तमिलनाडु के चुनाव 'ग्राइंडर-मिक्सर'

  • 12 अप्रैल 2011
करुणानिधि और जयललिता इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption दोनों ही पार्टियों ने मुफ़्त चीज़ें देने के वादे किए हैं

तमिलनाडु में अब की बार विधान सभा चुनाव को "ग्राइंडर - मिक्सर" चुनाव का नाम दिया गया है क्योंकि दोनों ही मुख्य प्रतिद्वंद्वी दलों सत्तारूढ़ डीएमके और विपक्षी दल अन्ना डीएमके ने मतदाताओं को जो मुफ्त चीज़ें देने का वादा किया है उन में यह दोनों वस्तुएं भी शामिल हैं.

मतदाताओं को मुफ्त चीज़ें देने का जो चलन 2006 के चुनाव में डीएमके ने रंगीन टीवी सेट्स के साथ शुरू किया था वो इस चुनाव में अपने चरम पर पहुँच गया लगता है क्योंकि दोनों ही मुख्य दलों ने एक-दो नहीं बल्कि कई चीज़ें मुफ्त देने का वादा किया है.

इनमें मिक्सर-ग्राइंडर और पंखे के साथ-साथ छात्रों को मुफ़्त लैपटॉप कंप्यूटर, छात्रों और 58 वर्ष से ज़्यादा आयु के नागरिकों को बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा भी शामिल हैं. लेकिन लगता है कि इन वादों ने तमिलनाडु के पूरे समाज को बाँटकर रख दिया है. मध्यम वर्ग, विशेषकर शहरी इलाकों के पढ़े लिखे लोग और सरकारी कर्मचारी जहाँ मुफ्त चीज़ें देने के चलन का विरोध कर रहे हैं वहीं ग़रीब, अधिकतर ग्रामीण इलाकों के लोग और शहरों में झुग्गी झोंपड़ियों में रहने वाले लोग इस से खुश हैं. चेन्नई से अरकाट और वेल्लोर तक की यात्रा में बीबीसी ने जितने भी लोगों से बात की उनमें मध्यमवर्ग और ग़रीबों के बीच का यह बटवारा साफ़ दिखाई दे रहा था. अरकाट में नंदगोपाल, कन्नन और वेलु जैसे सरकारी कर्मचारी मुफ्त चीज़ें देने की इस नई चुनावी संस्कृति से खुश नहीं थे. नंदगोपाल ने कहा, "अगर सब चीज़ें मुफ्त में मिलने लगें तो काम कौन करेगा. लोग तो आलसी और कामचोर बन जाएंगे." एक महिला सत्यनसागरा अरकाट के बाहर एक चाय की दुकान चलती है. हालाँकि वो ग़रीब है लेकिन कहती है कि मुफ्त चीज़ों का वादा सब को महंगा पड़ रहा है.

"गत पांच वर्षों में जो महंगाई बढ़ी है वो कमर तोड़ देने वाली है. इस का कारण ही मुफ्त टीवी जैसी स्कीमें हैं. अगर हम ये मुफ्त चीज़ें लेंगे तो आगे और भी टैक्स बढ़ेगा और महंगाई बढ़ेगी."

सागरा का कहना था कि लोगों को एक रुपए प्रति किलो से ख़राब चावल की बजाय पांच रुपये में अच्चा चावल दीजिए, "लोगों को मुफ़्त चीज़ों की ज़रुरत नहीं है बल्कि क़ीमत कम कीजिए."

रक़म कहाँ से?

मुफ्त की चीज़ों की क़ीमत बाद में लोगों को किस तरह चुकानी पड़ती है इस का एक उदाहरण इससे मिलता है कि कमज़ोर वर्गों के कल्याण के लिए जो राशि रखी गई थी उसमें से लगभग अस्सी करोड़ रुपए मुफ्त रंगीन टेलीविज़न योजना पर ख़र्च कर दिए गए. उनके क़रीब ही मौजूद दो मुस्लिम महिलाओं नसीमा और परवीन का कहना था कि केवल मुफ्त चीज़ें या महंगाई ही असल समस्या नहीं है. "हमें सुरक्षा की और अच्छी पुलिस व्यवस्था की भी ज़रुरत है. हालात ख़राब हैं कि महिलाऐं बाहर नहीं निकल सकतीं. उन्हें हर जगह छेड़छाड़ का सामना करना पड़ता है." अरकाट के निकट ही वेप्पुर में सड़क के किनारे कॉलेज की छात्रों का एक ग्रुप इस बात को लेकर बहुत उत्साहित था कि डीएमके नेता करूणानिधि ने उन्हें लैपटॉप कंप्यूटर मुफ्त देने का वादा किया है. बारहवीं कक्षा में पढ़ने वाली महालक्ष्मी का कहना था, "हमें लैपटॉप की बहुत ज़रूरत है और ये एक बिल्कुल सही फैसला है." यह पूछने पर कि अन्ना डीएमके की नेता जयलालिता ने भी तो यही वादा किया है, एक और छात्रा विद्या ने कहा, "अगर जयललिता को ऐसा कुछ देना ही होता तो वो उस समय दे सकती थीं जब वो सत्ता में थी. अब वादा करने का क्या फायदा. हमें कलिन्जार (करूणानिधि) पर ही भरोसा है."

