तमिलनाडु में कांटे की टक्कर

  • 11 अप्रैल 2011
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Image caption डीएमके और अन्नाद्रमुक मतदाताओं को मुफ़्त चीजे़ बांटकर वोट हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं.

तमिलनाडु में 13 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए चुनाव प्रचार सोमवार को समाप्त हो गया है.

साल 2011 में होने वाला ये चुनाव इस दृष्टि से ऐतिहासिक समझा जा रहा है की यह राज्य के सबसे दिग्गज़ नेता और 86 वर्षीय मुख्यमंत्री मुत्तुवेलु करूणानिधि के जीवन के शायद आख़िरी चुनाव होगा.

दूसरी ओर उनकी कट्टर विरोधी और अन्नाद्रमुक की नेता जयललिता जयरामन के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण चुनावी युद्ध है क्योंकि अगर वे यह चुनाव हार जाती हैं तो अन्नाद्रमुक पार्टी पर उनकी पकड़ ढीली पड़ सकती है और पार्टी में टूट-फूट की नौबत आ सकती है.

इस संदर्भ में यह बात आश्चर्यजनक नहीं है कि दोनों ही विरोधी दल और उनके गठबंधन यह चुनाव जीतने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं.

तोहफ़ो की बारिश

चाहे वह करूणानिधि की ओर से मिक्सर, ग्राइंडर और लैपटॉप मुफ़्त में देने का वादा हो या उसके जवाब में जयललिता की ओर से मिक्सर के साथ ग्राइंडर के अलावा पंखा,चार ग्राम सोना,गाएँ और भेड़ देने का वादा हो.

सोमवार की शाम पांच बजे राज्य में चुनावी प्रचार तो ख़त्म हो गया और इस प्रचार के दौरान दोनों ही द्रविड़ पार्टियों के बड़े-बड़े नेताओं के साथ दूसरी पार्टियों के कई राष्ट्रीय नेताओं ने भी अपना पसीना खूब बहाया.

लेकिन अधिकारियों का कहना है कि तमिलनाडु में असली प्रचार उस समय शुरू होता है जब जनसभाओं, रैलियों और भाषणों का दौर ख़त्म होता है.

इन अधिकारियों का इशारा है नेताओं की ओर से मतदाताओं को ख़रीदने के लिए कई तरीके अपनाना, जिनमें मतदाताओं को चोरी छिपे पैसे, शराब इतना ही नहीं बिरयानी खिलाना भी शामिल है.

तमिलनाडु के मुख्य चुनाव अधिकारी प्रवीण कुमार ने कहा कि अबकी बार सबसे ज़्यादा ध्यान इसी बात पर दिया गया कि किस तरह से चुनाव में धन के दुरुपयोग को रोका जाए.

उन्होंने कहा, ''अब तक लगभग पचास करोड़ रुपए की राशि ज़ब्त की गई और मतदाताओं को रिश्वत देने के 900 से ज़्यादा मामले दर्ज़ किए गए.''

हालाँकि उन्होंने किसी दल का नाम नहीं बताया लेकिन आम विचार है कि ऐसी घूस देने में सत्तारूढ़ डीएमके विपक्षी अन्नाद्रमुक से कहीं आगे है क्योंकि उसके पास साधन ज़्यादा हैं.

इस बार चुनावी प्रचार शांतिपूर्ण रहा और छोटी-मोटी घटनाओं के अलावा कोई बड़ी हिंसा नहीं हुई. केवल एक हत्या हुई वह भी एक ही पार्टी के दो गुटों की लड़ाई में.

दोनों दल आशावान

जहाँ तक इन चुनाव के नतीजों की भविष्यवाणी की बात है, करूणानिधि और जयललिता दोनों ही को उम्मीद है कि अबकी बार मतदाता उनका साथ देंगे.

जयललिता ने सोमवार को कई चनावी सभाओं को संबोधित किया. उन का संदेश साफ़ था कि जनता ने परिवर्तन लाने के लिए मन बना लिया है और तमिलनाडु में एक नया सबेरा आने वाला है क्योंकि जनता करूणानिधि परिवार के भ्रष्टाचार और अत्याचार से तंग आ गई है.

दूसरी ओर करूणानिधि ने अपने गृह क्षेत्र तिरुवरुर में इस अपील के साथ अपना चुनावी अभियान ख़त्म किया कि वह आख़िरी बार चुनाव लड़ रहे हैं और उन्हें विश्वास है कि उनके अपने लोग उन्हें उदास नहीं करेंगे.

अगर करूणानिधि जीत जाते हैं तो वे रिकॉर्ड 12वीं बार विधानसभा के लिए चुने जाएँगे और अगर वह मुख्यमंत्री बनते हैं तो यह भी एक रिकॉर्ड होगा क्योंकि वे छठी बार यह पद संभालेंगे.

अगर डीएमके दोबारा सत्ता में आती है तो यह भी एक रिकॉर्ड होगा क्योंकि साल 1984 से कोई भी दल लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए सत्ता में लौट कर नहीं आया है और तमिल मतदाताओं ने हमेशा ही परिवर्तन के लिए वोट दिया है.

