‘सरकार मुसलमानों से माफ़ी मांगे’

असदुद्दीन ओवैसी
Image caption असदुद्दीन ओवैसी लोक सभा सदस्य हैं और मजलिस-इ-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष.

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक स्वामी असीमानंद यह स्वीकार कर चुके हैं कि मालेगांव में 2006 में हुए बम विस्फोट में उनका और कुछ अन्य हिंदू चरमपंथियों का हाथ था.

फिर भी महाराष्ट्र की मकोका अदालत ने उन नौ मुस्लिम युवाओं को ज़मानत पर रिहा करने से इंकार कर दिया है जिन्हें इस विस्फोट के संबंध में गिरफ्तार किया गया था. ये युवक अब भी जेलों में बंद हैं.

अदालत की मनाही, केंद्रीय जांच ब्यूरो की ओर से ज़मानत का विरोध और महाराष्ट्र सरकार की खामोशी ने मुस्लिम समुदाय के नेताओं को नाराज़ कर दिया है और वो अब हिंदू आतंकवाद सहित इस विषय को प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह के सामने उठाने की योजना बना रहे हैं.

हैदराबाद से लोक सभा सांसद और मजलिस-इ-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में कहा है कि प्रधानमंत्री और सरकार को मुसलमानों से माफ़ी माँगनी चाहिए.

उनका कहना है कि बम विस्फोटों के संदेह पर मुस्लिम समुदाय के साथ बहुत ज़्यादतियां की गई हैं और अब यह स्पष्ट हो गया है की यह काम मुसलमानों ने नहीं बल्कि हिन्दू कट्टरपंथियों ने किया था.

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के कुछ अंश:

स्वामी असीमानंद ने बार-बार यह स्वीकार किया है कि मालेगांव, हैदराबाद और अजमेर जैसे अनेक स्थानों पर जो विस्फोट हुए थे उनमें वो शामिल थे. उनके इस बयान से जो स्थिति पैदा हुई है उस पर आपका क्या कहना है?

ओवैसी: असीमानंद ने मजिस्ट्रेट के सामने सीआरपीसी की धारा 164 के अंतर्गत जो इकबालिया बयान दिया है इससे स्पष्ट रूप से यह बात सामने आती है कि मालेगांव बम धमाके, मक्का मस्जिद, समझौता एक्सप्रेस और अजमेर इन सब विस्फोटों में मुसलमानों का नहीं बल्कि हिंदू कट्टरपंथी संगठनों और आरएसएस से संबंध रखने वालों का हाथ था.

उन्होंने ये षड्यंत्र रचा और विस्फोट करवाए. अब जब इस अपराध को स्वीकार कर लिया गया है, तो ज़ाहिर है कि सबसे पहले महाराष्ट्र सरकार का यह फ़र्ज़ बनता है कि वो उन मुस्लिम युवाओं को रिहा करे जिनपर अब तक ज़ुल्म हुआ है, और जिन्हें 2006 के मालेगांव विस्फोट के संबंध में पकड़ा गया था.

उन पर ज़ुल्म यह हुआ कि चार्जशीट दर्ज करने के बाद इस मामले की छानबीन सीबीआई को सौंपी गई. चार्जशीट बहुत अहम होती है और एक बार चार्जशीट बन गई तो कोई भी जांच एजेंसी उसी के अनुसार जाँच करेगी.

अब सीबीआई के पास क्या जवाब है? महाराष्ट्र सरकार की कानूनी और नैतिक ज़िम्मेदारी है कि असीमानंद के बयान के बाद वो एक आदेश जारी करे और उन नौ युवाओं को रिहा करे जिन्हें कैद में रखकर यातनाएं दी गई हैं.

इनकी ज़मानत की अर्ज़ी दी गई थी लेकिन अब उसकी ज़रुरत नहीं है. यह सरकार का काम है कि वो इन बच्चों पर लगाए गए आरोप वापस ले और उन्हें रिहा किया जाए.

जब असीमानंद ने सीबीआई और राष्ट्रीय जांच एजेंसी के सामने यह बयान दिया है और अपराध स्वीकार किया है तो फिर सीबीआई का भी काम है की वो केस बंद करने की रिपोर्ट अदालत में दाखिल करे.

दूसरी बात यह है की केंद्र सरकार की गुप्तचर एजेंसियों में जैसे मुस्लिम संगठनों की निगरानी के लिए सेल है उसी तरह हिंदू संगठनों पर नज़र रखने के लिए भी सेल होना चाहिए. यह बात स्पष्ट है कि चरमपंथियों का कोई धर्म नहीं होता.

