रिलायंस के अधिकारी की गोली मारकर हत्या

  • 6 अप्रैल 2011
Image caption पुलिस के मुताबिक़ माओवादियों का एक गुट इसके लिए ज़िम्मेदार है.

झारखण्ड के चतरा ज़िले में कथित रूप से माओवादियों के एक टूटे हुए धड़े नें बुधवार की शाम रिलायंस कंपनी के महाप्रबंधक की गोली मारकर हत्या कर दी तथा कंपनी के एक अन्य कर्मचारी को घायल कर दिया.

झारखण्ड पुलिस के महानिरीक्षक और प्रवक्ता राज कुमार मलिक का कहना है कि इस घटना को तृतीय प्रस्तुति कमिटी नाम के एक संगठन नें अंजाम दिया है जो माओवादियों से अलग हो चूका है.

कहा जा रहा है कि रिलायंस कम्युनिकेशंस के महाप्रबंधक मनोज कुमार ओझा अपने कुछ सहयोगियों के साथ चतरा के टंडवा इलाक़े में मोबाईल के टावर लगाने के लिए इलाक़े का दौरा कर रहे थे.

यह सभी अधिकारी दो अलग अलग वाहनों में उस इलाक़े में घूम रहे थे. मलिक का कहना है कि दो अज्ञात मोटरसाइकिल सवार युवकों नें ओझा की गाड़ी पर अंधाधुंध गोलियां चलानी शुरू कर दी.

गोली चलाने की वजह से उनका वाहन पलट गया. ओझा की घटनास्थल पर ही मौत हो गई जबकि उनके सहकर्मी को गंभीर अवस्था में रांची के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है.

'लोगों में दहशत'

पुलिस का कहना है कि रिलायंस के अधिकारी मुंबई से झारखण्ड आए हुए थे. उनका कहना है कि इन अधिकारियों के दौरे के बारे में स्थानीय पुलिस को कोई सूचना नहीं दी गई थी.

घटना के बाद से निजी क्षेत्र में कार्यरत कंपनियों के अधिकारियों में दहशत फैल गई है.

हलाकि पुलिस का कहना है कि अभी तक किसी माओवादी गुट नें इस घटना की ज़िम्मेदारी नहीं ली है मगर ऐसी खबरें हैं कि तृतीय प्रस्तुति कमिटी नाम वाले इस धड़े नें मोबाईल के टावर लगाने के एवज़ में रिलायंस कंपनी के अधिकारियों से पैसे मांगे थे, और शायद पैसे नहीं दिए जाने पर इस तरह की घटना को अंजाम दिया गया है.

झारखण्ड के चतरा और लातेहार के इलाक़ो में माओवादियों से अलग हुए कई धड़े सक्रिय हैं. इन इलाकों में तृतीय प्रस्तुती कमिटी के अलावा झारखण्ड प्रस्तुति कमिटी, झारखण्ड लिबरेशन टाइगर और झारखण्ड लिबरेशन फ्रंट नाम के संगठन काम कर रहे हैं.

सभी संगठनों का एक ही उद्देश्य है -- खनन के कार्यों या फिर विकास के कार्यों में लगी कंपनियों या ठेकेदारों से पैसे वसूल करना.

ऐसे भी आरोप हैं कि इनमे से कुछ गुटों को भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के ख़िलाफ़ पुलिस और प्रशासन के लोग ही प्रायोजित कर रहे हैं. कई बार इन गुटों में आपसी संघर्ष भी हुए हैं जिसमे कई जानें जा चुकीं हैं.

वैसे भी पुलिस का कहना है कि माओवादी जंगल के इलाक़ो या यूँ कहा जाए, अपने आधार वाले इलाक़ो में मोबाईल के टावर लगाने का विरोध करते हैं.

बिहार, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में अक्सर माओवादी मोबाईल के टावरों को अपना निशाना बनाते हैं.

उन्हें विस्फोट लगाकर ध्वस्त कर देते हैं. यही वजह है कि इन इलाक़ो में संचार व्यवस्था नहीं के बराबर है, चाहे झारखण्ड के चतरा, गढ़वा, लातेहार या पलामू का इलाक़ा हो या छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा, नारायणपुर, बीजापुर और कांकेर ज़िले हों. इन सभी जगहों पर संचार के बहुत सीमित साधन हैं.

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