महिलाओं के लिए महालक्ष्मी गर्भगृह के द्वार खुले

मंदिर
Image caption भारत में कई मंदिरों के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश करने पर मनाही है.

शुक्रवार से अब कोल्हापुर स्थित महालक्ष्मी मंदिर के गर्भगृह में महिलाएं भी प्रवेश कर सकेंगी.

क़रीब 1,400 साल पुराने इस महालक्ष्मी मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश करने पर पांबदी थी.

शुक्रवार को गृह राज्य मंत्री सतेज पाटिल की अध्यक्षता में हुई बैठक में महिलाओं के मंदिर के प्रवेश पर लगी पांबदी को हटाने का फ़ैसला लिया गया.

इससे पहले बुधवार को महाराष्ट्र भारतीय जनता पार्टी महिला मोर्चा की अध्यक्ष नीता केलकर ने कुछ महिलाओं के साथ गृभगृह में जाकर वहाँ पूजा की थी.

नीता केलकर के अलावा महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के विधायक राम कदम के नेतृत्व में पार्टी की कुछ महिला सदस्यों ने भी मंदिर के गर्भगृह में पूजा की थी.

दरअसल अभी तक मंदिर में महिलाओं को दूर से ही पूजा करने की अनुमति करनी होती थी और उन्हें एक निश्चित स्थान से आगे जाने की इजाज़त नहीं थी.

नीता केलकर का कहना था कि उन्हें महिलाओं पर रोक का पता क़रीब दो साल पहले पता चला जब वो अपने परिवार के साथ यहाँ पूजा करने आईं थीं. तब उन्हें दूर से ही पूजा करने को कहा गया था.

मुहिम

नीता कहती हैं कि तभी उन्होंने ठान लिया था कि वो इस रोक को ख़त्म करने के लिए काम करेंगी.

वो कहती हैं कि, "मंदिर के पुजारियों के घर की महिलाओं, राजघराने की महिलाओं और ख्याति प्राप्त लोगों को अंदर जाने की इजाज़त दे दी जाती थी, लेकिन आम महिलाओं को अंदर जाने की इजाज़त नहीं थी. राम कदम ने ये मुद्दा विधानसभा में उठाया था लेकिन मैने सोचा ये मुद्दा चर्चा से हल होने वाला नहीं है. आज दुर्गा माँ की शक्ति हमारे साथ थी."

उधर मंदिर को चलाने वाले देवस्थान प्रबंधन कमेटी, पश्चिम महाराष्ट्र के सचिव हनुमंत सूर्यवंशी के मुताबिक महिलाओं को अंदर जाने पर रोक जैसी कोई बात नहीं थी, लेकिन शुरुआत से ही ये परंपरा थी कि महिलाएँ मंदिर के गर्भगृह में नहीं जाएँ.

देवस्थान कमेटी में महिलाएं कार्यरत हैं. ये भी कहा जाता है कि कमेटी चाहती थी कि महिलाओं पर लगी रोक ख़त्म हो लेकिन मंदिर के पुजारी इसके खिलाफ़ थे.

मंदिर में महिलाओं पर लगी रोक के विषय में बांबे हाई कोर्ट में वर्ष 2001 में याचिका डाली गई थी.

याचिकाकर्ता महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के डॉक्टर नरेंद्र डाभोलकर बताते हैं कि महाराष्ट्र में ऐसी कई जगहें हैं जहाँ महिलाओं को जाने की इजाज़त नहीं है. इनमें से एक है भगवान शनि को समर्पित शनिशिग्नापुर मंदिर जहाँ महिलाओं के निश्चित जगहों से आगे जाने पर प्रतिबंध है और दूसरा महालक्ष्मी मंदिर जहाँ अब इजाज़त दे दी गई है.

वो कहते हैं कि , "हमने वर्ष 2000 में इस पर सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया था लेकिन उस वक्त भाजपा और शिवसेना ने हमारा विरोध किया था. मैंने जब सुना कि भाजपा की महिलाओं ने महालक्ष्मी मंदिर में प्रवेश किया और इसका समर्थन भाजपा और शिवसेना ने किया तो मैं आश्चर्यचकित रह गया. दरअसल ये लोग नहीं चाहते कि धर्म का विश्लेषण हो."

डॉक्टर डाभोलकर के मुताबिक ये एक अच्छी शुरुआत है लेकिन अभी और कदम लिए जाने बाकी हैं.

महालक्ष्मी मंदिर भारत में स्थित छह शक्तिपीठों में से एक है. माँ लक्ष्मी भगवान विष्णु की पत्नी हैं और माना जाता है कि इस इलाके में दोनों का वास है.

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