ये अजीब बात है कि मुसलमानों पर जो ज़्यादतियां हुई हैं वो आंध्र प्रदेश में हुई हैं और महाराष्ट्र में हुई हैं जहाँ कांग्रेस की सरकार है. क्या इसका मतलब है कि सरकार चाहे कांग्रेस की रहे याभारतीय जनता पार्टी की दोनों का व्यवहार एक जैसा ही रहेगा?

ओवैसी: अगर कोई आतंकवादी घटना घटती है तो सभी की सोच यही रहती है कि आतंकवादी कोई मुसलमान ही हो सकता है. यह जो पक्षपात है और लोगों के मन में जो गलत सोच बन गई है ये गिरफ्तारियां उसी का एक उदाहरण हैं.

न केवल आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र बल्कि हरियाणा और राजस्थान में भी कांग्रेस की सरकार है. जब कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह बार बार टीवी पर यह कहते हैं की इन घटनाओं के लिए आरएसएस ज़िम्मेदार है तो फिर उनकी पार्टी की सरकार कुछ क्यों नहीं कहती.

पार्टी को कहना चाहिए कि आंध्र प्रदेश में पुलिस की गलती के खिलाफ़ कर्रवाई की जाए. महाराष्ट्र में भी पुलिस के खिलाफ़ कर्रवाई की जाए. राजस्थान में भी कार्रवाई हो जहाँ अजमेर दरगाह विस्फोट के बाद कोलकाता से आए हुए मुसलमानों को लंबे समय तक परेशान किया गया. उन्हें गिरफ़्तार करके मारा गया.

आप केंद्र और राज्य सरकार से क्या मांग करना चाहते हैं?

ओवैसी: तमाम गुप्तचर और छानबीन करने वाली एजेंसियों में एक ऐसा सेल होना चाहिए जो सभी धार्मिक संगठनों पर नज़र रखे. मैं केवल हिंदू संगठनों की बात नहीं कर रहा हूँ, सबकी कर रहा हूँ क्योंकि अच्छे-बुरे लोग हर जगह हो सकते हैं. सिर्फ मुसलमानों पर या इस्लाम धर्म को मानने वालों पर नज़र रखना गलत बात है.

मैं प्रधानमंत्री से भी मांग करता हूँ कि वो पूरे राष्ट्र और देश को बताएं की इन विस्फोटों में मुसलमानों का हाथ नहीं था. सिर्फ दिग्विजय सिंह के बयान देने से उतना असर नहीं पड़ता जितना कि भारत सरकार के यह कहने से पड़ता है की इन विस्फोटों से मुसलमानों का संबंध नहीं है.

मुसलमानों से माफ़ी मांगने पर केंद्र सरकार की इज़्ज़त नहीं चली जाएगी. अगर आस्ट्रेलिया की सरकार मोहम्मद हनीफ़ की गलत गिरफ़्तारी और उन पर ज़्यादतियों के लिए माफ़ी मांग सकती है, उन्हें मुआवज़ा दे सकती है तो भारत सरकार खुद अपने नागरिकों से माफ़ी क्यों नहीं मांग सकती.

आरएसएस एक अनुसाशित संगठन है और वहां कोई मनमानी नहीं कर सकता इसलिए छानबीन आरएसएस के नेतृत्व से शुरू होनी चाहिए.

हम आरएसएस नेता मोहन भागवत के इस बयान को स्वीकार नहीं कर सकते कि कट्टरपंथी लोगों को निकल दिया. असल में जो बड़े नेता हैं उनके खिलाफ़ छानबीन होनी चाहिए.

अपनी मांग मनवाने के लिए आप एक सांसद के रूप में क्या करने का इरादा रखते हैं?

ओवैसी: मैं तमाम मुस्लिम सांसदों के एक प्रतिनिधि मंडल के साथ जल्द ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलूंगा. हम उनसे कहेंगे कि जब तक केंद्र सरकार सीधे इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगी यह समस्याएँ हल नहीं होंगी.

केंद्र सरकार यह कहकर हाथ नहीं झाड़ सकती कि यह केस राष्ट्रीय जांच एजेंसी को दे दिया गया है. हम चाहते हैं कि सरकार हमें आश्वास्त करे कि छानबीन सही दिशा में आगे बढ़ेगी और असली अपराधी पकड़े जाएंगे.

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