भविष्य में क्या होगा

बुधवार को मतदान के बाद नतीजे के लिए पूरे एक महीने इंतज़ार करना पड़ेगा क्योंकि मतगणना 13 मई को की जाएगी.

विश्लेषकों का कहना है की नतीजों का कोई भी अंदाज़ा लगाना बहुत मुश्किल है.

लेकिन कुछ बातें स्पष्ट हैं. 234 में से केवल 119 सीटों पर डीएमके चुनाव लड़ रही है.

बाक़ी सीटों में से 63 उसे केवल कांग्रेस को देनी पड़ी है और बाक़ी बची सीटों पर मित्र दल वीसीके, पीएमके और मुस्लिम लीग चुनाव लड़ रही है. इस तरह इस बात की संभावना कम है कि डीएमके अकेले ही सरकार बना पाएगी.

कांग्रेस की बुरी स्थिति

इस चुनाव में अगर कांग्रेस को कोई सफलता मिल सकी है तो वह यह कि उसने डीएमके को 63 सीटें देने पर मजबूर किया लेकिन तमिलनाडु में उसकी हालत इतनी पतली है कि उसे सीटों पर खड़े करने के लिए अच्छे उम्मीदवार भी नहीं मिल सके.

पार्टी के अंदर गुटबाज़ी की हालत ऐसी है कि ख़ुद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थंगा बालू को भी पार्टी के लोगों से ही ख़तरे का सामना करना पड़ रहा है.

हालाँकि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने डीएमके गठबंधन की चुनावी सभाओं के संबोधित किया है लेकिन ज़मीनी स्तर पर कांग्रेस और डीएमके के बीच तालमेल कम ही था.

करूणानिधि की मुशिकल

डीएमके के लिए दूसरी बड़ी चुनौती 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला रहा जिसके कारण उसे शहरी इलाक़ों में और विशेषकर मध्यम वर्ग के विरोध का सामना करना पड़ रहा है.

इस घोटाले में सीधे करूणानिधि परिवार पर ऊँगली उठने लगी है क्योंकि सीबीआई ने करूणानिधि की पुत्री कनीमोझी और पत्नी से भी पूछताछ की है और वह अब इस बात की छानबीन कर रही है कि क्या इस घोटाले का पैसा करूणानिधि परिवार के कालिंजर टीवी चैनल में लगाया गया था.

इसके अलावा लोग बिजली और पानी की किल्लत, क़ीमतों में वृद्धि, क़ानून-व्यवस्था की ख़राब हालत और करूणानिधि परिवार की मनमानी को लेकर भी नाराज़ हैं.

फिर भी डीमएके की चुनाव जीतने की उम्मीद इस बात पर टिकी हुई है कि लोग, विशेषकर ग्रामीण इलाक़ों के ग़रीब उन सारी मुफ़्त चीज़ों के लिए उसे वोट देंगे जिसका करूणानिधि ने वादा किया है.

जयललिता की परेशानियां

डीएमके के विरुद्ध इतनी नाराज़गी के बावजूद जयललिता के लिए यह लड़ाई आसान नहीं रही है.

जब भी वह डीएमके के भ्रष्टाचार की बात करती हैं तो लोगों को यह बात भी याद आ जाती है कि ख़ुद उन पर कितने भ्रष्टाचार के आरोप लग चुके हैं और कुछ मामले तो अदालतों में लंबित हैं.

अन्नाद्रमुक गठबंधन को भी कई समस्याओं के सामना करना पड़ रहा है.

अभिनेता विजयकांत के डीएमडीके दल ने उन्हें 41 सीटें देने पर मजबूर तो कर दिया लेकिन वह एक अच्छे मित्र नहीं बन सके.

विजयकांत की वजह से जयललिता को काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा. क्योंकि अभिनेता पर यह आरोप लगे कि वे नशे की हालत में चुनाव प्रचार कर रहे थे. इसके अलावा उन्होंने जयललिता के साथ एक मंच पर आने से भी इनकार कर दिया था.

एक और पुराने मित्र दल वाइको की एमडीएमके भी कम सीटें मिलने पर इतनी नाराज़ हुई कि वाइको ने चुनाव ही न लड़ने का फ़ैसला कर लिया. अब ले देकर वाम दल और एक नया मुस्लिम दल ही जयललिता के साथ है.

इन दोनों बड़े गठबंधनों के अलावा भारतीय जनता पार्टी 34 क्षेत्रों से चुनाव लड़ रही है और बहुजन समाज पार्टी ने भी अधिकतर सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं.

जहां भाजपा के लगभग तमाम ही बड़े नेताओं एलके आडवाणी, नितिन गडकरी, सुषमा स्वराज और नरेंद्र मोदी ने अभियान में हिस्सा लिया तो दूसरी ओर उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने भी बसपा के प्रत्याशियों के साथ यहाँ चुनाव प्रचार किया है.

तमाम नेताओं के भाषण, दावे और वादे सुनने के बाद अब चार करोड़ से ज़्यादा मतदाता बुधवार को 2800 से ज़्यादा उमीदवारों की क़िस्मत का फ़ैसला करेंगे.

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