गोधरा कांड: 11 को मौत, 20 को उम्र क़ैद

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गोधरा कांड में अहमदाबाद की विशेष अदालत ने दोषी क़रार दिए गए 31 लोग में से 11 लोगों को मौत की सज़ा और 20 को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई है.

बचाव पक्ष के वकील आईएम मुंशी ने इस फ़ैसले को असाधारण मामला माना और कहा कि इसे स्वीकार करना मुश्किल है.

उनका कहना था, ''जब तक हमें फैसले की प्रति नहीं मिल जाती तब तक और अधिक टिप्पणी नहीं कर सकते. हम इस फ़ैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देंगे, वैसे भी जब तक हाई कोर्ट इस फ़ैसले की पुष्टि नहीं करता तब तक इस फ़ैसले पर अमल नहीं किया जा सकता.''

सरकारी वकील जेएम पांचल ने पत्रकारों को बताया कि ऐसे कुछेक ही मामले हैं जब 11 लोगों को मौत की सज़ा सुनाई गई हो.

उन्होंने फ़ैसले पर संतोष जताया और कहा कि अदालत का फ़ैसला उन्हें स्वीकार है.

नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और वकील मुकुल सिन्हा ने मीडिया से बातचीत में फ़ैसले पर असंतोष जताया और कहा कि सबूत बहुत कमजोर थे और मामले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जाएगी.

उल्लेखनीय है कि 25 फ़रवरी को दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने फ़ैसला सुरक्षित रखा था.

विशेष अदालत ने 22 फ़रवरी को 94 अभियुक्तों में से 31 को दोषी क़रार दिया था जबकि 63 को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था जिसमें मुख्य अभियुक्त हुसैन उमरजी भी शामिल हैं.

ये सज़ा बेहद सख़्त है: कुलदीप नैय्यर

सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाद ने अपनी प्रतिक्रिया ज़ाहिर करते हुए कहा कि वो तो सज़ा- ए- मौत के ही ख़िलाफ़ हैं और वैसे भी जब मुख्य अभियुक्त को बरी कर दिया गया तो फिर साज़िश की बात कैसे साबित होती है.

उन्होंने कहा कि इस फ़ैसले में जो विरोधाभास हैं वो नज़र आ रहे हैं लेकिन उन्हें इसका पूरा अध्ययन करना होगा.

जानेमाने पत्रकार और स्तंभकार कुलदीप नैय्यर ने कहा, "ये सज़ा बहुत ज़्यादा सख़्त है. इस पर ग़ौर किया जाना चाहिए."

उनका कहना था कि परिस्थितियों से उपजे सबूत के आधार पर ये फ़ैसला सुनाया गया है.

जमीयते उलेमा हिंद के प्रमुख महमूद मदनी ने कहा कि वो तो गोधरा मामले को साज़िश मानते ही नहीं.

उनका कहना था, "हम तो इसे साज़िश मानते ही नहीं. गोधरा के पहले और बाद की घटनाओं की बारीक़ी से जांच हो ताकि असली मुजरिमों का पता चल सके."

भारतीय जनता पार्टी के एक प्रवक्ता सिदार्थ सिंह का कहना था कि भारत की एक न्यायिक व्यवस्था है जिसके तहत यदि फ़ैसले से आप सहमत न हों तो आप उच्च या सर्वोच्च अदालत मे अपील कर सकते हैं.

उनका कहना था, "लेकिन ये कहना ग़लत होगा कि ये सब आरोप मनगढ़ंत हैं."

भारतीय जनता पार्टी के ही बलबीर पुंज का कहना था ये अच्छा फ़ैसला है और इससे साबित होता है कि गोधरा रेल कांड एक साज़िश थी.

रेल में आगजनी

इसके पहले विशेष अदालत ने गोधरा रेल कांड को साज़िश करार दिया था.

ग़ौरतलब है कि अदालत ने ये फ़ैसला 27 फ़रवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस के एक डब्बे में लगाई गई आग के लिए गिरफ़्तार अभियुक्तों की भूमिका पर सुनाया है.

उस आग में 59 लोग वो मारे गए थे जिनमें से ज़्यादातर अयोध्या से लौट रहे हिंदू कारसेवक थे.

अभियोजन पक्ष के अनुसार साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 डब्बे पर लगभग एक हज़ार लोगों की भीड़ ने हमला किया था. इस घटना के बाद गुजरात में भारी सांप्रदायिक दंगे हुए थे.

राज्य के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसे पूर्व-नियोजित घटना का नाम दिया था.

इस जांच पर सवाल उठने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2008 में आर के राघवन के नेतृत्व में एक और जांच दल गठित करने का आदेश दिया था.

इस मामले की सुनवाई जून, 2009 में शुरू हुई थी.

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