उत्तर प्रदेश में मेयर चुनाव पर खींचतान

  • 17 मार्च 2011
मुख्यमंत्री मायावती
Image caption 2012 में उत्तर प्रदेश में विधान सभा के चुनाव भी प्रस्तावित हैं

उत्तर प्रदेश में 2011 की अंतिम तिमाही में प्रस्तावित शहरी स्थानीय निकायों की प्रक्रिया को लेकर मुख्यमंत्री मायावती की सरकार और सम्पूर्ण विपक्ष के बीच भारी टकराव नज़र आने लगा है.

मायावती ने चुनाव नियमों में संशोधन करके नगरीय चुनावों में दलीय प्रणाली ख़त्म कर दी है और मेयर का चुनाव जनता से सीधे कराने के बजाय सभासदों के ज़रिये कराने का प्रस्ताव किया है.

विपक्ष इसे असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक बता रहा है. अब इन प्रस्तावों की वैधता के बारे में फैसला गवर्नर को करना है.

मायावती सरकार ने पिछले बजट सत्र में भारी हंगामे के बीच बिना चर्चा कराए ही नगर निकाय चुनाव कानून में संशोधन का विधेयक पारित कर गवर्नर के पास हस्ताक्षर के लिए भेज दिया.

इस विधेयक में मेयर अथवा चेयरमैन का चुनाव जनता से कराने के बजाय सभासदों से कराने का प्राविधान है.

सरकार द्वारा मनोनीत सभासदों की संख्या बढाने के साथ-साथ उन्हें मतदान का अधिकार भी दे दिया गया.

पहले ऐसा नहीं था. विपक्ष का आरोप है कि मेयर का चुनाव जीतने के लिए मनोनीत सदस्यों की संख्या बढ़ाकर उन्हें मतदान का अधिकार दिया गया.

प्रस्तावित नियम में मेयर का चुनाव सभासद करेंगे लेकिन मेयर होने के लिए सभासद होने की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई है.

इसी के साथ एक और नियमावली बदल कर नगरीय चुनावों में दलीय प्रणाली ख़त्म कर दी गई है वो ये है कि चुनाव जीतने के बाद कोई सभासद कभी भी किसी दल में शामिल हो सकता है.

इसका फ़ायदा हमेशा सत्ताधारी दल को मिलता है.

मुख्यमंत्री मायावती ने प्रेस कांफ्रेंस करके सफ़ाई पेश की कि ग्रामीण पंचायतों के चुनाव पहले से बिना दलीय आधार पर होते रहे हैं और ज़िला पंचायतों के अध्यक्ष भी परोक्ष रूप से चुने जाते हैं.

मुख्यमंत्री का कहना है कि 74वें संविधान संशोधन से पहले उत्तर प्रदेश में मेयर चुनाव सभासदों के ज़रिए ही होते थे.

उनका कहना है कि अब भी दूसरे कई राज्यों में मेयर चुनाव परोक्ष रूप से होते हैं जहां भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस या अन्य विपक्षी दलों की सरकारें हैं.

लेकिन प्रदेश के विपक्षी दल मायावती के इस तर्क से सहमत नही हैं.

'कुठाराघात'

उत्तर प्रदेश के शहरी निकायों में सबसे ज़्यादा मेयर भारतीय जनता पार्टी के हैं.

पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व नगर विकास मंत्री लाल जी टंडन का आरोप है कि मायावती का यह क़दम संसदीय लोकतंत्र पर कुठाराघात है.

लाल जी टंडन कहते हैं, “उत्तर प्रदेश में 1959 में नगर निगम क़ानून बना था. 1960 में पहला चुनाव हुआ. तब से अब तक दलगत आधार पर ही चुनाव होते रहे हैं. इस बार उन्होंने बड़ी चालाकी के साथ ये कर दिया कि सभासदों के चुनाव पार्टी सिम्बल पर नही होंगे. यानी संसदीय लोकतंत्र की जो दलीय व्यवस्था है उसको उन्होंने एक चोट में ख़त्म कर दिया.”

