सुरक्षा बलों को महंगी पड़ रही है रणनीति में चूक

  • 8 अप्रैल 2011
Image caption जहाँ पुलिस के पास ठोस सूचनाओं का अभाव है वहीं माओवादी पुलिस की हर गतिविधि पर नज़र बनाए हुए हैं.

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में नक्सली हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है.

शनिवार की सुबह दंतेवाड़ा जिले के कोंटा इलाके में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के तीन जवानों को मारने के बाद इसी इलाके में शनिवार की शाम माओवादियों ने एक बारूदी सुरंग में विस्फोट किया.

इस हमले में राज्य पुलिस के नौ कोया कमांडो बाल-बाल बच गए हैं.

पुलिस का कहना है कि माओवादियों को कोया कमांडो की गतिविधियों की खबर मिल गयी थी और उन्होंने सुकमा के मिस्मा के पास एक पुलिया में बारूदी सुरंग को लगाया था.

मगर कोया कमांडो के वाहन पार होने के बाद यह विस्फोट हुआ. इस घटना से एक चीज़ तो साफ़ हो गयी है और वह है माओवादियों का ‘सूचना तंत्र’.

जहाँ पुलिस के पास ठोस सूचनाओं का अभाव है वहीं माओवादी पुलिस की हर गतिविधि पर नज़र बनाए हुए हैं.

इससे पहले शनिवार की सुबह दंतेवाड़ा के कोंटा इलाके में नक्सलियों नें एक कैंप पर हमला कर तीन सुरक्षाकर्मियों को मार गिराया जबकि तीन घायल बताए जाते हैं.

यह हमला सुबह 7.30 बजे हुआ है और पुलिस के अधिकारियों का कहना है कि माओवादियों ने घात लगाकर यह हमला किया है.

नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ में पिछले एक महीने के दौरान नक्सली हमलों में अचानक आई तेज़ी से राज्य सरकार और पुलिस के आला अधिकारी सकते में आ गए हैं.

माओवादियों के हमले में पिछले एक महीने के दौरान झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में 50 से अधिक लोग मारे गए हैं जिनमें सबसे ज़्यादा संख्या सुरक्षा बलों के जवानों की है.

सूचना तंत्र

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में पिछले तीन सप्ताह के दौरान सुरक्षा बलों के 31 जवान मारे जा चुके हैं.

पिछले तीन दिनों की अगर बात की जाए तो बस्तर में 18 जवान नक्सलियों के हमले में मारे गए हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नक्सल विरोधी अभियान में लगे सुरक्षा बलों के जवानों की रणनीति मात खा रही है या फिर माओवादियों ने अपनी रणनीति बदल दी है.

यह रणभूमि है जहाँ माओवादी छापामारों और सुरक्षा बलों के बीच युद्ध की लकीरें साफ़ खींची हुई हैं.

यहाँ चूक की कोई गुंजाइश नहीं है. छोटी सी चूक की वजह से बहुत बुरे परिणाम भुगतने पड़ते हैं.

पिछले एक महीने से इस राज्य में सुरक्षा बल के जवान अपनी चूक का खामियाज़ा भुगत रहे हैं. पिछले तीन दिनों के अन्दर तो सुरक्षा बलों के जवानों को अपने 18 साथियों से हाथ धोना पड़ा है.

नौ मई को नारायणपुर ज़िले के झाराघाटी में माओवादियों नें घात लगाकर पुलिस बल के पांच जवानों को मार डाला.

उसी दिन देर रात को दंतेवाड़ा जिले में माओवादियों ने एक बारूदी सुरंग का विस्फोट कर 10 सुरक्षा कर्मियों को मौत के घाट उतर दिया.

शनिवार सुबह एक बार फिर माओवादियों ने दंतेवाड़ा के ही कोंटा इलाके के भेज्जी में सुरक्षा बलों के एक कैंप पर हमला कर केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के तीन जवानों को मार गिराया.

