बाघों की गिनती

बाघ इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption देश में पिछले कुछ वर्षों में बाघों की संख्या में कमी आई थी.

भारत में बाघों की गिनती हुई है और इसमें इस बार 1706 बाघ गिने गए हैं. कुछ लोगों का कहना है कि ये संख्या में बढ़ोतरी है लेकिन बाघों पर काम करने वाले वाल्मिक थापर कुछ और कहते हैं. उनसे बातचीत की बीबीसी संवाददाता रुपा झा ने

क्या बाघों की गिनती के बाद जो नई संख्या सामने आई है उसपर भरोसा किया जा सकता है.

वाल्मिक थापर- भरोसा किया जा सकता है. जंगलो और जानवरों की देखरेख करने वाला प्रशासन बहुत कमज़ोर है इसीलिए बहुत मेहनत से ये गिनती हुई है और ये संख्या अब हमारा सच है. लेकिन इन आंकड़ो को अच्छी या बुरी ख़बर के रूप में नहीं देखना चाहिए. मैं समझता हूं जो बढ़त हुई है वो दक्षिण भारत और काज़ीरंगा है. सुदरबन की संख्या पहली बार जोड़ी गई है. लेकिन कई जगह है मध्य और उत्तर भारत में जहां बढत नहीं हुई है मतलब संख्या घट ही रही है.

एक आम आदमी को इस गिनती से ये समझ आ रहा है कि 2006 में भारत मे बाघों की संख्या 1411 थी अब ये बढकर 1706 हो गई है. पर आप कह रहे है कि इस बार कई इलाकों को पहली बार शामिल किया गया है तो क्या समझा जाए कि संख्या बढी है बाघों की.

वाल्मिक थापर- नहीं ये मैं नहीं समझता हूं. मुझे 35 साल हो गए हैं बाघों पर काम करते हुए. केवल दक्षिण भारत के केरल,कर्नाटक और तमिलनाडु में बढ़त हुई है. तकरीबन 130 बाघ बढे हैं और जो उत्तर, मध्य भारत और पूर्वोत्तर है वहां संख्या कम हुई है. अगर आप भारत का नक्शा लेंगे तो ये हुआ है. तो मैं नहीं समझता हूं कि इससे ये निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बाघों की संख्या बढी है.वो बिल्कुल वहीं है जहां थी. एक-दो जगह गिनती नहीं हुई थी जहां अब हुई है. पर इसके बावजूद जो काम हुआ है वो कमाल का है और बहुत मुश्किल काम किया गया है. मुझे लगता है ये हर साल होना चाहिए.

पर्यावरण मंत्रालय अपनी पीठ थपथपा रही है, क्या वे तारीफ़ के हक़दार हैं.

वाल्मिक थापर- वे बधाई के पात्र ज़रूर हैं क्योंकि इतने सारे राज्यों के साथ मिलकर ये काम करना आसान बात तो नहीं है. अपने काम के लिए वो ख़ुश हैं तो ठीक है लेकिन जो ज़मीन पर इस समस्या की स्थिति है उससे तो वो बिल्कुल खुश नहीं हो सकते. पाँच साल पहले संसद ने 50 करोड़ की योजना को हरी झंडी दे दी लेकिन वो आजतक कहीं लागू नहीं हुआ है.

संबंधित समाचार