दास्तान अन्ना के अनशन की

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अन्ना हज़ारे के बारे में भारत के दूसरे हिस्सों में ज़्यादा लोग शायद न वाकिफ़ हों लेकिन महाराष्ट्र के राजनेता उनके बारे में ज़रूर जानते हैं.

राज्य के रालेगाँव सिद्दी गाँव में विकास की नई कहानी लिखने वाले अन्ना हज़ारे की अनशन की शक्ति से लोग यहाँ भलीभांति परिचित हैं.

नब्बे के दशक में शिवसेना-भाजपा सरकार के तीन मंत्रियों – शशिकांत सुतर, महादेव शिवांकर औऱ बबन घोलाप – को हटाने की मांग लेकर उन्होंने भूख हड़ताल शुरू की.

सरकार ने उन्हें मनाने की कोशिश की लेकिन हारकर दो मंत्रियों सुतर और शिवांकर को हटाना ही पड़ा. घोलाप ने उनके खिलाफ़ मानहानि का मुकदमा कर दिया.

अन्ना हज़ारे ने उन पर आय से ज़्यादा संपत्ति रखने का आरोप लगाया था, और ये भी कि उनके खिलाफ़ भ्रष्टाचार विरोधी शाखा की जाँच चल रही है.

लेकिन अन्ना इस बारे में कोई सबूत पेश नहीं कर पाए और उन्हें तीन महीने की जेल हुई. हालांकि उस वक्त के मुख्यमंत्री मनोहर जोशी ने उन्हें एक दिन की हिरासत के बाद छोड़ दिया.

एक जाँच आयोग ने शशिकांत सुतर और महादेव शिवांकर को निर्दोष बताया. लेकिन अन्ना हज़ारे ने कई शिवसेना और भाजपा नेताओं पर भी भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप लगाए.

इस मुहिम से पहले भी अन्ना भ्रष्टाचार हटाने की बात करते रहे थे.

कांग्रेस-एनसीपी सरकार के दौरान वो चार कथित तौर पर भ्रष्टाचारी मंत्रियों को हटाने की मुहिम लेकर भूख-हड़ताल पर बैठ गए. मंत्रियों में सुरेशदादा जैन, नवाब मलिक, विजय कुमार गवित औऱ पद्मसिन्ह पाटिल शामिल हैं.

सरकार ने एक जाँच आयोग बनाया, लेकिन अभियोग के बाद सुरेश जैन ने इस्तीफ़ा दे दिया. नवाब मलिक ने भी अपना पद त्याग दिया.

अन्ना हज़ारे ने जानकारी के हक़ के कानून के समर्थन में मुहिम छेड़ी. महाराष्ट्र सरकार को कानून के एक मज़बूत और कड़े मसौदे को पास करना पड़ा.

अन्ना हज़ारे का असली नाम किसान बापट बाबूराव हज़ारे है लेकिन प्यार से लोग उन्हें अन्ना कहकर पुकारते हैं.

पद्मभूषण से सम्मानित अन्ना हज़ारे को अहमदनगर ज़िले के गाँव रालेगाँव सिद्धि के विकास और वहां पानी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल करने के लिए जाना जाता है.

शुरूआत में वो कई साल भारतीय सेना में भी रहे.

अन्ना की आलोचना

कुछ राजनीतिज्ञों और विश्लेशकों की माने तो अन्ना हज़ारे अनशन का गलत इस्तेमाल कर राजनीतिक ब्लैकमेलिंग करते हैं और कई राजनीतिक विरोधियों ने अन्ना का इस्तेमाल किया है.

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Image caption दिल्ली में अन्ना के समर्थन में काफ़ी लोग बाहर निकले हैं.

वरिष्ठ पत्रकार समर खडस अन्ना हज़ारे को ऑटोक्रेटिक या निरंकुश बताते हैं और कहते हैं कि उनके संगठन में लोकतंत्र का नामोनिशान नहीं है.

वो कहते हैं, “अन्ना जो कहेंगे, वो सही है. वो कहेंगे कि एक व्यक्ति भ्रष्ट है तो भ्रष्ट है. वो कूटनीतिज्ञ हैं. वो लोगों पर आऱोप लगाते हैं, फिर चुप हो जाते हैं. उन्होंने कुछ साल पहले मंत्री सुनील तटकरे पर गंभीर आरोप लगाए थे, लेकिन बाद में आरोपों का क्या हुआ, पता नहीं.”

पत्रकार समर खडस ने कहा, “एक और मंत्री पतंगराव कदम पर भी उन्होंने आरोप लगाए, लेकिन बाद में दोनो की एक बैठक हुई. दो दिन के बाद अन्ना ने कहा, मेरा समाधान हो गया. समाधान होने की बात का फ़ैसला कौन करेगा?”

खडस कहते हैं कि शुरूआत में कई ट्रेड यूनियन और छोटे गुट अन्ना हज़ारे से जुड़े लेकिन निराश होकर अलग हो गए.

लेकिन आज शायद वक्त अलग है और देश भर के कई सौ लोग उनके समर्थन में जुट रहे हैं.

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