भ्रष्टाचार को लेकर उद्योगजगत चिंतित

भारतीय नोट
Image caption पिछले एक साल में भारत में भ्रष्टाचार के कई गंभीर मामले सामने आए हैं

एक सर्वेक्षण में पता चला है कि भारत में उद्योगपति मानते हैं कि भ्रष्टाचार देश की उन्नति के रास्ते में रुकावट पैदा कर रहा है.

प्रबंध सलाहकार कंपनी केपीएमजी ने एक सर्वेक्षण में भ्रष्टाचार और रिश्वत से जुड़े मामलों के प्रति कई बड़ी कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों और मुख्य वित्तीय अधिकारियों का रुख़ जानने की कोशिश की.

सर्वेक्षण के मुताबिक उद्योगपतियों का ये मानना है कि आए दिन भ्रष्टाचार के मामले सामने आने से विश्व भर में भारत की छवि को नुक़सान पहुंच रहा है.

93 प्रतिशत कारोबारियों का मानना है कि भ्रष्टाचार का नकारात्मक असर भारत के बाज़ार पर भी पड़ रहा है. साथ ही ज़्यादातर उद्योगपतियों ने कहा कि भ्रष्टाचार और रिश्वत के बढ़ते मामलों की वजह से भारत में विदेशी निवेश में भी गिरावट आ सकती है.

केपीएमजी के सर्वेक्षण के मुताबिक क़रीब 68 प्रतिशत उद्योगपतियों का मानना है कि अगर भ्रष्टाचार को जड़ से ख़त्म कर दिया जाए, तो भारत की अर्थव्यवस्था नौ फ़ीसदी का अनुमानित आंकड़ा पार कर सकती है.

जबकि 31 प्रतिशत व्यावसायियों का कहना है कि बढ़ता भ्रष्टाचार अर्थव्यवस्था में नौ प्रतिशत की अनुमानित वृद्धि को कम कर सकता है जिससे कि राजनीतिक और व्यावसायिक माहौल में अस्थिरता आ सकती है.

‘रियल एस्टेट सबसे भ्रष्ट’

केपीएमजी के सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में रियल एस्टेट का क्षेत्र सर्वाधिक भ्रष्ट है जबकि दूरसंचार विभाग को इस तालिका में दूसरा स्थान दिया गया है.

उल्लेखनीय है कि साल की शुरुआत में भारत के 14 प्रमुख उद्योगपतियों ने एक खुले पत्र में कहा था कि देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार पर काबू पाने की ज़रुरत है.

वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने भी इस वित्तीय वर्ष का बजट पेश करते हुए भ्रष्टाचार के बढ़ते मामलों पर चिंता जताई थी और कहा था कि इस समस्या का सामना करना सरकार की प्राथमिकता होगी.

लेकिन सर्वेक्षण के मुताबिक भारतीय उद्योगपतियों को ये नहीं लगता कि सरकार भ्रष्टाचार और रिश्वत के बढ़ते मामलों पर रोक लगा सकती है.

जब उद्योगपतियों से पूछा गया कि अगले दो वर्षों में उन्हें भ्रष्टाचार के मामलों में कमी आती हुई दिखती है या नहीं, तो 46 प्रतिशत ने कहा कि भारत में भ्रष्टाचार की स्थिति ज्यों की त्यों रहेगी.

उनका कहना है कि केंद्रीय सतर्कता आयुक्त द्वारा प्रस्तावित भ्रष्टाचार निरोधी योजनाएं और सूचना के अधिकार के क़ानून को लागू किए जाने के बावजूद इस समस्या को जड़ से ख़त्म नहीं किया जा सकता.

रिपोर्ट में लिखा है कि भ्रष्टाचार निरोधी क़ानून का अमल न होना, कारोबार में राजनीतिक दखल, दोषियों को सज़ा न मिलना और न्यायिक मामलों में विलंब होना बढ़ते भ्रष्टाचार के मुख्य कारण हैं.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पिछले महीने कहा था कि भ्रष्टाचार देश की शासन प्रणाली की जड़ों को खोखला कर रहा है.

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि जिन देशों में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, वहां दीर्घकालिक निवेश में कमी आ सकती जिससे आर्थिक वातावरण को नुकसान पहुंच सकता है.

विश्व बैंक ने भी आर्थिक और सामाजिक विकास के मार्ग में भ्रष्टाचार को सबसे बड़ी रुकावट बताया है.

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