सीवीसी की नियुक्ति अवैध: सुप्रीम कोर्ट

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Image caption पीजे थॉमस ने सात सितंबर 2010 को केंद्रीय सतर्कता आयोग के तौर शपथ ली थी.

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस की नियुक्ति को अवैध ठहराया है. केंद्र सरकार को इस आदेश से झटका लगा है.

ग़ौरतलब है कि ये नियुक्ति प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और लोकसभा में विपक्ष की नेता की समिति ने की थी. विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने थॉमस के नाम पर आपत्ति जताई थी और इस नियुक्ति के लिए अपनी सहमति नहीं दी थी.

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने वकील प्रशांत भूषण द्वारा दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान ये फ़ैसला सुनाया है.

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि वे सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सम्मान करते हैं

पीजे थॉमस के ख़िलाफ़ वर्ष 2002 से पालमोलीन निर्यात से संबंधित एक मामला लंबित है और उससे संबंधित चार्जशीट में पीजे थॉमस का नाम भी है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जिस उच्चस्तरीय समिति ने पीजे थॉमस की नियुक्ति की सिफ़ारिश की थी उसका क़ानून के मुताबिक कोई अस्तित्व नहीं है.

कोर्ट ने ये भी कहा है कि इस नियुक्ति के समय इस उच्चस्तरीय समिति और किसी भी सरकारी संस्था ने मुख्य सतर्कता आयुक्त की संस्था की ईमानदारी और निष्ठा के मुद्दे को प्रथमिकता नहीं दी.

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि जब केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की दोबारा नियुक्ति हो तो प्रक्रिया को केवल नौकरशाहो तक सीमित न रखा जाए बल्कि समाज से अन्य ईमानादार और निष्ठावान व्यक्तियों के नाम पर ध्यान दिया जाए.

याचिकाकर्ता प्रशांत भूषण ने बताया कि अदालत ने कहा कि विपक्ष के नेता के पास कोई 'वीटो' तो नहीं है लेकिन यदि वे नियुक्ति का विरोध करते हैं तो इसको ध्यान में रखना होगा.

अदालत ने ये भी कहा है कि विपक्ष के नेता को जो भी आपत्ति हो, उन्हें इसका कारण बताना होगा और यदि आपत्ति के बावजूद यदि नियुक्ति होती है तो सत्तापक्ष के प्रतिनिधियों को इसका कारण देना होगा.

'अभियुक्त सीवीसी कैसे?'

इससे पहले इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 'आपराधिक मामले का कोई अभियुक्त

केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के पद का कामकाज कैसे देख सकता है?'

इस बारे में जनहित याचिका की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाडिया की अध्यक्षता वाली पीठ ने की है.

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Image caption सुप्रीम कोर्ट में मुख्य सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति को चुनौती दी गई है

सुनवाई के दौरान एक दिन तो जस्टिस कपाडिया ने पूछा, "इस फ़ाइल को पढ़े बिना ही हमारी चिंता ये है कि यदि कोई व्यक्ति किसी आपराधिक मामले में अभियुक्त है तो वह सीवीसी का कामकाज कैसे देख सकता है? हम एक साथ बैठकर इस फ़ाइल का अध्ययन करेंगे."

पीजे थॉमस के ख़िलाफ़ वर्ष 2002 से पालमोलीन निर्यात से संबंधित एक मामला लंबित है और उससे संबंधित चार्जशीट में थॉमस का नाम भी है.

इस मामले की सुनवाई के दौरान एटॉर्नी जनरल जीई वाहनवाटी ने कहा था कि पालमोलीन मामले से उनका कोई संबंध नहीं है और उनके ख़िलाफ़ अभियोग चलाने के बारे में फ़ैसला नहीं हुआ है.

लेकिन न्यायधीशों के पीठ का कहना था, "हम ये मानकर चलते हैं कि हर क़दम पर आरोप लगेंगे कि आप सीवीसी के तौर पर इस मामले का निपटारा कैसे कर सकते हैं जब आप ही आपराधिक मामले में अभियुक्त हैं. आप सीवीसी के तौर पर कैसे काम करेंगे? हर मामले में केंद्रीय जाँच ब्यूरो को इनके सामने रिपोर्ट करना होता है."

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