डंकन और वाल्टर्स की सज़ा बरक़रार

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Image caption पुलिस के मुताबिक़ कई बार लड़कों को कथित तौर पर विदेशियों के साथ गोआ भी भेजा जाता था.

सर्वोच्च न्यायालय ने दो ब्रितानी नागरिकों डंकन ग्रांट और ऐलन जॉन वॉल्टर्स के ख़िलाफ़ निचली अदालत के उस फ़ैसले को बरक़रार रखा है जिसमें उन्हें सड़क पर रहने वाले कम उम्र के लड़कों के यौन शोषण का दोषी बताया गया था.

इन दोनो को छह साल की सज़ा हुई थी. अदालत के आदेश के मुताबिक़ इन्हें अब अपनी बची हुई सज़ा पूरी करनी होगी.

इस मामले में एक तीसरे भारतीय व्यक्ति विलियम डिसूज़ा को भी तीन साल की सज़ा हुई थी. वो अपनी सज़ा पूरी कर चुके हैं.

दरअसल बांबे हाईकोर्ट ने 2006 के निचली अदालत के उस फ़ैसले को उलट दिया था जिसमें तीनों व्यक्तियों को दोषी बताया गया था.

हाईकोर्ट के फ़ैसले को चुनौती देते हुए एक ग़ैर-सरकारी संगठन 'चाइल्ड लाइन इंडिया फ़ाउंडेशन' और महाराष्ट्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया था.

2001 का वाक़्या

ये कहानी शुरू होती है वर्ष 2001 में जब एक पत्रकार मेहर पेस्तोनजी मुंबई के कोलाबा स्थित ऐंकरेज नाम के अनाथालय में गईं तो वहाँ बच्चों ने उन्हें उनके साथ हो रहे कथित यौन शोषण के बारे में बताया.

मेहर ने एक वकील माहरुख़ एडेनवाला को पूरा क़िस्सा बताया. माहरुख़ ने हाईकोर्ट की बनाई हुई एक कमेटी को ये बात बताई जिसने ऐंकरेज का दौरा किया.

अपनी रिपोर्ट में कमेटी ने हाईकोर्ट को सड़क पर रहने वाले बच्चों के साथ होने वाले कथित यौन शोषण पर गहरा संदेह जताया और पुलिस जाँच की सिफ़ारिश की.

इसके बाद 'चाइल्ड लाइन फ़ाउंडेशन' ने नज़दीकी पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करवाई.

इस पूरी जाँच में अनाथालय के दो लड़कों ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

उच्चतम न्यायालय के आदेश पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए माहरुख़ ने कहा, ''मैं बेहद ख़ुश हूँ कि न्यायालय ने उन दो बच्चों की बातों पर विश्वास किया. इन दोनों ही बच्चों ने बहुत हिम्मत दिखाई. उन्होंने पुलिस के सामने पूरी कहानी सुनाई. ये उनके लिए बहुत बड़ी बात है. उन्होंने बचाव पक्ष के वकील के कड़े सवालों का सामना किया.''

लेकिन बचाव पक्ष के मुताबिक़ माहरुख़ की बातें कही-सुनी थीं और उसका असलियत से कोई ताल्लुक़ नहीं है. जिन बातों का ज़िक्र बच्चों ने किया है वो धारा 377 के अंतर्गत अपराध नहीं है.

बांबे हाईकोर्ट ने जब इन दोनो को बरी किया था, तब अपने आदेश में इन्हीं सब कारणों का ज़िक्र था. लेकिन शुक्रवार को सर्वोच्च न्यायालय ने हाईकोर्ट के फ़ैसले को पलट दिया और निचली अदालत के फ़ैसले को बरक़रार रखा.

दरअसल पुलिस ने जाँच में कहा था कि डंकन ग्रांट और ऐलन वॉल्टर्स 'ऐंकरेज शेल्टर्स' में सड़क पर रहने वाले ऐसे लड़कों को अपने पास रखा करते थे जिनकी उम्र आठ से 18 साल के बीच थी.

पुलिस के मुताबिक़ ये दोनो लोग इन बच्चों का कथित तौर पर यौन शोषण करते थे. साथ ही विदेश से आने वाले लोगों के सामने भी इन्हें पेश किया जाता था.

पुलिस के मुताबिक़ कई बार लड़कों को कथित तौर पर विदेशियों के साथ गोआ भी भेजा जाता था.

विदेशों से भारत लाया गया

यहाँ ये बता दें कि जब ये कहानी आम हुई तो ग्रांट और वॉल्टर्स ने देश से भागने की कथित तौर पर कोशिश भी की थी. वॉल्टर्स को इंटरपोल के अलर्ट के बाद न्यूयॉर्क हवाईअड्डे पर पकड़ा गया, और काफ़ी लंबी कोशिशों के बाद भारत लाया गया. डंकन ग्रांट तंज़ानिया चले गए थे, जहाँ से वो ब्रिटेन गए, लेकिन बाद में उन्हें भारत आना पड़ा.

ऐलन और डंकन भागने के आरोपों से इंकार करते रहे हैं. बचाव पक्ष के मुताबिक़ जब पुलिस की जाँच शुरू हुई तो वो भारत में नहीं थे, और बाद में वो भारत वापस आए.

बचाव पक्ष के वकील तारिक़ सईद का कहना था, ''ऑर्डर की कॉपी मिलने के बाद ऐलन और डंकन समर्पण कर देंगे. दोनो अभी मुंबई में हैं. जहाँ तक आदेश के खिलाफ़ एक रिव्यू पिटीशन फ़ाइल करने का सवाल है, उसके बारे में मुझे फ़िलहाल पता नहीं है, लेकिन इस बारे में अभी कोई विचार नहीं किया गया है. ऐलन पाँच साल जेल में गुज़ार चुके हैं, उन्हें एक साल और जेल में रहना होगा. डंकन करीब तीन साल जेल में रह चुके हैं तो उन्हें क़रीब तीन साल और जेल में रहना होगा.''

उधर 'चाइल्ड लाइन इंडिया फ़ाउंडेशन' की कार्यकारी निदेशक काजोल मेनन के मुताबिक़ सड़क पर रहने वाले बच्चे बेहद असुरक्षित हालात में रहते हैं और उनके हालात बेहद ख़राब है.

वो कहती हैं, ''हमें पता है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए एक विधेयक है जिसे दोनों ही सदनों की स्वीकृति मिलना बाक़ी है. उम्मीद है कि इस केस से कुछ सकारात्मक बातें निकलकर आएँगी.''

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