जैतापुर में तनाव, भीड़ ने अस्पताल पर हमला किया

  • 19 अप्रैल 2011
जैतापुर (फ़ाइल फ़ोटो) इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption स्थानीय निवासी कई कारणों से जैतापुर संयंत्र का विरोध कर रहें हैं.

रत्नागिरी ज़िले के गाँव नाटे में जैतापुर परमाणु संयंत्र का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों के साथ सोमवार को हुई झड़प में एक व्यक्ति की मौत के बाद स्थिति तनावपूर्ण बताई जा रही है.

नाटे गाँव परमाणु संयंत्र की जगह से क़रीब सात-आठ किलोमीटर की दूरी पर है.

एक स्थानीय पत्रकार के मुताबिक़ इलाक़े में जगह-जगह पर पुलिस की टुकड़ियाँ तैनात हैं और विरोध में दुकाने बंद हैं.

नाटे गांव से मछुआरों के एक नेता अमजद बोरकर ने बीबीसी को बताया कि वो नाराज़ लोगों को समझाने की कोशिश कर रहे हैं और फ़िलहाल विरोध प्रदर्शनों की कोई औपचारिक योजना नहीं है.

उधर सोमवार को मारे गए व्यक्ति के परिवार की मांग है कि दोषी पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो.

उन्होंने मांग माने जाने से पहले मृतक के शरीर को वापस लेने से मना कर दिया है.

तनाव

लोग बड़ी संख्या में रत्नागिरी सिविल अस्पताल के बाहर जमा हो गए हैं जहाँ मृत व्यक्ति की लाश रखी हुई है.

अस्पताल के सिविल सर्जन डॉक्टर अंगद चाटे ने बीबीसी को बताया कि लोग पोस्टमॉर्टम रूम में घुस गए और अस्पताल के कर्मचारी को मारा.

उनके मुताबिक़ अस्पताल के डॉक्टर नाराज़ हैं और डरे हुए भी हैं.

उधर पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने शिवसेना पर मुद्दे का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया और कहा कि परमाणु उर्जा के अलावा कोई और चारा नहीं है.

शिवसेना नेता सुभाष देसाई ने घटना पर सदमें का इज़हार किया है और पुलिस कार्रवाई की निंदा की है.

लेकिन गृहमंत्री आरआर पाटिल ने कहा है कि पुलिस के पास गोली चलाने के अलावा और कोई चारा नहीं था क्योंकि लोग हिंसा पर उतर आए थे.

उनका कहना था, ‘हमें ये देखना होगा कि किन परिस्थितियों में पुलिस ने गोली चलाई. क़रीब 700 गाँववालों ने एक पुलिस स्टेशन को घेर लिया था जिसमें सिर्फ़ पाँच पुलिसवाले थे. उन्होंने थाने और गाड़ियों में आग लगा दी थी, और ये संभावना भी है कि कई हथियार भी ग़ायब हुए हैं.’

सोमवार को रत्नागिरी के कलेक्टर मधुकर गायकवाड ने बीबीसी को बताया था कि पुलिस को मजबूरन फ़ायरिंग करनी पड़ी थी.

गायकवाड ने कहा था, ‘भीड़ ने थाने में तोड़-फोड़ की, रिकॉर्ड रखने वाले कमरे में आग लगा दी, कंप्यूटर और टीवी को तोड़ डाला, पुलिस के वायरलेस को भी तोड़ दिया गया और एक पुलिस वैन को भी आग लगा दी गई.

लोगों को रोकने के लिए पुलिस ने लाठी चार्ज किया, आंसू-गैस के गोले छोड़े और प्लास्टिक की गोलियों का इस्तेमाल किया, लेकिन फ़ायदा नहीं हुआ, तब लोगों को छितराने के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ी. जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई.’

गायकवाड के मुताबिक़ पथराव में क़रीब 50 पुलिसकर्मियों को भी चोटें आईं थीं.

