गांधी की क़िताब पर रोक 'शर्मनाक'

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Image caption विवादो में धिरी क़िताब पर गुजरात में प्रतिबंध

महात्मा गांधी पर क़िताब के लेखक ने कहा है कि ये बहुत ही शर्म की बात है कि गुजरात सरकार ने इसपर प्रतिबंध लगा दिया है.

पुलिट्ज़र प्राइज़ विजेता लेखक जोसफ़ लेलीवेल्ड का कहना है कि उनकी पुस्तक को अख़बारों में छपे लेखो के आधार पर प्रतिबंधित कर दिया गया. उनका कहना है कि क़िताब के समीक्षकों ने गांधीजी की उनके जर्मन मित्र हरमन कालनबाख से दोस्ती का बहुत ही सनसनीखेज़ चित्रण पेश किया है. इसमें अटकलबाज़ी की गई है कि कालनबाख समलैंगिक हो सकते हैं.

हालांकि भारत में समलैंगिकता क़ानूनन वैध है पर सामाजिक रुप से अभी भी इसे वर्जित माना जाता है और कलंक के तौर पर देखा जाता है.

बुधवार को गुजरात विधानसभा ने सर्वसम्मति से प्रतिबंध के हक़ में मत डाला.

‘ग्रेट सोल:महात्मा गांधी एंड हिज़ स्ट्रगल विथ इंडिया’ अभी तक भारत में जारी नहीं हुई है और किसी ने इसे अभी तक पढ़ा भी नहीं है.

समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए लेलीवेल्ड ने कहा, “अपने को लोकतंत्र कहनेवाले भारत जैसे देश में एक ऐसी क़िताब पर प्रतिबंध लगाना जिसे किसी ने पढ़ा भी नहीं है शर्मनाक है. खासकर जो लोग प्रतिबंध लगा रहे हैं उन्होंने भी इसे नहीं पढ़ा है. ”

कड़ा क़दम

उन्होंने कहा, “जिन बातों से उनकी भावना आहत होती है उन लोगों को कम से कम उन पन्नों को देखना तो चाहिए था ये तय करने के लिए की क्या वाकई उनकी भावना आहत हो रही है. मुझे ये सुन कर बहुत दुख हो रहा है कि भारत इस मामले पर बहस को यूं सीमित कर रहा है.”

महात्मा गांधी के रिश्तेदारों और लेखकों ने इस प्रतिबंध का विरोध किया है.

गांधीजी के पड़पोते तुषार गांधी ने भी कहा है कि वो क़िताबो पर प्रतिबंध के ख़िलाफ़ है और “इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि महात्मा सामान्य थे या समलैंगिक. फिर भी वो वही हस्ती होंगे जिन्होंने भारत को आज़ादी दिलाई.”

लेखिका नमिता गोखले भी इस प्रतिबंध से दुखी हुई है.

उनका कहना था, “जब भी किसी क़िताब पर प्रतिबंध लगता है मुझे बहुत दुख होता है क्योकिं आप सोच को, विचारों को कभी प्रतिबंधित नहीं कर सकते. भारतीय लोकतंत्र में विचारों की स्वतंत्रता एक तोहफ़ा है और क़िताबों को प्रतिबंधित करना अर्थहीन होता है.”

समलैंगिकता का आक्षेप

लेलीवेल्ड का कहना है कि उन्होंने कहीं भी नहीं लिखा कि गांधी समलैंगिक थे और उनकी बातों को संदर्भ से दूर कर के पेश किया गया है. टाइम्स ऑफ़ इंडिया अखबार में उनहोने कहा है कि “ मैने ग्रेट सोल में कहीं भी आरोप नहीं लगाया कि गांधी नस्लभेदी थे या समलैंगिक थे. समलैंगिक शब्द पूरी क़िताब में कहीं नहीं आता.”

हालांकि क़िताब की समीक्षाओं में गांधी जी के हरमन कालनबाख के साथ कथित प्रेम प्रसंग की विस्तृत चर्चा है. कालेनबाख एक जर्मन वास्तुकार थे जो दक्षिण अफ्रीका में रहते थे और 1904 में गांधी से उनकी वहां मुलाक़ात हुई थी.

गांधी के कालनबाथ को लिखे एक पत्र, जिसकी समीक्षाओं में चर्चा है, उसमें कहा गया है, “तुमने कैसे पूरी तरह मेरे शरीर को अपनी जकड़ में ले लिया है. ये तो बिल्कुल दास्ता जैसा है.”

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि क़िताब में “अहिंसा के प्रतिरुप को विकृत और कलंकित किया गया है.”

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