साइकिल पर चलती है अंग्रेज़ी की क्लास

Image caption आदित्य अपनी साइकिल पर ही लेते हैं अंग्रेज़ी की क्लास

भारतीय समाज में अंग्रेज़ी को आमतौर पर ऊँचे तबक़े की भाषा माना जाता रहा है.

वैश्वीकरण के बाद बीपीओ और मल्टीनेशनल कंपनियों के उभार ने लोगों का रुझान अंग्रेज़ी की तरफ़ मोड़ा और हर गली कूचे में अंग्रेज़ी सिखाने वाली संस्थाओं की बाढ़ सी आ गई.

फिर भी अंग्रेज़ी भारत के एक बड़े तबक़े के लिए विदेशी भाषा ही है.

ऐसे में लखनऊ के आदित्य ने अंग्रेज़ी को कार्यालयों और उच्च वर्ग से आम आदमी तक पहुँचाने का बीड़ा उठाया है.

आदित्य ने इस सफ़र के लिए अपना हमसफ़र भी आम आदमी की सवारी साइकिल को बनाया है.

इसकी शुरुआत का वाक़या भी बड़ा दिलचस्प है. फ़र्रुख़ाबाद से रोज़ी-रोटी की तलाश में वो 15 साल पहले लखनऊ आए और यहाँ पर ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया.

लेकिन उन्हें लगा कि अंग्रेज़ी भाषा सीखे बिना कम आमदनी वाले परिवारों के बच्चे तरक्की नहीं कर सकते हैं.

उनको जागरूक करने के लिए उन्होंने साइकिल से लखनऊ की सड़कों और गलियों की ख़ाक छाननी शुरू कर दी.

सड़कों पर क्लास

आदित्य बताते हैं कि भारत का एक बड़ा तबक़ा आज भी सड़कछाप कहलाता है.

वे कहते हैं, “जब मैंने अंग्रेज़ी को आम लोगों तक पहुँचाने की सोची तो सबसे पहले मेरे दिमाग में सड़क पर रहने वाले ये लोग ही थे. फिर मैं भी आर्थिक रूप से इतना सक्षम नहीं था. इसलिए मैने साइकिल कि मदद से सड़क पर ही अंग्रेज़ी सिखाने कि शुरुआत की.”

इसके लिए बस उन्हें अपनी साइकिल को थोड़ा दुरुस्त करना पड़ा. धीरे धीरे उन्हें लोग 'ऑनरोड अंग्रेज़ी शिक्षक' कहने लगे.

यहीं से शुरू हुआ सड़क पर क्लास लगाने का सिलसिला जो पिछले तीन साल से चल रहा है.

फ़िलहाल वे अपनी क्लास चौराहों और नुक्कडों पर चला रहे हैं. लेकिन आगे चलकर उनका उद्देश्य इसे झुग्गी झोपड़ियों तक पहुँचाने का है.

वे चाहते हैं कि हर झुग्गी झोपड़ी वाले मोहल्ले में उनकी एक साइकिल पहुँच सके. वे जीविकोपार्जन के लिए ट्यूशन भी पढ़ाते हैं और बाक़ी का वक़्त ओसीएल यानि 'ऑन रोड क्लास' को देते हैं.

आदित्य का मानना है कि आज के दौर में बिना कंप्यूटर और अंग्रेज़ी सीखे आगे बढ़ना बहुत ही मुश्किल है और अगर आपको बेहतर नौकरी पानी है तो आपको ये दोनों सीखने होंगे.

उनका कहना है कि अंग्रेज़ी भाषा में जो तकनीकी ज्ञान मिल सकता है वैसी किताबें दूसरी भाषाओं में कम ही हैं.

साथ ही अंग्रेज़ी की किताबें हर जगह उपलब्ध भी हैं.

अंग्रेज़ी सिखाने के लिए आदित्य ने ख़ास तरह के नौ सेट में मोड्यूल भी विकसित किए हैं.

अंग्रेज़ी से होगा कल्याण

आदित्य कहते हैं कि अंग्रेज़ी से दलितों को भी आगे बढ़ने में मदद मिलेगी. उनका मानना है कि सिर्फ़ आरक्षण से नहीं बल्कि ज़माने के साथ आगे बढ़ने से ही दलित समाज मुख्य धारा में शामिल हो सकता है. और इसके लिए उन्हें अंग्रेज़ी सीखनी ही होगी.

वे बताते हैं, “ऐसे लोगों को अंग्रेज़ी पढ़ाने का एक बड़ा कारण ये भी रहा कि मुझे ख़ुद दलित होने का ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा था. लोग मुझसे अपने बच्चों को इसलिए नहीं पढ़वाना चाहते थे क्योंकि मैं दलित था.”

कभी-कभी रोड पर क्लास लेने के कारण उन्हें परेशानियां भी उठानी पड़ी हैं. इसके लिए वो अपना वीडियो कैमरा साथ रखते हैं जिससे रोड पर जो भी उनकी क्लास में शामिल हो उसका रिकॉर्ड रख सकें.

आदित्य के साथ काम करने वाला और उनसे अंग्रेज़ी सीखने वाला अनूप बताता है कि आदित्य सर से अंग्रेज़ी पढ़ने के बाद अब उसे अंग्रेज़ी बोलने में हिचक नहीं होती.

अपने भविष्य के बारे में आदित्य का कहना है कि अब इसी काम को आगे बढ़ाना है... कुछ और करने की सोची नहीं है.

संबंधित समाचार