सोहनलाल चले सिनसिनाटी

  • 20 अप्रैल 2011
ढोलवादक
Image caption ढोल और दमाऊ एक तरह से मध्य-हिमालयी क्षेत्रों में पहाड़ी समाज की आत्मा रहे हैं.

शादी और मुंडन के अवसर पर गांव-गांव में घूम कर ढोल बजाकर गुज़र-बसर करने वाले टिहरी के सोहनलाल ने कभी नहीं सोचा था कि यही ढोल कभी उनकी ज़िंदगी बदल देगा.

पांचवी पास सोहनलाल को तो यही लगता था कि अब न तो ढोल के कद्रदान रह गए हैं और न ही इसके कलाकार रह जाएंगे.

लेकिन उनके और उनके ढोल का सितारा तब चमक उठा जब सिनसिनाटी यूनिवर्सिटी ने उन्हें तीन महीने के लिए बतौर विज़िटिंग प्रोफ़ेसर आमंत्रित किया. उन्हें इस बात पर ख़ुद यक़ीन नहीं हो रहा है.

हाथ जोड़कर अपने ढोल को प्रणाम करते हुए सोहनलाल कहते हैं, "कोई मतलब ही नहीं था ऐसा सोचने का कि हम कभी अमरीका जाएंगे. वो तो पता नहीं कैसे स्टीफ़न से हमारी मुलाक़ात हुई और वो हमसे ढोल सीखने लगे."

टिहरी के चंद्रबदनी पुजार गांव में सोहनलाल से बात करने के लिए टेलीविज़न और अख़बार वालों का तांता लग गया है और सोहनलाल ख़ुशी से छलक रहे हैं.

उन्होंने कहा, "हमने तो ज़िंदगी में और कुछ नहीं किया. बचपन से यही ढोल बजाते रहे और ढोलसागर गाते रहे. बाप-दादा ने हमें यही सिखाया और हमने बस परिवार की परंपरा कायम रखी. अमरीका से प्रोफ़ेसर आए तो उनको भी सिखाया."

दरअसल सिनसिनाटी यूनिवर्सिटी में भारतीय संगीत के सहायक प्रोफेसर स्टीफ़न की पहल पर दो ढोलवादकों, सोहनलाल और सुकारूदास को विज़िटिंग प्रोफेसर के पद के लिए चुना गया है.

ये दोनों ढोलवादक मई में वहां जाएगे और तीन महीने तक वहां के संगीत विभाग में विद्यार्थियों को ढोलसागर पढ़ाएंगे.

पहाड़ों की आत्मा

प्रोफेसर स्टीफ़न ने उत्तराखंड के लोक संगीत के व्यावसायिक पहलू पर पीएचडी की है और इसी सिलसिले में उन्होंने टिहरी और पौड़ी के ढोलवादकों के बीच रहकर शोध किया.

उनकी राय है कि ढोल और पहाड़ के लोक संगीत को आधुनिक जीवन की मांगों और ज़रूरतों से जोड़ कर उन्हें लोकप्रिय और आय का बेहतर स्रोत बनाया जा सकता है.

पुजार गांव के निवासी भगवानदास बताते हैं, "स्टीफ़न बहुत अच्छे आदमी हैं. वो हमारे बीच रहे और हमारे साथ गांव के गीत भी गाए. हमें गर्व है कि हमारे गांव और ढोल का इतना नाम हो रहा है."

ढोल और दमाऊ एक तरह से मध्य हिमालयी यानी उत्तराखंड के पहाड़ी समाज की आत्मा रहे हैं.

पहाड़ में ढोल के महत्तव का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां ढोल बजाने की भिन्न-भिन्न शैलियाँ होने के साथ साथ सैकड़ों ताल भी प्रचलित हैं.

Image caption सिनसिनाटी यूनिवर्सिटी ने सोहनलाल को तीन महीने के लिये बतौर विज़िटिंग प्रोफ़ेसर आमंत्रित किया.

ढोल के व्याकरण और इसकी उत्पत्ति को लेकर उत्तराखंड में एक मौखिक परंपरा भी रही है जिसे ढोलसागर कहते हैं.

ढोलसागर में प्रकृति, मनुष्य, देवताओं और त्योहारों को समर्पित 600 से ज्यादा ताल हैं.

दंतकथाओं के अनुसार ढोल की उत्पत्ति शिव के डमरू से हुई है और ढोल सागर को सबसे पहले स्वयं शिव ने पार्वती को सुनाया था.

जब वो इसे सुना रहे थे तब वहाँ मौजूद एक गण ने इसे कंठस्थ कर लिया. तब से ही ये पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से चला आ रहा था.

ढोल को नया जीवन

वर्ष 1932 में ब्रह्मानंद थपलियाल ने पहली बार इसे लिपिबद्ध किया था और बद्री केदारेश्वर प्रेस ने से इसे प्रकाशित किया था.

मोहनलाल बाबुलकर और केशव अनुरागी ने ढोल के शास्त्रीय रूपों पर काम किया और इसे लोकप्रिय बनाया.

उत्तराखंड के ग्रामीण समाज में जन्म से लेकर मृत्यु तक और घर से लेकर जंगल तक, कहीं कोई संस्कार या सामाजिक गतिविधि नहीं है जो ढोल और इन्हें बजाने वाले ‘औजी’ या ढोली के बग़ैर पूरा होता हो.

औजी प्राय: दलित समुदाय के होते हैं और इन्हें काम के बदले अनाज दिया जाता है.

सदियों से चली आ रही ये व्यवस्था आधुनिक ऑर्केस्ट्रा और बैंड के प्रचलन से बिखरने लगी है और लोग इनसे विमुख होने लगे हैं.

लेकिन सोहनलाल और सुकारूदास को अमरीका बुलाए जाने से ढोल को मानो नया जीवन मिलेगा.

एचएनबी विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर और संस्कृतिकर्मी डॉक्टर डी आर पुरोहित का कहना है, "सोहनलाल का सिनसिनाटी यूनिवर्सिटी के लिए चयन होने से लोग चौंक गए हैं. जो लोग ढोल को हिकारत से देखते थे, उन्हें अब समझ आ रहा है कि ढोल कोई मज़ाक नहीं है. ये हजारों साल पुराना है और इसमें संगीत की जड़ें है."

प्रोफ़ेसर पुरोहित ही प्रोफ़ेसर स्टीफ़न और सोहनलाल के बीच एक माध्यम हैं. पहाड़ के लोकवाद्यों और गीतों को पुनर्जीवित और प्रचलित करने के लिए एक लोक ऑर्केस्ट्रा भी बनाया गया है.

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