बेटियों को बचाने सड़कों पर उतरे लोग

  • 6 मार्च 2011

भारत में हर दिन 2000 से ज़्यादा लड़कियों को गर्भ में ही मार दिया जाता है और गांवों से ज़्यादा शहर के लोग इस अपराध में शामिल हैं.

यहां तक की कई राज्य ऐसे हैं जहां लिंग अनुपात ख़तरनाक हद तक गड़बड़ा गया है. ऐसे में समाज से इस बुराई को ख़त्म करने का बीड़ा दुनिया के अलग-अलग देशों में एकजुट हुए आम लोगों ने उठाया.

रविवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर ‘ग्लोबल वॉक फॉर इंडियाज़ मिसिंग गर्ल्स’ के बैनर तले कई लोग इक्कठा हुए.

इन लोगों का मक़सद था कन्या भ्रूण हत्या के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करना.

बेटियों को बचाओ

इस रैली में हिस्सा लेने आईं ऊषा राय के अनुसार, ''दुनियाभर के मुक़ाबले यहां तक की एशियाई देशों में भी भारत ही ऐसा देश है जहां भ्रूण हत्या इस हद तक बढ़ चुकी है कि लिंगानुपात ख़तरनाक स्तर तक गड़बड़ा गया है. पढ़े-लिखे लोग जिनसे हमें उम्मीद है कि वो लड़कियों को बचाएंगे ख़ुद इसमें शामिल हो रहे हैं.''

क़ानून बेअसर

सरकार ने भ्रूण हत्या के ख़िलाफ़ ‘प्री नेटल डायगनॉस्टिक टेकनीक्स एक्ट’ यानि पीएनडीटी एक्ट बनाया लेकिन यह क़ानून भी सख्ती से लागू नहीं हो पाया है.

‘ग्लोबल वॉक फॉर इंडियाज़ मिसिंग गर्ल्स’ की शुरुआत 2010 में हुई जब दिल्ली की मीतू खुराना ने अपनी निजी लड़ाई को आम लोगों से जोड़ने का फ़ैसला किया.

मीतू ने बताया, ''जब मैं गर्भवती हुई तो मेरे पति ने मेरा गर्भ परीक्षण करवाया और बेटियां होने पर मुझसे कहा कि मैं गर्भपात करवा लूं. मैंने अपनी बेटियों की हत्या करने से मना कर दिया और उनके ख़िलाफ़ पीएनडीटी एक्ट में केस दायर किया. हालांकि मुझे अपनी लड़ाई में हर क़दम मुश्किलों का समाना करना पड़ रहा है. ऐसे में मैंने आम लोगों को इस लड़ाई से जोड़ने का फ़ैसला किया.''

ये कैसी आज़ादी

निजी संघर्ष

इस साल मीतू और उनकी एक साथी नयना कापूटी ने भारत के अलावा भारतीयों की आबादी वाले दूसरे देशों में भी इस तरह की रैलियां आयोजित करने का फ़ैसला किया.

मीतू कहती हैं, ''वॉशिंगटन डीसी, कनाडा, टोरंटो, युगांडा, ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों के अलावा भारत के 17 शहरों में हमने इस तरह की रैलियों का आयोजन किया है. दुनियाभर के भारतीयों को इससे जोड़ने का मक़सद है भारत सरकार को शर्मिंदा करना और व्यापक स्तर पर जागरुकता फैलाना.''

Image caption इस मार्च का हिस्सा बने लोगों ने एक हस्ताक्षर अभियान भी चलाया है.

बच्चे-बूढ़े नौजवान और बड़ी संख्या में पुरुषों ने भी इस रैली में हिस्सा लिया और रंग-बिरंगे पोस्टरों-बैनरों के ज़रिए बेटियों को बचाने का संदेश दिया.

बदलाव की उम्मीद

'कैंपेन अगेंस्ट प्री बर्थ एलिमिनेशन आफ़ फीमेल्स' नामक संस्था से जुड़ी विजयलक्ष्मी नंदा कहती हैं, ''विदेशों में विकसित की जा रही तकनीकों का भारत में दुरुपयोग हो रहा है. भारत से लोग थाईलैंड में जाकर गर्भ परीक्षण करा रहे हैं. इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन मुद्दों को उठाना बेहद ज़रूरी है.''

कन्या भ्रूण हत्या के ख़िलाफ़ मीतू खुराना की लड़ाई में शामिल होने के लिए इस मार्च का हिस्सा बने लोगों ने एक हस्ताक्षर अभियान भी चलाया है.

देशभर से हज़ारों की संख्या में इक्कठा हुए इन हस्ताक्षरों को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के पास भेजा जाएगा, ताकि सरकार पर दबाव बने और पीएनडीटी जैसे क़ानूनों को असरदार बनाया जाए.

कुल मिलाकर दिल्ली, मुंबई, कनाडा या फिर युगांडा में उठ रही इन आवाज़ों का स्वर एक है कि औरतों के लिए मनाए जाने वाले जश्न और महिला दिवस तब तक अधूरे रहेंगे जब तक उनकी पैदाइश पर मातम मनाया जाएगा.

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