रत्नागिरी में स्थिति तनावपूर्ण पर नियंत्रण में

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महाराष्ट्र के जैतापुर में प्रस्तावित परमाणु संयंत्र के ख़िलाफ़ हो रहे आंदोलन के कारण क्षेत्र में स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है.

संयत्र से कुछ दूर बसे गाँव में सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए हैं. हालांकि रत्नागिरी में मंगलवार को लगाया गया कर्फ़्यू बुधवार सुबह हटा लिया गया था.

जिस व्यक्ति की सोमवार को पुलिस फ़ायरिंग में मृत्यु हो गई थी बुधवार को उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया.

मंगलवार को रत्नागिरी सिविल अस्पताल के बाहर भारी भीड़ जमा हो गई थी जो मृतक व्यक्ति का शव लेने से इनकार कर रही थी. वहाँ झड़पें हुई थीं और साथ ही तोड़फोड़ भी हुई थी.

स्थानीय राजनीति भी इलाक़े में ज़ोर पकड़ चुकी है. ग़ौरतलब है कि शिवसेना पार्टी के कार्यकर्ता भी जैतापुर आंदोलन में काफ़ी सक्रिय हैं.

परमाणु संयंत्र का विरोध कर रहे कई स्थानीय लोगों का कहना है कि शिवसेना उनके आंदोलन का राजनीतिकरण कर रही है और इस राजनीति में उनका मुख्य मुद्दा खोता जा रहा है.

स्थानीय लोग जैतापुर में बनने वाले 9900 मेगावॉट परमाणु ऊर्जा संयंत्र का विरोध कर रहे हैं. इसे पर्यावरण मंत्रालय की हरी झंडी मिल चुकी है और विरोध प्रदर्शन तब भड़के थे जब पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि उन्हें इस परियोजना से कोई आपत्ति नहीं है.

हाल में जापान में आए सूनामी और भूकंप की वजह से फ़ुकुशिमा परमाणु संयंत्र की बुरी हालत के बाद भारत में परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा पर सवाल उठ रहे हैं. भारत में इन संयंत्रों को लेकर बहस तेज़ हो गई है.

ख़तरे की आशंका

जैतापुर संयंत्र सरकारी कंपनी न्यूक्लियर पॉवर कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड, फ़्रांस की कंपनी अरेवा के सहयोग से बना रही है. कहा जा रहा है कि पूरा हो जाने पर ये एशिया का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा संयंत्र होगा.

लेकिन इस संयंत्र को लेकर कई शिकायतें भी हैं- परमाणु ऊर्जा बिजली पाने का एक ख़तरनाक तरीक़ा है, रेडियोधर्मी कूड़े को संभालकर रखने का तरीक़ा स्पष्ट नहीं है, यहाँ से पैदा बिजली महंगी होगी, फ्रेंच कंपनी अरेवा का सेफ़्टी रिकॉर्ड संदिग्ध है और इस संयंत्र से पर्यावरण पर होने वाले प्रभाव पर तैयार की गई रिपोर्ट नाकाफ़ी है.

लेकिन पर्यावरण के लिहाज़ से संवेदनशील इस इलाक़े पर पड़ने वाले असर को लेकर भी चिंता है क्योंकि यहाँ जैतापुर परमाणु संयंत्र के अलावा कोयले से चलने वाले दूसरे संयंत्रों की भी योजना है.

आलोचकों का कहना है कि उन्हें चिंता इस बात की है कि विकास के होड़ में ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के विचारों और भावनाओं को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है.

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