लीबिया का आंखो देखा हाल

  • 2 मार्च 2011
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Image caption लीबिया से वापस आने वालों का सिलसिला जारी है.

बेनगाज़ी के एक विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के एसोसिएट प्रोफ़ेसर के तौर पर काम कर रहे रामकुमार शर्मा ने लीबिया में अपने अनुभव बीबीसी के साथ बाँटे.

बीबीसी संवाददाता पवन सिंह अतुल ने रामकुमार शर्मा से बात की जब वो बेनगाज़ी बदंरगाह पर भारतीयों को वापस लाने के लिए एस्कोटिया प्रिंस जहाज़ पर सवार हो चुके थे.

लीबिया में फंसे भारतीयों को वापस लाने के लिए एस्कोटिया प्रिंस जहाज़ बेनगाज़ी बदंरगाह पर पहुँच चुका है. इस जहाज़ पर 1200 भारतीय सवार हैं. ये जहाज़ भारतीयों को एलेक्ज़ेंड्रिया लेकर जाएगा, जहाँ से एयर इंडिया का विशेष विमान इन लोगों को भारत लेकर आएगा.

रामकुमार शर्मा बेनगाज़ी से 160 किलोमीटर दूर अज़दाबिया से सड़क के रास्ते इस बंदरगाह पर पहुँचे हैं.

अज़दाबिया शहर के हालात बताते हुए रामकुमार कहते है, “वहाँ हालात अच्छे नहीं थे लेकिन हालात को इतना भी बुरा नहीं कहा जा सकता. आप अगर घर में बंद हैं तो कोई दिक्कत नहीं है. लीबिया के लोग भारतीयों को इज्जत से देखते है इसलिए कोई डर की भावना नहीं है”

अज़दाबिया शहर से बेनगाज़ी तक की यात्रा के दौरान भी रामकुमार को कोई खतरा महसूस नहीं किया.

रामकुमार बताते है, “पूरा रास्ता स्वतंत्रता मांगने वाले विद्रोहियों के कब्ज़े में था और वो पूरे रास्ते पर पहरा दे रहे थे. शहर में मौजूद पुलिस और सेना मुख्यालय को जला दिया गया है.”

रामकुमार बताते है कि अज़दाबिया शहर पूरी तरह से स्वतंत्रता मांगने वाले विद्रोहियों के कब्ज़े में है.

लीबिया की राजधानी त्रिपोली के बाद बेनगाज़ी शहर देश का दूसरा सबसे बड़ा शहर है.

रामकुमार कहते है कि सभी लोगों का अनुभव अलग-अलग रहा है लेकिन उनका अनुभव बुरा नहीं रहा.

प्रोफ़ेसर रामकुमार कहते हैं, “हमें मकान मालिक ने पहले ही बता दिया गया था कि अपना राशन जमा कर के रख लें. हम 10-15 दुकान बंद रखने वाले हैं.”

रामकुमार बताते है कि ऐसा नहीं था कि सब कुछ इतना शांत था दिन भर गोलीबारी की आवाज़ आती रहती थी और मन में हमेशा शंका बनी रहती थी कि ना जाने कब स्थिती बदल जाए और कब इन लोगों का मन बदल जाए.

राजकुमार कहते है कि त्रिपोली और बेनगाज़ी की स्थिती कहीं ज़्यादा भयावह थी. राजकुमार का आंकलन है कि अब स्थिती 90 प्रतिशत विद्रोहियों के पक्ष में

है.

रामकुमार बताते हैं कि उनके साथ भारत वापस आने वाले जहाज़ में 1200 के लगभग यात्री सवार हैं और उनमें से एक तिहाई नर्स हैं.

रामकुमार शर्मा बताते हैं कि लोगों को वापस लाने के लिए भारतीय दूतावास के लोग पूरी तरह से सहयोग कर रहें हैं, और जहाज़ों पर लोगों के खाने-पीने और रहने की उचित व्यवस्था है.

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