क़ानूनी हक़ पर भारी शक

बिहार में चुनाव
Image caption बिहार में शहरी निकायों के जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने का क़ानून लाया जा रहा है.

बिहार में नीतीश सरकार ने शहरी निकायों से जुड़ी जनता को जनप्रतिनिधि वापसी का क़ानूनी अधिकार दिये जाने का निर्णय किया है.

राज्य मंत्रिपरिषद की एक हालिया बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी मिली है. कहा गया है कि इस आशय का एक विधेयक राज्य विधानमंडल में जल्दी ही पेश किया जायेगा.

प्रस्तावित विधेयक का सबसे ख़ास प्रावधान ये होगा कि किसी शहरी निकाय के दो-तिहाई मतदाताओं की अर्ज़ी पर वहाँ के चुने हुए पार्षद को पद से हटाया जा सकेगा.

इस क़ानूनी हक़ को अंग्रेज़ी में 'राइट टू रिकॉल' और हिंदी में ' जनप्रतिनिधि वापसी का अधिकार ' नाम से जाना जाता है.

ख़ासकर लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने 'बिहार आन्दोलन' के समय इसे अपने 'सम्पूर्ण क्रांति' के आह्वान का एक मुख्य मुद्दा बनाया था.

उन्होंने विधायकों और सांसदों को इसके क़ानूनी दायरे में लाने की पुरज़ोर मांग उठाई थी.

तर्क यही दिया गया था कि जनहित के ख़िलाफ़ काम करने वाले निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को कार्यकाल पूरा होने से पहले भी वापस बुलाने का क़ानूनी हक़ जनता को मिलना चाहिए.

लेकिन इस मांग का ही नहीं, जेपी के व्यवस्था परिवर्तन रूपी महासंघर्ष का भी क्या हश्र हुआ, यह सबके सामने है. सिर्फ सत्ता परिवर्तन से ही संतोष करना पड़ा था.

बिहार में बेकार पड़ा एक जनाधिकार

फिर तो जेपी के 'राइट टू रिकॉल' वाला वो नारा विरोध और समर्थन की बौद्धिक बहस में कहीं गुम-सा हो गया.

लेकिन आम जनमानस में उसी समय से ज़िंदा रहने वाले इस लोकसम्मत तर्क को 17 साल पहले पंचायती राज-व्यवस्था में एक छोटी-सी जगह दे दी गई.

वर्ष 1993 में ग्राम पंचायत के लिए ये प्रावधान किया गया कि किसी पंचायत के दो तिहाई मतदाता अविश्वास प्रस्ताव लाकर अपने मुखिया को कार्यकाल पूरा होने से पहले भी हटा सकते हैं.

इस तरह पंचायती निकाय को जनप्रतिनिधि वापसी का जो अधिकार उस समय दिया गया, उसे और सशक्त बनाने के लिए दो तिहाई मतों के बजाय बहुमत से मुखिया को हटाने का नियम वर्ष 2006 में तय हुआ.

तब लगा था कि चलो विधायक और सांसद ना सही, कम से कम निर्वाचित पंचायत-प्रमुख को तो पद से वापस बुला लेने का अधिकार जनता के हाथ में आ गया है.

पर विडंबना देखिये कि लोगों के हाथ में कुछ नहीं आया. इस अधिकार के इस्तेमाल का कोई एक नामलेवा उदहारण भी कहीं नहीं है. जबकि अधिकार मिले 17 साल हो गये.

क़ानून की दिक्कतें

बिहार की माटी से बुलंद हुई इस मांग को बिहार में जो इतनी-सी भी जगह मिली, वह व्यर्थ चली गई. निरर्थक बना दिए गये इस बहुचर्चित अधिकार को स्थानीय स्वशासन के ही दूसरे अंग, नगर निकाय में सार्थक बनाने का सरकारी प्रस्ताव बहुत विरोधाभासी लगता है.

पंचायती राज मामलों के एक जाने माने विशेषज्ञ तेजनारायण सिंह ने इस मसले को खोलकर समझाया.

उन्होंने कहा, ''ये जो कुल मतदाताओं में से दो तिहाई मतों या साधारण बहुमत से नगर निकाय के किसी सदस्य और पंचायत के किसी मुखिया को हटाए जाने का प्रावधान है, उसमें 'कुल मतदाता' वाली शर्त ही सबसे बड़ी बाधा बन जाती है. ऐसा इसलिए क्योंकि जो चुनाव जीतता है, उसे अपने क्षेत्र के कुल वोटों में से नहीं, बल्कि डाले गये वोट में से सर्वाधिक मिल जाने पर चुन लिया जाता है, जो 10, 20 या 30 प्रतिशत भी हो सकता है. ऐसे में उसे पद से हटाने के लिए कम-से-कम 51 प्रतिशत वोट जुटाना प्रायः नामुमकिन हो जाता है.''