Image caption मायावती पर सत्ता के दुरुपयोग का भी आरोप लगता है

शहरी क्षेत्रों में बहुजन समाज पार्टी कमज़ोर मानी जाती है. 2006 में हुए पिछले नगर निकाय चुनावों में बहुजन समाज पार्टी - बसपा ने हिस्सा नहीं लिया था.

निर्वाचित नगरीय निकायों का कार्यकाल अक्तूबर 2011 में ख़त्म हो रहा है और कुछ ही महीनों बाद 2012में विधान सभा चुनाव भी प्रस्तावित हैं.

लखनऊ विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता डॉक्टर रमेश दीक्षित कहते हैं कि मायावती अगले विधान सभा चुनाव से पहले किसी तरह नगरीय निकायों पर क़ब्ज़ा करना चाहती हैं.

रमेश दीक्षित कहते हैं, “एक बात बिल्कुल साफ़ है कि मायावती विधान सभा चुनाव से पूर्व सारे निगमों पर क़ब्जा कर लेना चाहती हैं. उनके पास इसके अलावा और कोई चारा नही है कि अप्रत्यक्ष चुनाव कराएं और धन्नासेठों के माध्यम से सारे सभासद ख़रीद लें.”

उत्तर प्रदेश में कुछ महीनों पहले ही ज़िला पंचायतों के चुनाव हुए थे. मीडिया में ख़बरें छपीं थीं कि सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी ने इन चुनावों में सरकारी तंत्र का खुल्लम-खुल्ला दुरूपयोग किया और बेशुमार धन ख़र्च करके अधिकाँश ज़िला पंचायतों पर क़ब्जा कर लिया.

वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान का कहना है कि बी एस पी शहरी निकायों में भी यही प्रयोग दोहराना चाहती है, “मेयर का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से होगा तो आम मतदाता चुनेंगे, अगर सभासद चुनाव में हिस्सा लेंगे तो उन्हें बड़े आराम से ख़रीदा जा सकेगा. ख़रीद फ़रोख़्त में तो ये आगे हैं. धन इनके पास इफरात में है.”

मुख्यमंत्री मायावती का तर्क है कि मेयर और सभासदों में बेहतर तालमेल के लिए चुनाव प्रक्रिया बदली जा रही है. इससे शहरों के विकास को गति मिलेगी.

लेकिन आलोचकों का कहना है कि मायावती की निगाहें शहरों के विकास के लिए केंद्र से मिलने वाले धन पर हैं. पूर्व नगर विकास मंत्री भाजपा नेता लालजी टंडन का कहना है कि बिना दलीय अनुशासन और परोक्ष चुनाव से नगरीय निकाय बर्बाद हो जाएंगे.

यह एक ऐसा मुद्दा है जिसमे भाजपा, कांग्रेस समाजवादी पार्टी यानी सम्पूर्ण विपक्ष सरकार के ख़िलाफ़ हैं.

सभी दलों ने गवर्नर को ज्ञापन देकर चुनाव क़ानून में बदलाव को मंज़ूरी न देने की मांग की है.

गर्वनर बी एल जोशी ने अभी कोई निर्णय नहीं किया है और गवर्नर की मंज़ूरी नहीं मिलती है तो सरकार को मेयर चुनाव सीधे जनता से कराने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है.

मुख्यमंत्री मायावती का कहना है, “विरोधी पार्टियां महामहिम राज्यपाल पर अनुचित दबाव डाल रही हैं और यदि ये चुनाव होने से पहले यह मामला किसी तरह साफ़ नहीं होता तो फ़िर स्वाभाविक है कि पुरानी प्रक्रिया से ही कराए जाएंगे. ऐसा होता है तो विकास में भरोसा रखने वाली शहरी जनता विरोधी पार्टियों को बिल्कुल भी माफ़ नहीं करेगी. इसका सीधा लाभ इन चुनावों में हमारी पार्टी को मिलेगा.”

मुख्यमंत्री मायावती के बयान से लगता है कि गवर्नर विधेयक को मंज़ूरी नहीं देंगे.

मगर राजनीतिक हलकों में कहा जा रहा कि विधान सभा चुनाव से पहले मायावती शहरी चुनावों में हार का जोखिम नही लेना चाहेंगी.

इसलिए यह भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि मायावती ये चुनाव टालने की भी कोशिश कर सकती हैं.