ये हैं असली जांबाज़...

Image caption राजेन्द्र जौहर पिछले 25 साल से बिस्तर पर हैं.

आम लोगों के संघर्ष की कहानियों को देश-दुनिया तक पहुंचाने और समाज में बदलाव की मुहिम छेड़ने वालों के लिए बीबीसी शुरु कर रहा है एक खास पेशकश सिटीज़न रिपोर्टर. ये कहानियां हैं उन लोगों की जो समाज के लिए बदलाव की मिसाल बन गए हैं.

इस खास पेशकश की पहली कड़ी हैं सिटीज़न रिपोर्टर राजेंद्र जौहर.

''मेरा नाम राजेंद्र जौहर है और मैं दिल्ली के जनकपुरी इलाके में रहता हूं. आज से 25 साल पहले रीढ़ की हड्डी में गोली लगने के कारण मैं क्वॉड्राप्लेजिया का शिकार हो गया. गर्दन से नीचे मेरे शरीर का कोई भी हिस्सा काम नहीं करता.

37 वर्ष की उम्र में हुए इस हादसे के बाद मेरी ज़िंदगी एक बिस्तर तक सिमट गई. पाँच साल बिस्तर पर लेटे अपनी बीमारी से जूझते हुए मैंने सोचा कि इस तरह ज़िंदगी बिताना तो अभिशाप होगा.

अपने आसपास देखा तो पाया कि ज़िंदगी की इस बेचारगी से जूझता मैं अकेला नहीं. ऐसे में अपनी सीमाओं के बीच मैंने कुछ ऐसा करने की ठानी जो न सिर्फ मेरे लिए बल्कि मुझ जैसे दूसरों के लिए भी ज़िंदगी के मायने बदल दे.

‘फैमली ऑफ डिसेबल्ड’

शुरुआत में कई दिक्कतें आईं. मैं अपने हर काम के लिए दूसरों पर निर्भर था और लोगों से जुड़ने और पैसा जोड़ने के लिए मुझे अपने परिवार, दोस्तों, रिश्तेदारों का सहारा लेना पड़ा.

लेकिन बिस्तर तक सिमटी ज़िंदगी का दायरा बढ़ाकर पूरी दुनिया को उसमें शामिल करने के मेरे जुनून ने मेरे क़रीबियों में भी दम भर दिया.

1992 में मैंने ‘फैमली ऑफ डिसेबल्ड’ की शुरुआत की. ये कारवां था उन लोगों का जो भारत के किसी भी हिस्से में मौजूद विकलांगों की हर संभव मदद के लिए तैयार था.

संस्था के इन सभी कामों के लिए धन जुटाना भी ज़रूरी थी और हमने शुरुआत की विकलांगों का ओर से बनाए गए ग्रीटिंग कार्ड बेचकर. हमने घर-घर से बेकार काग़ज और रद्दी इक्ट्ठा कर उसके रंग-बिरंगे बैग और लिफ़ाफ़े बनाने का काम भी शुरु किया.

कुछ साल बाद हमने शारीरीक विकलांगों के लिए देश की पहली मासिक पत्रिका भी शुरु की.

‘ब्लैंक चैक’ है ज़िंदगी

आर्थिक मदद ही नहीं बल्कि हर संभव तरीके से ‘फैमली ऑफ डिसेबल्ड’ से जुड़कर कई लोग आज अपने पैरों पर खड़े हैं.

‘फैमली ऑफ डिसेबल्ड’ की एक सदस्य चंद्रप्रभा कहती हैं, ''जब मैं पहली बार राजेंद्र जौहर से मिली तो यह देखकर हैरान रह गई कि इतने लोगों जिस व्यक्ति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं वह तो बिस्तर से उठ भी नहीं सकता. उन्हें देखकर मैंने भी अपने पैरों पर खड़ा होने के बारे में सोचा. संस्था की मदद रही है कि मैंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.''

अब तक सैकड़ों लोग ‘फ़ैमिली ऑफ़ डिसेबल्ड’ से जुड़ चुके हैं. मेरी सबसे बड़ी पूंजी है कि ये लोग अब अकेली और गुमनाम नहीं बल्कि आत्मसम्मान भरी खुशनुमा ज़िंदगी जी रहे हैं.

मेरी तरह शारीरिक चुनौतियों का सामना कर रहे लोगों के लिए मेरे ज़िंदगी का एक ही फ़लसफ़ा है.

हमारी ज़िंदगी एक ऐसा ‘ब्लैंक चैक’ है जिसे हम या तो हमेशा के लिए खाली छोड़ सकते हैं या फिर अपनी मेहनत से उसमें मनचाही रकम भर सकते हैं. पूरी दुनिया हमारे साथ होगी लेकिन पहला क़दम हमें ख़ुद ही बढ़ाना होगा.''

अगर आप भी दूसरों की ज़िंदगी में बदलाव के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो हमसे जुड़िए और बनिए बीबीसी के सिटीज़न रिपोर्टर. आप संपर्क कर सकते हैं parul.agrawal@bbc.co.uk पर.

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