बर्ख़ास्त इंजीनियर की बहाली के आदेश

राशिद हुसैन
Image caption राशिद हुसैन अपने हक़ के लिए सुप्रीम कोर्ट तक लड़ने को तैयार हैं.

जयपुर की एक अदालत ने तीन साल पहले इन्फ़ोसिस कंपनी से बर्ख़ास्त किए गए इंजीनियर राशिद हुसैन को बहाल करने के आदेश दिए हैं.

13 मई 2008 को जयपुर में हुए बम धमाके में लगभग 70 लोग मारे गए थे. 38 वर्षीय राशिद हुसैन उस समय इन्फ़ोसिस कंपनी के जयपुर स्थित बीपीओ ऑफ़िस में सीनियर नेटवर्क इंजीनियर की हैसियत से काम कर रहे थे.

बम धमाके के कुछ दिनों बाद एक जून की सुबह को राजस्थान पुलिस के स्पेशल ऑपरेशन्स ग्रुप के कुछ अधिकारी राशिद हुसैन बम धमाके मामले में पूछताछ के लिए थाने ले गए.

राशिद ने दावा किया कि पुलिस ने कोई केस दर्ज किए बग़ैर उन्हें ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से नौ दिनों तक अपने पास रखा और तमाम छानबीन के बाद भी जब पुलिस को राशिद के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिला तो पुलिस ने उन्हें आख़िरकार नौ जून को छोड़ दिया.

राशिद के अनुसार पुलिस ने उनसे ज़बर्दस्ती ये भी लिखवा लिया कि पुलिस ने उन्हें उसी दिन पूछताछ के लिए थाने लाया था और उन्हें उसी दिन छोड़ रही है.

इसके कुछ दिनों बाद इन्फ़ोसिस ने उन्हें ये कहते हुए नौकरी से बर्ख़ास्त कर दिया कि नौकरी पाते समय राशिद हुसैन ने अपनी पिछली नौकरियों के बारे में ग़लत जानकारियां दी थीं.

राशिद हुसैन ने कंपनी के इस फ़ैसले को क़ानूनी चुनौती देते हुए उसी साल अगस्त में जयपुर की लेबर कोर्ट में अपनी बर्ख़ास्तगी के ख़िलाफ़ केस दर्ज कर दिया था.

लगभग तीन साल के बाद जयपुर की अदालत ने 31 मार्च,2011 को इस बारे में फ़ैसला सुनाया.

Image caption 2008 के जयपुर धमाके के बाद पुलिस ने नौ दिनों तक राशिद हुसैन को ग़ैर क़ानूनी तौर पर अपने पास रखा था.

अदालत ने कंपनी के आरोप को ख़ारिज करते हुए अपने आदेश में कहा कि कंपनी ने राशिद हुसैन को दूर्भावनापूर्वक बर्ख़ास्त किया था और राशिद पर ग़लत आरोप लगाए थे.

'सच्चाई की जीत'

अदालत के फ़ैसले पर राशिद हुसैन ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ये सच्चाई की जीत है.

बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में राशिद हुसैन ने कहा,''ये सच्चाई की जीत थी.पहले सिर्फ़ मैं कह रहा था लेकिन अब देश का क़ानून भी कह रहा है कि मेरे साथ ग़लत हुआ है. ये बहुत बड़ी बात है क्योंकि इस देश की व्यवस्था पर विश्वास रखते हुए मै दो-ढाई साल से लड़ रहा था अब कोर्ट ने मेरा साथ देकर ये साबित किया है कि आप सच्चाई को परेशान कर सकते हैं उसे पराजित नहीं कर सकते हैं.''

राशिद हुसैन ने कहा कि इन्फ़ोसिस जैसी कंपनी से इस तरह से निकाले जाने का उन्हें बहुत दुख हुआ था.

राशिद ने कहा, ''नौ दिनों तक थाने में रहने का सदमा मुझे जितना नहीं था उससे ज़्यादा सदमा मुझे तब हुआ जब कंपनी ने मेरा साथ ऐसा किया. मुझे इसका बहुत दर्द है, लेकिन मुझे क़ानून व्यवस्था पर पूरा विश्वास था और कोर्ट ने मेरे उस विश्वास को क़ायम रखा है.''

राशिद हुसैन ने कहा कि ये फ़ैसला इंसाफ़ की लड़ाई लड़ने वालों के लिए एक बहुत अच्छा संदेश है कि हमें सिस्टम पर भरोसा करना होगा, इसमें कोई शक नहीं कि थोड़ा समय ज़रूर लग सकता है लेकिन अगर आप सच्चाई के रास्ते पर हैं तो सिस्टम आपका साथ देगा और आपकी जीत होगी.

Image caption तमाम प्रयासों के बावजूद इन्फ़ोसिस से इस बारे में कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी.

नौ अप्रैल को अदालत के आदेश की कॉपी मिलने के बाद राशिद हुसैन ने जयपुर स्थित इन्फ़ोसिस के दफ़्तर से संपर्क किया और उन्हें कॉपी सौंप दी लेकिन राशिद के अनुसार अभी तक कंपनी की तरफ़ से उन्हें कोई जवाब नहीं मिला है.

इन्फ़ोसिस

बीबीसी ने भी जब इन्फ़ोसिस से संपर्क करने की कोशिश की तो कंपनी की प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी.

कंपनी के जयपुर स्थित एच आर अधिकारी अभय तालपुलकर और उनके वरिष्ठ पुणे स्थित एचआर अधिकारी क्लिफ़र्ड पाई ने इस बारे में कुछ भी कहने से मना कर दिया जबकि बंगलौर स्थित कंपनी के कॉरपोरेट ऑफ़िस में कई प्रयासों के बावजूद किसी अधिकारी से संपर्क नहीं हो सका.

बहरहाल राशिद हुसैन का कहना है कि उनका उद्दे्श्य इन्फ़ोसिस में दोबारा नौकरी करना नहीं है बल्कि वो ये साबित करना चाहते हैं कि कोई भी कंपनी किसी भी कर्मचारी या अधिकारी को मनमाने ढ़ंग से नहीं निकाल सकती है.

राशिद हुसैन इस समय जयपुर स्थित एक निजि विश्वविद्यालय में अध्यापक हैं और आगे भी वो यही करते रहेंगे. लेकिन वो क़ानूनी लड़ाई जारी रखेंगे.

उनका कहना है कि ज़रूरत पड़ने पर वो सुप्रीम कोर्ट तक जाने के लिए तैयार हैं और उनका दावा है कि इस काम में बहुत सारे लोग उनके साथ हैं.

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