरगड़े उनके अंतिम दिनों को याद करती हैं जब 12 मई 1993 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा,

"जब हार्ट अटैक आया तो अस्पताल में लगभग 72 घंटे से भी कम रहे. वह बहुत पीड़ा का समय तो नहीं था. लेकिन उन्हें शायद अंदाज़ा हो गया था कि अब जाने का समय आ गया है. मैं उनसे पूछ रही थी कि वे क्या सुनना चाहेंगे ग़ालिब या कुछ और लेकिन वे इनकार में सिर हिलाते रहे."

वे याद करती हैं, "आख़िर में शमशेर ने गायत्री मंत्र सुनने की इच्छा जताई. उज्जैन में जब वे थे तो संस्कृत की छूटी हुई कड़ी वहीं हाथ आ गई थी. मैं गायत्री मंत्र बोल रही थी और वे साथ में बोलते जा रहे थे. मंत्र बोलते -बोलते जब वे चुप हो गए तो मैं जान गई थी कि अब वे नहीं हैं."

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