श्रोताओं ने की कटौती वापस लेने की मांग

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Image caption लखनऊ में दूर-दूर से बीबीसी हिंदी के श्रोता पहुँचे थे

एक छोर पर नेपाल सीमा, दूसरे छोर पर मध्यप्रदेश से लगा बुंदेलखंड और दिल्ली के क़रीब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज़िले.

लोग गर्मी के मौसम में इतनी दूर-दूर से अपने खर्चे पर चलकर लखनऊ बीबीसी के संपादकों और प्रबंधकों से सिर्फ़ ये कहने आए कि जैसे भी हो बीबीसी हिंदी के रेडियो कार्यक्रमों में हाल ही में हुई कटौती वापस ली जाए.

मौक़ा था बीबीसी हिंदी के श्रोताओं से सीधे संवाद का.

एक श्रोता ने बीबीसी कार्यक्रमों में कटौती की घोषणा की तुलना हीरोशिमा नागासाकी में बम धमाके से की. तो एक श्रोता का कहना था कि वह अपनी बीवी से ज्यादा बीबीसी को प्यार करता है.

अनेक श्रोताओं का कहना था कि सुबह और देर रात का प्रसारण बंद होने से लोगों की सुबह भी खराब हो गई और रात की नींद भी छिन गई.

बहुतेरे श्रोताओं ने बार-बार आग्रह किया कि इस समय शाम साढ़े सात बजे की जो सभा दिन भर के नाम से चल रही है उसमे कोई रिपोर्ट या आइटम दोहराया न जाए. श्रोताओं ने विज्ञान, खेल और करियर संबंधी कार्यक्रमों को बहाल करने पर बल दिया.

कार्यक्रम के बारे में

कई श्रोताओं ने आश्चर्य व्यक्त किया कि ब्रिटेन के पास बीबीसी जैसी संस्था को चलने के लिए पैसा नही हैं.

कई श्रोताओं ने सवाल किया कि अगर ऐसा आर्थिक संकट है तो फिर ब्रिटेन ने इराक़ युद्ध में इतना धन क्यों बर्बाद किया.

कुछ श्रोताओं ने प्रस्ताव किया कि वे बीबीसी को चलाने के लिए वित्तीय सहयोग दे सकते हैं. वहीं कई श्रोताओं का कहना था कि हिंदी सेवा को चलाने के लिए विज्ञापन लेने में भी कोई हर्ज़ नहीं है.

कार्यक्रम में छात्र और युवा श्रोताओं की संख्या अच्छी खासी थी. उनका कहना था कि बीबीसी के समाचार और विश्लेषण उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में मदद करते हैं.

सभा में पुलिस और अर्ध सैनिक बल पीएसी के कई कर्मचारी-अधिकारी मौजूद थे, जिनका कहना था कि लाखों की तादाद में सेना, पुलिस और अर्ध सैनिक बलों के जवान दूर-दराज़ तैनात होते हैं और वे समाचारों के लिए बीबीसी पर ही निर्भर करते हैं.

दसवीं बटालियन के एक पीएसी के जवान ने कहा, "हम लोग गाँव जंगल में टेंट लगा कर रहते हैं वहां बीबीसी का साथ ही घर परिवार से दूरी का एहसास मिटाता है."

सीतापुर के एक छात्र ने बीबीसी को अपना गुरु बताया जिसके कारण उसने कई प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त की .

युवा पत्रकारों का कहना था कि बीबीसी उनके लिए मार्गदर्शक का काम करती है.

सभा में कई ऐसे बुजुर्ग लोग भी आये जो पचास से साठ सालों से बीबीसी सुन रहे हैं. इनमे रिटायर्ड पुलिस महानिदेशक ईश्वर चंद द्विवेदी और इस्लामिक शिक्षा के मशहूर केंद्र फिरंगी महल के मौलाना मतीन शामिल थे.

इंटरनेट पर बीबीसी

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Image caption बीबीसी पत्रकारिता की प्रमुख निकी क्लार्क और हिंदी के प्रमुख अमित बरुआ ने श्रोताओं की बातें सुनीं

श्रोताओं को इस बात से परिचित कराया गया कि वे कैसे इंटरनेट और मोबाइल पर बीबीसी के समाचार सुन और पढ़ सकते हैं.

अनके श्रोताओं ने बताया कि वे पहले से ही मोबाइल ओर नेट पर समाचार सुन रहे हैं.

इस सभा में ऐसे लोग भी थे जिनके पास इंटरनेट की सुविधा है और मोबाइल फ़ोन भी लेकिन उनका कहना था कि रेडियो ज़्यादा सुविधाजनक है.

ग्रामीण इलाकों ने श्रोताओं ने विशेषकर इस बात पर बल दिया कि उनके यहाँ बिजली की भारी कटौती होती है, इसलिए वे समाचारों के लिए बीबीसी हिंदी रेडियो पर ही निर्भर हैं.

बीबीसी के प्रति श्रोताओं की इस निष्ठा और निर्भरता की बातें सुनकर लन्दन में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस मैनेजमेंट बोर्ड की सदस्य और पत्रकारिता प्रमुख निक्की क्लार्क अभिभूत थीं.

उन्होंने इतनी दूर दूर से चलकर आने के लिए श्रोताओं का हार्दिक धन्यवाद दिया.

आश्वासन

निक्की क्लार्क ने कहा कि अगले एक साल में बीबीसी विज्ञापन के ज़रिए इस बात की संभावनाएँ तलाश करेगी कि हिंदी सेवा रेडियो के कार्यक्रम मार्च 2012 से आगे भी चलते रहें.

बीबीसी हिंदी प्रमुख अमित बरुआ ने आश्वस्त किया कि टेलीविजन पर अंग्रेजी में बीबीसी वर्ल्ड न्यूज़ में विज्ञापन लिए जाते हैं लेकिन उससे संपादकीय स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होती क्योंकि बीबीसी के पास विज्ञापन के संबंध में स्पष्ट नियमावली मौजूद है.

उन्होंने कहा, "श्रोताओं से सीधे संवाद का यह कार्यक्रम इस बात की कोशिश है कि हम उनका दुःख दर्द समझें."

अमित बरुआ ने कहा, "बीबीसी के प्रति इतना अटूट लगाव दर्शाता है कि मीडिया बाज़ार में इतनी भीड़ के बावजूद बीबीसी का महत्व बरक़रार है."

निक्की क्लार्क और अमित बरुआ दोनों ने भरोसा दिलाया कि श्रोताओं के विचारों और सुझावों पर लंदन में बीबीसी प्रबंधक गंभीरता से विचार करेंगे.

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