सख़्ती से लागू हो लिंग चुनाव-विरोधी क़ानून

Image caption देश के 27 राज्यों में लड़कियों का अनुपात लड़कों के मुकाबले पिछले दस सालों में घटा है.

केन्द्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण सचिव ने सभी राज्यों को लिंग चुनाव-विरोधी पीसी-पीएनडीटी क़ानून को सख़्ती से लागू करने को कहा है.

बुधवार को दिल्ली में 17 राज्यों के स्वास्थ्य सचिवों की बैठक की गई जिसमें बच्चों के घटते लिंगानुपात को रोकने के लिए पीसी-पीएनडीटी क़ानून के अमल पर चर्चा हुई.

2011 के जनमत सर्वेक्षण के मुताबिक़ भारत में बच्चों का लिंगानुपात पिछले 50 सालों के सबसे निचले स्तर पर है.

यानि देश में छह साल से कम उम्र के बच्चों में हर 1000 लड़कों के लिए 914 लड़कियां ही पैदा होती हैं.

इसके पीछे एक मुख्य वजह शिशु के पैदा होने से पहले उसकी लिंग जांच और उसके आधार पर भ्रूण हत्या का प्रचलन है.

इसकी रोकथाम के लिए 1994 में सरकार ने पीसीपीएनडीटी क़ानून (प्री-कनसेप्शन ऐन्ड प्री-नेटल डायग्नॉस्टिक टेकनीक्स ऐक्ट) पारित किया था.

स्वास्थ्य सचिवों की बैठक में केन्द्रीय स्वास्थ्य सचिव, क. चन्द्रमौली ने कहा कि क़ानून के बेहतर अमल के लिए वो राज्यों के मुख्य सचिवों से बातचीत करेंगे ताकि ज़िला प्रशासन को इसके प्रति सजग किया जा सके.

पीसी-पीएनडीटी ऐक्ट 1994

ये क़ानून बच्चे का लिंग चुनने की मंशा से गर्भ में बच्चे की लिंग-जांच करने की तकनीक के इस्तेमाल को ग़ैरक़ानूनी क़रार देता है.

क़ानून का उल्लंघन करने पर तीन साल की सज़ा और 10 हज़ार रुपए के जुर्माने का प्रावधान भी है.

लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक़ पिछले 17 सालों में इस क़ानून के तहत सिर्फ 55 लोगों को सज़ा हुई है, जबकि 902 के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया. यानि महज़ छह फ़ीसदी मामलों में सज़ा.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सोशल मेडिसिन और कम्यूनिटी हेल्थ के प्रोफेसर मोहन राव के मुताबिक़ दिक़्क़त क़ानून में नहीं बल्कि सरकार की नीयत में है.

मोहन राव कहते हैं, "भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में एक बड़ा हिस्सा निजी कंपनियों का है और सरकार इनपर अंकुश लगाने में कामयाब नहीं हो पाई है. हालांकि ये नामुमकिन नहीं, क्योंकि दक्षिण कोरिया समेत कई और देशों में ऐसा किया जा सका है."

पीएनडीटी क़ानून के तहत अल्ट्रासाउंड मशीनों के इस्तेमाल, ख़रीद-फ़रोख़्त इत्यादि के कड़े नियम बनाए गए हैं.

लेकिन नई तकनीक आने की वजह से अब ये मशीनें छोटी हो गई हैं. इन्हें छुपाना और एक जगह से दूसरी जगह इस्तेमाल के लिए ले जाना बहुत आसान और इनको इस्तेमाल करने वालों पर नज़र रखना बेहद मुश्किल हो गया है.

स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक़ पिछले 17 सालों में भारत में सिर्फ 801 अल्ट्रासाउंड मशीनें ग़ैरक़ानूनी इस्तेमाल के चलते ज़ब्त की गईं हैं.

ज़िला स्तर पर जागरूकता

बुधवार की बैठक में सुझाव दिया गया कि राज्यों के स्तर पर अल्ट्रासाउंड मशीनों के इस्तेमाल की जांच और देख-रेख के लिए समितियां बनाई जाएं.

ऐसा ख़ास तौर पर उन ज़िलों में किया जाए, जहां अल्ट्रासाउंड इस्तेमाल करने वाले क्लिनिक और स्वास्थ्य केन्द्र की संख्या ज़्यादा हो.

साथ ही ग़ैरक़ानूनी ढंग से काम कर रहे क्लीनिक, अस्पताल इत्यादि की जानकारी इंटरनेट पर उपल्ब्ध कराने और उनके ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराने की ऑनलाइन सुविधा बनाने का सुझाव भी दिया गया.

संबंधित समाचार