कुछ लोगों ने एक तरफ़ ये कहा कि गत चुनाव में करूणानिधि ने मुफ्त टीवी और गैस के चूल्हे का जो वादा किया था उसे पूर कर दिया है, तो वहीं कुछ लोगों ने उसके ना मिलने की भी शिकायत की और कहा कि डीएमके के लोगों ने ही यह चीज़ें हड़प ली हैं. वेल्लोरे में मुश्ताक अहमद जहाँ करूणानिधि के वादों से खुश थे और उम्मीद कर रहे थे कि इस से लोगों की जीवन शैली अच्छी होगी वहीं नारियल पानी बेचने वाले गणपति को उम्मीद नहीं थी की यह सारी चीज़ें उस जैसे लोगों को मिल सकेंगी. जवाब इस बात पर भी निर्भर था कि आप जिस से बात कर रहे हैं वो किस दल का समर्थक है. कुछ ग़रीब परिवार जो जयलालिता के चाहने वाले हैं, करूणानिधि के मुफ्त वादों से ज़्यादा प्रभावित नहीं थे और उन्हें "अम्मा" के वादों पर ज़्यादा भरोसा था. मुफ्त चीज़ें देने के वादों ने दूसरे गंभीर और अहम मुद्दों को चुनावी चर्चा में पीछे धकेल दिया है. हद तो ये है कि 2-जी स्पैक्ट्रम जैसे बड़े घोटाले का भी ग्रामीण इलाकों में बहुत कम नाम सुनने को मिलता है.

वेपुर में ही एक छात्र प्रीति का कहना था कि उसने 2-जी स्पेक्ट्रम का नाम कभी नहीं सुना. लेकिन इधर मुफ्त वादों की बढ़ती सूची ने अर्थशास्त्रियों और दूसरे विशेषज्ञों को चिंता में डाल दिया है. उन का कहना है कि ये सिलसिला ऐसे ही चलता रहा तो तमिलनाडु की अर्थव्यवस्था चरमरा कर रह जाएगी.

उन का कहना है कि तमिलनाडू पर कुल मिलाकर एक लाख करोड़ रुपये के ऋण का बोझ है और उसमें आधा ऋण गत पांच वर्षों में बढ़ा है. कुछ लोग इसे चुनावी दृष्टि से भी ग़लत मानते हैं और कहते हैं कि ये भी एक तरह से मतदाताओं को ख़रीदने की ही कोशिश है. फोरम फॉर इलेक्टोरल इंटेगरिटी नामक एक ग़ैर सरकारी संगठन के प्रमुख और भूतपूर्व मुख्य चुनाव अधिकारी नरेश गुप्ता का कहना है कि मुफ्त की चीज़ों का वादा लोकतंत्र के लिए एक बड़ा ख़तरा है और वो व्यवस्था को कमज़ोर कर देगा.

उन्होंने कहा, "हम समझते हैं कि इसे रोका जाना चाहिए. चुनाव आयोग इस विषय पर चर्चा के लिए एक सर्वदलीय बैठक बुलाए और इसे रोकने का रास्ता ढूंढे." दूसरी और तमिलनाडु के मुख्य चुनाव अधिकारी प्रवीण कुमार ने कहा कि राजनैतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्र चुनाव आयोग के आधीन नहीं आते और यह राजनैतिक दलों का अधिकार है कि वो मतदाताओं को बताएँ कि वो सरकार में आने के बाद क्या करेंगे.

हालाँकि उनका ये भी कहना था कि मद्रास हाई कोर्ट ने निर्देश दिया है की मुफ्त की चीज़ों के वादे की समस्या पर ध्यान दिया जाए और हो सकता है कि चुनाव के बाद आयोग कोई क़दम उठाये."

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