ये कैसा जश्न जो मातम में बदल जाए

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Image caption जीत का जश्न तो जायज़ है लेकिन होश खोना सही नहीं

मोहाली में हुए भारत-पाकिस्तान सेमीफ़ाइनल मैच का नतीजा आते ही शुरु हुआ जश्न.

ये सब शायद ही भारत के लोग कभी भूल पाएँगे. मोहाली समेत पूरे भारत में रात को लोगों ने जश्न की वो दीवाली मनाई कि पूछिए मत. लोगों को ऐसा करने का पूरा पूरा हक़ भी है.

लेकिन वो जश्न किस काम का जो मातम में बदल जाए. मैच के बाद युवकों ने सड़कों पर निकलकर जमकर नारे लगाए, गाड़ियों में बैठकर सड़कों पर फ़रार्टे से गाड़ियाँ दौड़ाईं मानो हवा से बातें कर रहे हों- न ट्रेफ़िक की परवाह, न नियमों की, न अपनी जान की.

मोहाली में ऐसे ही जश्न मना रहे युवकों का एक टोला कार में निकला, जीत के नशे में चूर उनमें से एक युवक के केवल पैर गाड़ी में थे और बाक़ी शरीर गाड़ी के बाहर. यकायक ब्रेक लगने से वो संतुलन खो बैठा और बुरी तरह नीचे गिरा. अस्पताल में डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

जश्न को मातम में बदलते देर न लगी. ये तो एक मात्र क़िस्सा है जो सुर्ख़ियों में आ गया. लेकिन देश भर में कितने ही युवकों ने गुरुवार रात भर ऐसा हे ‘बेपरवाह’ होकर जश्न मनाया.

जोश में होश

जश्न मनाने से शायद कोई किसी को नहीं रोकेगा लेकिन क्या जश्न का मतलब केवल हुल्लड़बाज़ी है ...ऐसी हुल्लड़बाज़ी जो इतनी बेपरवाह है कि उसे अपनी ही जान की क़ीमत नहीं पता. कई जगहों पर युवक जीत के नशे में चूर गाड़ियाँ चलाते नज़र आए.

बुर्ज़ुग हमेशा कहते हैं कि किसी भी चीज़ की अति अच्छी नहीं. पहले तो भारत-पाक क्रिकेट मैच को ऐसे पेश किया गया जैसे मानो वो कोई सचमुच की जंग हो...इसमें शायद हम सब दोषी हैं.

अब अगर ये ‘जंग’ भारत ने जीत ली हो तो फू़हड़ता और हुल्लड़पन का वो प्रदर्शन कि किसी की जान ही चली जाए.

जब पिछले विश्व कप में भारत हारा था , तो क्रिकेट प्रशंसकों ने ग़म और गुस्से में अलग तरह की अभद्रता की थी.

कभी किसी खिलाड़ी के घर पर पथराव तो कभी कुछ और. भारतीय टीम के कप्तान धोनी ने भी इस बात का ज़िक्र किया है कि प्रशंसकों को ऐसे लम्हों में टीम का साथ देना चाहिए और उन्हें इस पूरे क़िस्से से उबरने में लगभग एक महीना लगा.

मोहाली में जिस युवक की मौत हुई वो कोई 20 साल का था. अभी उसे ज़िंदगी में बहुत कुछ देखना बाक़ी था...क्या पता भारतीय खिलाड़ी विश्व कप जीतने का उसका सपना दो अप्रैल को पूरा कर देते और वो फ़ाइनल में विजय का जश्न मना पाता...लेकिन अब वो जश्न उसके परिवारवालों के लिए अधूरा ही रहेगा.

कहने का मतलब ये कि किसी भी देश में खेल के लिए लोगों की दीवानगी, जुनून, पागलपन, उत्साह सब सर माथे पर लेकिन ये ज़हन में रहे कि इस जोश में हम कहीं होश न खो दें.

विश्व कप का फ़ाइनल अभी बाक़ी है. खेल को हार-जीत तक ही रहने दें, ज़िंदगी और मौत का खेल न बनाएँ.

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