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Image caption फ़्रांस की कंपनी अरेवा की मदद से ये संयंत्र बन रहा है.

इससे पहले सोमवार सुबह माडबन गाँव के पास संयंत्र बनने वाली जगह पर शिवसेना ने विरोध प्रदर्शन किया था जिसका नेतृत्व पार्टी नेता राजन सालवी ने किया था. इसमें क़रीब 200 शिवसेना कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया था. राजन सालवी पुलिस हिरासत में हैं.

गायकवाड के मुताबिक़ इस घटना में कार्यकर्ताओं की ओर से पथराव में एक डीवाईएसपी और पाँच अन्य पुलिसकर्मी घायल हो गए थे. साथ ही पाँच-छह प्रदर्शनकारियों को भी चोटें आईं थी.

'कई सवाल'

स्थानीय लोग जैतापुर में बनने वाले 9900 मेगावॉट परमाणु ऊर्जा संयंत्र के ख़िलाफ़ हैं, हालांकि इसे पर्यावरण मंत्रालय की हरी झंडी मिल चुकी है.

ख़ासकर जापान में आए सूनामी और भूकंप की वजह से परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा को लेकर उठे सवाल के बाद भारत में इन संयंत्रों को लेकर बहस तेज़ हुई है.

23 अप्रैल से इस मुद्दे पर तारापुर परमाणु संयंत्र से जैतापुर तक मार्च की भी तैयारी है. ये मार्च 25 अप्रैल को जैतापुर में ख़त्म होगा और रास्ते में कई जगहों पर सभा होगी जिसमें परमाणु ऊर्जा से उत्पन्न ख़तरों के बारे में लोगों को बताया जाएगा.

मार्च के आयोजक राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा विरोधी यात्रा संयोजन में शामिल संस्था कोंकण विनाशकारी प्रकल्प विरोधी समिति के सत्यजीत चव्हाण ने बीबीसी को बताया कि संयंत्र के प्रस्ताव को निरस्त कर देना चाहिए क्योंकि वहाँ भूकंप की आशंका बहुत ज़्यादा है और पिछले 20 सालों में 90 भूकंप आ चुके हैं.

उनके मुताबिक़ इस मार्च में पूरे देश से 150 कार्यकर्ताओं के हिस्सा लेने की संभावना है जिनमें प्रफ़ुल्ल बिदवई, बनवारी लाल शर्मा, वंदना शिवा, अनिल सदगोपाल, आनंद पटवर्धन और डुनु राय शामिल हैं.

जैतापुर संयंत्र सरकारी कंपनी न्यूक्लियर पॉवर कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड, फ़्रांस की कंपनी अरेवा के सहयोग से बना रही है. कहा जा रहा है कि पूरा हो जाने पर ये एशिया का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा संयंत्र होगा.

लेकिन इस संयंत्र को लेकर कई शिकायतें भी हैं- परमाणु ऊर्जा बिजली पाने का एक ख़तरनाक तरीक़ा है, रेडियोधर्मी कूड़े को संभालकर रखने का तरीक़ा स्पष्ट नहीं है, यहाँ से पैदा बिजली महंगी होगी, फ्रेंच कंपनी अरेवा का सेफ़्टी रिकॉर्ड संदिग्ध है और इस संयंत्र से पर्यावरण पर होने वाले प्रभाव पर तैयार की गई रिपोर्ट नाकाफ़ी है.

लेकिन पर्यावरण के लिहाज़ से संवेदनशील इस इलाक़े पर पड़ने वाले असर को लेकर भी चिंता है क्योंकि यहाँ जैतापुर परमाणु संयंत्र के अलावा कोयले से चलने वाले दूसरे संयंत्रों की भी योजना है.

आलोचकों का कहना है कि उन्हें चिंता इस बात की है कि विकास के होड़ में ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के विचारों और भावनाओं को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है.

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