सर्कस में बच्चों के काम पर रोक लगी

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Image caption बच्चों के सर्कस में इस्तेमाल का विरोध होता रहा है

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फ़ैसले में सर्कस में बच्चों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है.

कोर्ट ने सोमवार को यह फ़ैसला देते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वो सर्कस में इस्तेमाल किए जा रहे बच्चों को बचाए और उनके पुनर्वास के लिए कार्यक्रम बनाए.

न्यायमूर्ति दलबीर भंडारी की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि बच्चों के मूलभूत अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए.

कोर्ट ने कहा है कि यह ज़रुरी है कि सरकार इस संदर्भ में एक अधिसूचना जारी कर के सुनिश्चित करे कि सर्कस उद्योग में बच्चों का इस्तेमाल न किया जाए.

खंडपीठ ने सरकार को निर्देश दिए कि वो इस मामले में छापे मारे और उन बच्चों को बचाए जो सर्कस उद्योग में काम कर रहे हैं. कोर्ट ने इन बच्चों के लिए एक पुनर्वास नीति बनाए जाने की भी बात कही.

प्रतिक्रिया

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए भारतीय सर्कस संघ के सचिव एम. सी. रामचंद्रन कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का ये आदेश तो बहुत अच्छा है , लेकिन इसे लागू करने की ज़िम्मेदारी सरकार और अदालत पर है.

सर्कस में बहुत पहले से ही 14 साल से कम उम्र के बच्चों का प्रदर्शन नहीं हो रहा है.

जिस तरह से फ़िल्म उद्योग, विज्ञापन और खेलों की दुनिया में बच्चे काम करते हैं उसी तरह से सर्कस भी एक कला है और इसे बचपन से सीखना पड़ता है.

सर्कस में बच्चों से गै़रक़ानूनी तरीक़े से काम करवाने और कई जगह सर्कस की आड़ में उनका यौन शोषण के आरोपों पर रामचंद्रन कहते हैं कि कुछ घटनाएं ज़रुर हो सकती हैं पर ये बेहद सीमित हैं.सब कुछ सर्कस मालिकों के हाथ में ही है.

बच्चों के लिए एक पुनर्वास नीति बनाए जाने के सवाल पर रामचंद्रन कहते हैं कि सर्कस में ग़रीब काम करते हैं और अगर ऐसा हो जाए तो इससे अच्छा कुछ भी नहीं.

उन्होंने कहा कि सर्कस उद्योग को बढ़ावा देने के लिए आकादमी बननी चाहिए.

रामचंद्रन सवाल करते हैं कि पटाख़ा उद्योग और सर्कस में अंतर ही क्या है. दोनों जगह बच्चें ख़तरों का सामना करते हैं ये बंद होना चाहिए.

कोर्ट ने एक स्वंयसेवी संस्था बचपन बचाओ आंदोलन की एक याचिका पर यह फ़ैसला सुनाया है.

सर्कस की आड़ में यौन शोषण

स्वयंसेवी संस्था ने अपनी याचिका में कहा था कि कोर्ट सरकार को 14 साल से कम के बच्चों को सर्कस उद्योग में न तो काम करने दिया जाए और जो काम कर रहे हैं उन्हें निकाल कर उनका पुनर्वास किया जाए.

बचपन बचाओ आंदोलन के भुवन रिभु बताते हैं, "हमने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट को बताया कि देशभर में कई सर्कस में बच्चों से गैरकानूनी तरीके से काम कराया जा रहा है और कई जगह सर्कस की आड़ में उनका यौन शोषण हो रहा है."

भुवन रिभु ने बताया कि खास तौर पर मध्य-पूर्व और नेपाल से बड़ी संख्या में बच्चों को सर्कस में काम दिलाने के प्रलोभन से भारत लाया जाता है और इनमें से कई को वेश्यावृति में धकेल दिया जाता है.

कोर्ट ने सरकार से दस दिनों में एक समग्र जवाब दायर करने को कहा है जिसमें इस संबंध में उठाए गए सभी क़दमों की जानकारी हो.

पिछले साल तक भारत के बाल श्रम कानून में सर्कस में काम करने वाले बच्चों का उल्लेख नहीं था.

इस मामले में अगली सुनवाई 19 जुलाई को होनी है.

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