भारत को कज़ाक तेल ब्लॉक में हिस्सेदारी

  • 16 अप्रैल 2011
मनमोहन और नज़रबायेव इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति नज़रबायेव की मौजूदगी में द्विपक्षीय समझौतों पर हस्ताक्षर हुए

भारत और कज़ाकस्तान के बीच तेल खनन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ है. सार्वजनिक क्षेत्र की भारतीय कंपनी ओवीएल को कैस्पियन सागर के एक तेल क्षेत्र में एक चौथाई हिस्सेदारी दी गई है.

कज़ाकस्तान की राजधानी अस्ताना में भारत और कज़ाकस्तान के बीच द्विपक्षीय समझौतों पर हस्ताक्षर भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कज़ाक राष्ट्रपति नूरसुल्तान नज़रबायेव की मौजूदगी में हुए.

वैसे तो द्विपक्षीय समझौते असैनिक परमाणु क्षेत्र में सहयोग और क़ानूनी सहायता समेत कई क्षेत्रों में हुए हैं. लेकिन उनमें सबसे महत्वपूर्ण है तेल खनन के क्षेत्र में सहयोग का समझौता.

अस्ताना में शनिवार को हुए समझौते के तहत भारत ने कज़ाकस्तान के एक तेल उत्पादन ब्लॉक में 25 प्रतिशत की हिस्सेदारी हासिल की है.

ये एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है क्योंकि भारत के पास अपनी तेज़ी से फैलती अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा के पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, और उसका आर्थिक विकास काफ़ी हद तक बाहर से आयातित तेल से जुड़ा हुआ है.

यानि दूसरे देशों से समझौते कर ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास करना भारत के लिए सामरिक रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण हो गया है.

तेल का बड़ा भंडार

कज़ाकस्तान के साथ हुए समझौते के तहत अब सार्वजनिक क्षेत्र की भारतीय कंपनी ओएनजीसी विदेश लिमिटेड (ओवीएल) को कज़ाकस्तान की राष्ट्रीय तेल कंपनी काज़मुनाईगैस (केएमजी) के कैस्पियन सागर स्थित तेल उत्पादन क्षेत्र सत्पायेव में एक चौथाई हिस्सेदारी दी गई है.

शुरू में ओवीएल की तरफ़ से कज़ाक कंपनी को आठ करोड़ डॉलर दिए गए हैं, लेकिन सौदा कहीं बड़ा है क्योंकि सत्पायेव तेल उत्पान क्षेत्र में तेल की खोज का सारा ख़र्च भारतीय कंपनी ही उठाएगी.

अनुमान लगाया जाता है कि कैस्पियन सागर के इस उत्पादन क्षेत्र में कुल मिला कर 25 करोड़ टन तेल का भंडार हो सकता है.

यहाँ ये उल्लेखनीय है कि भविष्य के लिए तेल आपूर्ति सुनिश्चित करने के मामले में भारत मध्य एशिया में भी अपने पड़ोसी चीन से बहुत पीछे है.

यदि कज़ाकस्तान की बात करें भारत को जहाँ सिर्फ़ एक तेल उत्पादन क्षेत्र में एक चौथाई हिस्सेदारी मिली है, वहीं कज़ाकस्तान में कुल तेल उत्पादन का एक चौथाई इस समय चीनी कंपनियों के हाथों में है.

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