मतलब साफ़ है कि ' कुल मतदाता ' को आधार बनाने के बजाय अगर डाले गये मतों को आधार बनाया जाए, तो उनमें से बहुमत के बूते किसी मुखिया को हटाना आसान हो सकता है.

लेकिन ऐसा नियम या क़ानून बनाना न्यायसंगत नहीं माना जाता है. इसलिए न्याय-व्यवस्था के नैतिक आधार के तहत ये कहा जाता है कि सौ दोषी भले छूट जाए, पर एक भी निर्दोष को सज़ा ना हो.

इसी तर्क के मद्देनज़र ये ज़रूरी माना गया है कि किसी भी निर्वाचित जनप्रतिनिधि को कार्यकाल पूरा होने से पहले हटाने के लिए उस क्षेत्र के कुल मतदाताओं में से बहुमत का आधार न्यायसंगत है. भले ही वो कम प्रतिशत वोट से क्यों ना चुना गया हो.

'प्रामाणिक आवेदन'

दूसरी समस्या ये है कि पंचायत-प्रमुख के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव के लिए कम से कम वहां के 20 प्रतिशत मतदाताओं का आरंभिक आवेदन बिल्कुल प्रामाणिक होना चाहिए.

इस संदर्भ में इतने अधिक लोगों की राय का प्रामाणिक परीक्षण भी ख़ासा जटिल काम है. और अगर ये सब हो भी जाय, तो वहाँ फिर से निर्वाचन की पूरी प्रक्रिया अपनाना ज़रूरी हो जायेगा. अगर ये नौबत कई क्षेत्रों में आ जाय तो स्थिति कितनी विकट होगी, समझा जा सकता है..

इसलिए तो मान लिया गया है कि 'ना नौ मन तेल होगा, ना राधा नाचेगी.' वैसे ये भी सच है कि इस तरह की मुश्किलें ना होतीं तो शायद ही किसी ग्राम पंचायत का दोषी मुखिया जनप्रतिनिधि वापसी के दंड से बच पाता.

बिहार की तो हालत ऐसी है कि भ्रष्टाचार और नाकारापन के गंभीर आरोपों से शायद ही कोई मुखिया बचा हुआ है. ग्रामीण विकास की योजनाओं में भारी लूट मचा कर धनपति बन बैठे इन पंचायत-प्रमुखों को ' राइट टू रिकॉल ' का खौफ़ छू भी नहीं सका है.

इसलिए जेपी के निकट सहयोगी रह चुके गांधीवादी विचारक रज़ी अहमद ने कहा, ''जनप्रतिनिधि वापसी के क़ानूनी अधिकार को जब गांवों और शहरों के स्थानीय निकायों में भी कारगर नहीं बनाया जा सका, तो विधायकों और सांसदों तक इस जनाधिकार की पहुँच भला क्या हो पायेगी.''

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि देश की संसद अगर पहल करे तो बात बन सकती है. लेकिन मुख्यमंत्री ने इस बात पर खुलकर कुछ भी नहीं कहा है कि जो क़ानूनी अधिकार पंचायती निकायों में निरर्थक बना हुआ है, उसे राज्य सरकार नगर निकायों में भी लाकर कैसे कारगर बनायेगी ?

'सिर्फ़ प्रचार के लिए'

बिहार में विरोधी दलों के नेता इसे नीतीश सरकार के छवि चमकाओ अभियान का हिस्सा मान रहे हैं. इनका आरोप है कि राज्य सरकार विधानसभा से इस बाबत विधेयक पारित कराने और क़ानून बनाने का केवल प्रचार-लाभ लेना चाहती है.

इस संबंध में बातचीत के दौरान अधिकतर लोगों ने घोर निराशा ज़ाहिर की है. एक ने तो यहाँ तक कह दिया कि ''मौजूदा अव्यावहारिक क़ानूनी प्रावधानों के रहते इस अधिकार का इस्तेमाल यहाँ के लोग सात जनम में भी नहीं कर पाएंगे.''

जो भी हो, फिलहाल तो इस क़ानूनी हक़ पर लोगों का शक और गहरा हो गया लगता है.

लेकिन ताज्जुब ये भी है कि जिस जनाधिकार का बेकार हो जाना बिहार की पंचायतों में सरेआम दिखता है, उसी को राज्य के नगर निकायों में लागू करवाने का सरकारी विज्ञापन चमकाया जा रहा है. जय हो इस चमत्कार की!!

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