नक्सलवाद का 'अमरीकी इलाज'

  • 24 मार्च 2011
Image caption नक्सलवाद से निपटने के लिए अमरीकी तरीके.

विकीलीक्स पर जारी अमरीकी कूटनीतिक संदेशों से पता चला है कि अमरीका की नज़र में नक्सलवाद की समस्या का हल भूमि सुधार और ग्रामीण भारत में सामंतवादी व्यवस्था को ख़त्म करना है लेकिन ऐसे क़दम उठाए जाने की संभावना कम है.

हिन्दू अख़बार में छपे विकीलीक्स के ताज़ा दस्तावेज़ों के अनुसार अमरीकी मानते हैं कि ग्रामीण भारत में मौजूद सामंतवादी व्यवस्था से ग़रीब लोगों का शोषण होता है.

अमरीकी दूतावास से आठ दिसंबर 2005 को भेजे गए गुप्त संदेश में अमरीकी राजदूत डेविड मलफ़र्ड ने लिखा कि इस बात के संकेत कम ही है कि भारत सरकार इस तरह के कदम उठाएगी.

'चुनौती नहीं, पर ख़त्म भी नहीं कर सकते'

डेविड़ मलफ़र्ड ने लिखा कि जब तक भारतीय राजनीतिक पार्टियाँ और उच्च वर्ग मौजूदा स्थिति को स्वीकार नहीं करता और सामंतवादी लोगों का पक्ष लेना नहीं छोड़ता तब तक ये संघर्ष चलता रहेगा.

गुप्त संदेश के अनुसार, "भारत की अर्थव्यवस्था में लगातार बढ़ोतरी के बावजूद ग़रीब ग्रामीण भारत में नक्सलवादी संगठन और शहरों में नक्सलादियों से सहानुभूति रखने वाले पढ़े-लिखे लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है. नक्सलवादियों का प्रभाव 12 राज्यों में फैल चुका है और नक्सलवादी आसानी से सरकारी ढ़ांचे को नुक्सान पहुँचा सकते हैं."

अमरीकी राजदूत का आकलन है कि भारत के दूरदराज़ के इलाकों में रहने वाले अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाती के लोग हताशा की ज़िदंगी गुज़ारते हैं और उन्हें लगता है कि नक्सलवादी ही उन्हें इससे बचा सकते हैं.

आकलन में ये भी कहा गया है कि इस बात की संभावना नहीं है कि नक्सलवादी भारत सरकार को कोई चुनौती दे सकें और इसकी संभावना भी नहीं है कि भारत पुलिस बल का इस्तेमाल करके नक्सलवाद को ख़त्म कर सके .

इस गुप्त संदेश में आशंका जताई गई है कि सबसे अधिक संभावना इस बात की है कि ये खू़नी संघर्ष चलता रहे.

गुप्त संदेश में कहा गया है कि हालांकि नक्सलवादी दावा करते हैं कि वो भारत के दबे कुचली अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन नक्सलवादियों का नेतृत्व ऊँची जाति के अच्छे पढ़े लिखे लोगों के हाथ में है.

इन दस्तावेज़ों में कहा गया है कि पढ़े लिखे मध्यम वर्ग के लोगों के समर्थन के बिना नक्सलवाद का इतना विस्तार नहीं हो सकता था.

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