हर साल खो जाते हैं 60,000 बच्चे

  • 1 अप्रैल 2011
Image caption इन परिवारों को अब भी अपने बच्चो के लौटकर आने की उम्मीद है.

चौबीस राज्यों में दाखिल की गईं आरटीआई से मिले आंकड़ों के मुताबिक देशभर में हर साल 60,000 बच्चे लापता हो जाते हैं.

आरटीआई दाखिल करने वाले और इस कार्यक्रम के आयोजक, बचपन बचाओ आंदोलन, के अनुसार देश में हर रोज़ करीब 165 बच्चे गायब हो रहे हैं.

संगठन ने बताया कि आंकड़ों के मुताबिक महाराष्ट्र में सबसे ज़्यादा बच्चे गायब हुए हैं.

सबसे ज़्यादा लापता बच्चों में पश्चिम बंगाल दूसरे नंबर पर है और दिल्ली तीसरे नंबर पर है.

आज दिल्ली के जंतर मंतर पर इकट्ठा हुए इन परिवारों ने, 'प्रधानमंत्री जवाब दो' के नारे लगाए.

अब भी है उम्मीद

ताजवर ने अपनी 3 साल की पोती को तीन साल पहले खो दिया.

एक शादी में खाना खाते समय उनकी नज़र लीला से हटी और वो फिर कभी नहीं मिली.

ताजवर ने बताया, "मैं थाने में गई, एफआईआर भी कराई, पर ऐसा लगता है माने हमारी अर्ज़ी रद्दी की टोकरी में रखी हो."

दिल्ली के ही बाशिंदे अज़हर भी ताजवर जैसी मांओं के साथ इस प्रदर्शन में जुटे हैं.

उनकी दस साल की बेटी, आतिका घर से बाहर बने शौचालय में गई, और वापस नहीं आई.

चार साल बीत गए हैं और अब उन्हें डर है कि उनकी बेटी गलत हाथों में ना पड़ गई हो.

अज़हर कहते हैं, "अगर बच्चा किसी अमीर का हो तो पुलिस कोशिश करती है. हमारा क्या.....हमने कागज़ी कार्रवाई के लिए पैसे भी दिए, पर कुछ नहीं हुआ."

टास्क फोर्स बनाने की मांग

अब संगठित होकर ये परिवार सरकार से लापता बच्चों की समस्या का समाधान करने के लिए ठोस कदम उठाने की अपील कर रहे हैं.

बचपन बचाओ आंदोलन के संस्थापक कैलाश सत्यार्थी के मुताबिक सबसे पहले ज़रूरत है इस मुद्दे की गंभीरता को समझने की और फिर राज्यों और केन्द्र सरकार की नीतियों के बीच सामंजस्य बैठाने की.

Image caption दिल्ली के जन्तर मन्तर पर इकट्ठा हुए इन परिवारों ने, 'प्रधानमंत्री जवाब दो' के नारे लगाए.

सत्यार्थी ने बीबीसी को बताया कि, "एक राष्ट्रीय टास्क फोर्स बनना चाहिए जिसमें पूर्व न्यायाधीश और सीबीआई जैसी जांच एजेंसी के पूर्व अधिकारी हों जो लापता बच्चों को वापस लाने के लिए एक व्यवस्थित ढांचा बना सकें."

सत्यार्थी का मानना है कि ज़्यादातर लापता बच्चों को गैरकानूनी ढंग से अलग-अलग काम पर लगाया जाता है या उनके शरीर के अंग बेचे जाते हैं.

भारत में मानव तस्करी को रोकने के लिए तो कानून है लेकिन वो देह व्यापार के लिए की जा रही तस्करी से संबंधित है.

बच्चों की तस्करी के लिए भारत में अभी अलग कानून नहीं है.

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