बिहार में शिक्षक पास या फ़ेल?

  • 9 अप्रैल 2011
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बिहार में नियत (फ़िक्स्ड) वेतन पर नियुक्त स्कूल शिक्षकों की दक्षता परीक्षा संबंधी ताज़ा परिणामों पर दिलचस्प बहस छिड़ गई है.

सवाल उठ रहा है कि आठ हज़ार से अधिक शिक्षकों का फ़ेल हो जाना चौंकाने वाली बात है या अयोग्य होने का आरोप झेल रहे एक लाख से ज़्यादा शिक्षकों का पास हो जाना संदेहास्पद है.

राज्य की नीतीश सरकार ने सत्ता संभालने के कुछ ही समय बाद वर्ष 2006 में प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों के लिए कम वेतन पर दो लाख से अधिक शिक्षकों की नियुक्ति का निर्णय लिया.

मात्र चार हज़ार रूपए से लेकर सात हज़ार रूपए तक के वेतन पर नगर या ग्राम पंचायत स्तर से विद्यालय शिक्षकों की नियुक्ति संबंधी प्रक्रिया जब शुरू हुई तो इसमें भारी भ्रष्टाचार के आरोपों से हंगामा मचा.

मुख्य आरोप यही था कि लिखित या मौखिक परीक्षा लिए बिना सिर्फ इंटर पास मार्कशीट के अंकों के आधार पर उम्मीदवारों के चयन में धांधली हो रही है.

शिकायत

धांधली की शिकायतें बहुत थीं. जैसे कि कथित तौर पर हजारों रूपए में ऊंचे अंक वाले फर्ज़ी प्रमाणपत्र और प्रशिक्षित शिक्षक होने की जाली डिग्री खरीदने वाले उम्मीदवार रिश्वत के बल पर नियुक्त हो रहे हैं.

पंचायतों में मुखिया से लेकर प्रखंड और ज़िले के शिक्षा अधिकारीयों तक मालामाल हो जाने, लेकिन स्कूलों में अयोग्य शिक्षकों की वजह से प्राथमिक शिक्षा के बदहाल हो जाने का भी शोर मचा.

आलोचना या बदनामी के इसी शोर में राजनीतिक नुकसान का ख़तरा देख नीतीश सरकार ने इन नव-नियुक्त शिक्षकों की दक्षता जांचने के लिए परीक्षा आयोजित कराने का फ़ैसला किया.

अक्तूबर 2009 में जो परीक्षाएं ली गईं, उनमें एक लाख से ज़्यादा शिक्षक शामिल हुए. जब नतीजा निकला तो 98 प्रतिशत शिक्षक उतीर्ण घोषित कर दिए गए.

इस 'चमत्कार' को राज्य साकार का कमाल बताने वालों ने ये आरोप लगाया कि भ्रष्ट तरीक़े से नियुक्त हुए अयोग्य शिक्षकों को दक्ष साबित करने वाली परीक्षा में भी घपलेबाजी की गई.

लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आरोप को बेबुनियाद बताते हुए उस समय कहा था - '' इस शानदार रिज़ल्ट से वैसे लोगों की बोलती बंद हो गई होगी, जो नव-नियुक्त शिक्षकों की योग्यता पर सवाल उठा रहे थे.''

कितने दक्ष हैं शिक्षक?

अब जो दूसरे दौर की दक्षता परीक्षाएं फ़रवरी 2011 में संपन्न हुईं और उनके परिणाम बुधवार छह अप्रैल को प्रकाशित हुए, उनपर भी बहस छिड़ गई है.

एक लाख ग्यारह हज़ार शिक्षक -परीक्षार्थियों में से आठ हज़ार का फ़ेल हो जाना और दूसरी तरफ़ 92 प्रतिशत का पास हो जाना पक्ष और विपक्ष के दो अलग-अलग मुद्दे बन गए हैं.

इस परिणाम को लेकर बेहद उत्साहित राज्य सरकार के शिक्षा मंत्री पीके शाही ने कहा, '' 92 प्रतिशत शिक्षकों का सफल होना बेहद संतोष और ख़ुशी की बात है क्योंकि अब हमारे ऐसे अधिकांश शिक्षकों को अयोग्य ठहराना एक झूठा प्रचार माना जाएगा. ''

लेकिन दूसरी तरफ़ आठ प्रतिशत से अधिक यानी 8,884 शिक्षकों के फ़ेल कर जाने पर भी सवाल उठ रहा है. पूछा जा रहा है कि पास करने लायक 30 फ़ीसद अंक भी नहीं ला पाने वालों को शिक्षक बना देने का ज़िम्मेवार ये राज्य सरकार नहीं तो और कौन है ?

दक्षता परीक्षा लेने वाले संस्थान ' राज्य शिक्षा शोध एवं प्रशिक्षण परिषद् ' के निदेशक हसन वारिस ने इस बहस को ही बेकार मानते हुए कहा, '' ये तो नज़रिए का फ़र्क़ है कि कोई 92 फ़ीसद भरे गिलास की अनदेखी कर के महज़ आठ फ़ीसद ख़ाली हिस्से को मुद्दा बना रहा है. सच तो ये है कि क़ामयाबी बहुत बड़ी है और नाक़मायाबी बहुत छोटी. ''

हसन वारिस ने परीक्षा के दौरान 20 शिक्षकों को नक़ल करते पकड़े जाने की पुष्टि तो की, लेकिन ये भी कहा कि अलग-अलग ज़िलों के जिलाधिकारी ही परीक्षा कंट्रोलर होते हैं और उन्होंने ही अगर राज्य भर के एक लाख से ज़्यादा परीक्षार्थियों में से सिर्फ 20 को नक़ल करते पकड़ा तो ये कोई बड़ी बात नहीं है.

उन्होंने ये भी बताया कि पिछली दोनों परीक्षा में शामिल होकर भी जो 174 शिक्षक पास नहीं हो पाए, उन्हें नियमानुसार नौकरी से हटा दिया जाएगा .

ये भी नियम है कि जो शिक्षक परीक्षा में शामिल नहीं होंगे उनकी सालाना वेतन-वृद्धि रोक दी जाएगी. इस बार जो शिक्षक फ़ेल हुए हैं, उन्हें पास करने का एक मौक़ा और मिलेगा.

जो भी हो, आम लोगों के बीच ये धारणा जड़ जमा चुकी है कि दक्षता परीक्षा भी एक धोखा है क्योंकि राज्य सरकार ने बिना ठीक से जांचे -परखे बड़ी तादाद में अयोग्य शिक्षकों को स्कूलों में भर दिया है.

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