छह ग्रामीणों की मौत, वजह भूख या बीमारी?

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Image caption ये वही इलाका है जहां इसी महीने आदिवासियों के 300 घरों में आग लगा दी गई थी.

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा ज़िले के चिंतलनार इलाक़े में पिछले 14 मार्च को सुरक्षा बलों के कथित तांडव की आग अभी बुझी भी नहीं थी कि इस इलाक़े के मोरपल्ली में मौत ने दस्तक देनी शुरू कर दी है.

ख़बरें आ रही हैं कि मोरपल्ली में कम से कम छह ग्रामीणों की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई है.

कहा जा रहा है कि ये मौतें भूख की वजह से हुई हैं मगर ज़िला प्रशासन का कहना है कि इन मौतों की वजह बीमारी भी हो सकती है.

बहरहाल इस मामले की जांच के आदेश दे दिए गए हैं. ख़बर है कि जांच दल मोरपल्ली के लिए रवाना भी हो गया है. दंतेवाड़ा के कलक्टर आर प्रसन्ना ने बीबीसी को बताया कि उन्हें भी ऐसी ख़बर मिली है कि मोरपल्ली के इलाक़े में कुछ लोगों की मौत हुई है.

आर प्रसन्ना का कहना था, "कितने लोग मरे हैं और कैसे मरे हैं अभी तक स्पष्ट नहीं है. हमने एक जांच दल का गठन किया है. इस दल में चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मियों के अलावा स्थानीय सरकारी कर्मचारी भी शामिल हैं." कलक्टर प्रसन्ना का कहना है कि जांच के बाद ही यह पता चल पाएगा कि मौत की वजह क्या है. बताया जा रहा है कि मरने वालों में सभी माड़िया आदिम जनजाति के लोग हैं.

आगज़नी का आरोप

यह वही इलाका है जहां पिछले 14 मार्च को सुरक्षा बलों के जवानों ने कथित रूप से आदिवासियों के लगभग 300 घरों में आग लगाई थी.

जवानों पर आरोप है कि उन्होंने महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया और कुछ ग्रामीणों को गोली भी मार दी. इस घटना के बाद दंतेवाड़ा प्रशासन और ज़िला पुलिस आमने-सामने आ गए.

दंतेवाड़ा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक एस आर पी कल्लूरी का कहना था कि इस तरह की कोई घटना घटी ही नहीं है और यह सबकुछ माओवादियों का प्रचार मात्र है. वहीं दंतेवाड़ा के ज़िलाधिकारी आर प्रसन्ना ने इस मामले की जांच के आदेश दे दिए. हद तो तब हो गई जब पुलिस ने राहत सामग्री लेकर जा रहे बस्तर संभाग के आयुक्त के श्रीनिवासलु, दंतेवाड़ा के कलक्टर और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों को घटना स्थल पर जाने से रोक दिया.

इतना ही नहीं राहत सामग्री लेकर जा रहे वाहनों के ड्राइवरों और मालिकों के साथ विशेष पुलिस अधिकारी और सलवा जुडूम के कार्यकर्ताओं ने मारपीट भी की. पुलिस का रवैय्या देख अधिकारियों को ताड़मेटला से वापस लौटना पड़ा.

अग्निवेश पर हमला

इसके बाद पुलिस के कोपभाजन का शिकार हुए स्वामी अग्निवेश और पत्रकार जिनपर विशेष पुलिस अधिकारियों और सलवा जुडूम के कार्यकर्ताओं ने हमले किए.

स्वामी अग्निवेश की गाड़ी पर अंडे फेंके गए, राहत सामग्री को लूटा गया और पत्रकारों के कैमरे और मोबाइल फोन भी छीन लिए गए.

पुलिस ने किसी भी शख़्स को घटना स्थल पर जाने से रोकना शुरू कर दिया. नतीजा यह हुआ कि प्रशासन की तरफ़ से जो राहत सामग्री और मुआवज़ा पीड़ितों को मिलना था, वह मिल नहीं पाया क्योंकि कुछ सुदूरवर्ती गांव ऐसे हैं जहां पहुंचा ही नहीं जा सका है. मोरपल्ली उनमें से एक है. पुलिस की इस हरकत के बाद प्रशासन और पुलिस के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई और बस्तर संभाग के कमिश्नर के श्रीनिवासलु ने मुख्यमंत्री से मुलाक़ात कर आपत्ति जताई.

Image caption आगज़नी का आरोप सुरक्षा बलों पर लगा था.

इससे सरकार के सामने एक अजीब स्थिति पैदा हो गई और शनिवार देर शाम मुख्यमंत्री के आदेश के बाद दंतेवाड़ा के वरिष्ट पुलिस अधीक्षक एस आर पी कल्लूरी और ज़िलाधिकारी आर प्रसन्ना को हटा दिया गया. कल्लूरी की बात तो समझ में आती है मगर सवाल उठता है कि प्रसन्ना को आख़िर क्यों हटाया गया. प्रसन्ना इस सुदूर अंचल में एक लोकप्रिय अधिकारी के रूप में जाने जाते हैं. इससे पहले भी उन्हें जब बीजापुर से हटाया गया था तो ग्रामीणों ने इसके विरोध में पूरे ज़िले को बंद रखा था. सरकारी गलियारों में चर्चा है कि चिंतलनार की घटना के बाद राज्य के आईएएस और आईपीएस लॉबी के बीच भी टकराहट की स्थिति पैदा हो गई है.

एक तरफ़ पुलिस के अधिकारी घटना की जांच के ख़िलाफ़ थे तो प्रशासनिक अधिकारी इस बात से ख़फ़ा थे कि एक एसपी भला संभाग के आयुक्त को कैसे रोक सकता है. कहा जा रहा है कि दोनों अधिकारियों को दंतेवाड़ा से हटाकर सरकार ने मामले को सुलझाने की कोशिश की है. सरकार भले की अफसरशाही के टकराव को रोकने में क़ामयाब हो गई है, मगर सामाजिक संगठन मानते हैं कि दंतेवाड़ा के सीनियर एसपी जिस तरह के आचरण के दोषी पाए गए हैं, उनके लिए सिर्फ तबादला काफी नहीं था. वैसे भी उन्हें सरगुजा का डीआईजी बनाया गया है. बहरहाल चिंतलनार की घटना को लेकर सरकार की काफी किरकिरी हुई है.

इसके साथ ही मुख्यमंत्री के आश्वासन के बावजूद जब स्वामी अग्निवेश घटना स्थल तक नहीं पहुंच पाए तो दंतेवाड़ा के हालात का सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

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