चर्चा के दौरान पुलिस के आला अधिकारी मानते हैं कि उनकी रणनीति में चूक की वजह से ही सुरक्षा बलों के जवानों को सबसे ज्यादा नुकसान का सामना करना पढ़ रहा है.

रणनीति

मिसाल के तौर पर 24 मई को राज्य के गरियाबंद इलाके के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक राजेश पवार अपने साथ नौ और जवानों को लेकर उड़ीसा राज्य के बीहड़ों में चले गए. वह भी एक छोटी सी सूमो गाड़ी में.

वहां पहले से ही मोर्चाबंदी किए हुए माओवादी छापामारों के हमले की सूरत में गाड़ी में सवार जवानों के पास इतनी जगह भी नहीं थी कि वह अपने हथियार भी चला पाते. विभाग का मानना है कि पुलिस दल का यह क़दम आत्मघाती साबित हुआ.

वैसे भी इस इलाके से यह खबरें आ रही थीं की उड़ीसा से लगी छत्तीसगढ़ की सीमा पर नक्सलियों का बड़ा जमावड़ा है. ऐसे में इस इलाके में बिना पर्याप्त संख्या के जाना घातक साबित हुआ.

उसी तरह सुकमा इलाके में अभियान से लौट रहे पुलिस बल के वाहन को माओवादियों ने बारूदी सुरंग से उड़ा दिया जिसमे केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के सात जवान मारे गए.

देर रात लौट रहे इन जवानों को पता भी नहीं था कि उनकी एक छोटी सी चूक कितनी खतरनाक साबित हो सकती है.

अमूमन नक्सल विरोधी अभियान के दौरान सुरक्षा बलों के जवानों को यह निर्देश हैं की वह संवेदनशील इलाकों से गुज़रते हुए वाहनों का प्रयोग ना करें. मगर इन तमाम हिदायतों के बावजूद सुरक्षा बल के जवान ग़लतियाँ करते रहे हैं.

नौ मई को भी कुछ ऐसा ही हुआ. एक बारूदी सुरंग निरोधक वाहन में सवार जवानों को भी मौत का सामना करना पड़ा. जबकि उन्हें यह निर्देश जारी किए गए थे कि सड़क पर छोटे पुल या पुलियों को वाहन से उतारकर पैदल ही पार करें. यहाँ भी सुरक्षा बलों के जवानों से यह चूक हो गयी.

आक्रामक तेवर

उसी तरह नारायणपुर के झाराघाटी में सुबह शौच के लिए निकले जवान माओवादियों के हमले का शिकार बन गए. यहाँ भी उनसे सतर्कता बरतने में चूक हो गयी.

छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री ननकीराम कँवर का भी माना है कि ग़लतियों की वजह से सुरक्षा बलों के जवानों को नुकसान झेलना पड़ रहा है.

वहीं मुख्य मंत्री रमन सिंह का कहना है कि चूँकि माओवादियों के खिलाफ लड़ाई लम्बी चलेगी इस लिए रणनीति में बदलाव की आवशयकता है.

उनका कहना है,"ऐसी रणनीति अपनानी चाहिए जिस से कम से कम नुकसान हो".

काँफ्लिक्ट मैनेजमेंट से जुड़े विशेषज्ञों का भी मानना है कि जहाँ छापामार युद्ध लड़ा जा रहा हो वहां चूक की कोई गुंजाइश ही नहीं होती है. खासतौर पर बस्तर संभाग में तो थोड़ी सी चूक भी जानलेवा साबित होती आ रही है.

लगातार हो रही घटनाओं के बाद बस्तर में तैनात केंद्रीय अर्द्ध सैनिक बल और राज्य पुलिस के अधिकारियों को लग रहा है कि अब उन्हें अपनी रणनीति में बदलाव लाने की आवशयकता है.

खास तौर पर ऐसे समय में जब माओवादियों ने ज्यादा आक्रामक तेवर अपना लिए हों.

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