एक चर्चित आध्यात्मिक गुरु

  • 24 अप्रैल 2011
इमेज कॉपीरइट BBC World Service

ये नवंबर 1995 की बात है जब मैं पहली बार अनंतपुर ज़िले में स्थित पुट्टपर्ति गांव गया. अवसर था इस छोटे से कस्बे की सबसे मशहूर और अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त हस्ती सत्य साईं बाबा का 70वां जन्मदिन.

ऐसा लगता था मानो पूरा विश्व ही उमड़ पड़ा हो. कई किलो मीटर दूर तक ट्रैफ़िक जैम था और हज़ारों वाहनें सड़क पर फंसी हुई थीं.

कस्बे के हर बड़े भवन पर एक ही नाम था - साईं बाबा और हर एक की ज़ुबान पर भी वही नाम था. साईं बाबा का आश्रम प्रशांति निलयम भी लोगों से भरा हुआ था जो न केवल पूरे देश से बल्कि दुनिया भर से वहां जमा हुए थे.

स्टेडियम भी देश विदेश के लोगों से खचाखच भरा हुआ था. काफ़ी लंबे इंतज़ार के बाद रथ जैसा एक ऐसा बड़ा वाहन वहां पहुंचा जिसे रस्सियों से खींच कर लाया जा रहा था और रस्सियां खींचने वाले थे उनके चुने हुए भक्त.

सबसे आगे उस समय के आंध्रप्रदेश के पुलिस महानिदेशक एचजे डोरा नंगे पैर चल रहे थे. मंच पर जो लोग प्रबंधन में लगे थे उन में उच्चतम न्यायालय के जज भगवती भी शामिल थे.

राजनीति, प्रशासन, न्याय, सेना, फ़िल्म और खेल जगत--हर क्षेत्र की जानी मानी हस्तियां वहां जमा थीं. साईं बाबा की शक्ति का इससे बड़ा संकेत और क्या हो सकता था कि उस समय के प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव और राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा दोनों ही इस समारोह में उपस्थित थे.

हालाँकि शंकर दयाल शर्मा को चलने में भी मुश्किल हो रही थी लेकिन उन्होंने किसी तरह झुक कर साईं बाबा के चरण स्पर्श किये.

जो बात दिमाग में जम कर रह गई वो ये कि किस तरह साईं बाबा की एक झलक उन के भक्तों को दीवाना बना रही थी और किस तरह विदेशों से आये भक्तों ने उन पर तोहफों की बारिश कर दी थी.

ग़रीब परिवार

यह उस व्यक्ति की अद्भुत कर देने वाली शक्ति और प्रभाव की कुछ मामूली झलकियां थीं जिसकी शुरुआत बहुत मामूली व्यक्ति के रूप में हुई थी.

इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption कई पूर्व प्रधानमंत्री, राजनेता, फ़िल्मस्टार, क्रिकेटर साईं बाबा के भक्त रहे हैं.

साईं बाबा, जिनका वास्तविक नाम सत्यनारयणा राजू था, पुट्टपर्ति के ही एक गरीब परिवार में 23 नवंबर 1926 को जनमे. उन के माता-पिता मजदूरी करके घर चलाते थे.

सत्यनारायणा एक भाई और दो बहनों के बाद सब से छोटे थे. स्कूल के दिनों में ही उनमें आशचर्यजनक परिवर्तन आ गए और वो अचानक बहुत ज़्यादा धार्मिक हो गए.

चौदह वर्ष की आयु में उन्होंने यह घोषणा करके हलचल मचा दी कि वो शिर्डी के साईं बाबा के नए अवतार हैं और रास्ता भटक जाने वाली दुनिया को रास्ता बताने आए हैं.

भजन कीर्तन करने वाले एक किशोर को पीछ छोड़कर वो धीरे-धीरे एक आध्यात्मिक गुरु के रूप में मशहूर हुए और लोग दूर-दूर से उनके पास आने लगे.

1950 तक उन का प्रभाव इतना बढ़ चुका था कि उन्होंने पुट्टपर्ति में अपना आश्रम प्रशांति निलयम बना लिया.

जैसे-जैसे उनके चमत्कारों की बात फैलने लगी और हवा में हाथ घुमा कर विभूति या राख से लेकर बहुमूल्य आभूषण और कीमती घड़ियाँ प्रस्तुत करने की क्षमता के चर्चे होने लगे वैसे-वैसे उनके भक्तों की संख्या भी बढ़ने लगी.

सामाजिक कार्य

भारत में ही नहीं पूरी दुनिया से लोग उनके आश्रम का रुख करने लगे. और यह सब तब हो रहा था जब साईं बाबा ने अपने पूरे जीवन में सिर्फ़ एक बार विदेश की यात्रा की और वो भी युगांडा की.

भक्तजन उन्हें भगवन कहकर पुकारने लगे.

प्रभाव और शक्ति के साथ-साथ उनके साधन भी बढ़ने लगे और एक अंदाज़े के अनुसार उनके अनेक ट्रस्टों के अंतर्गत एक हज़ार करोड़ से ज़्यादा की संपत्ति थी.

यूं तो उन्होंने देश-विदेश में कई आध्यात्मिक केंद्र स्थापित किए, कॉलेज और स्कूल खोले लेकिन उन का सबसे बड़ा काम सूखे से पीड़ित अनंतपुर ज़िले में हुआ जहाँ उन्होंने सैंकड़ों गांवों के लिए पीने के पानी की योजना पर 200 करोड़ रुपए खर्च किए.

पुट्टपर्ति नगर में उन्होंने एक विश्वविद्यालय, गरीबों के मुफ्त इलाज के लिए आधुनिक अस्पताल, एयरपोर्ट और स्टेडियम बनवाया.

विवाद

लेकिन इन सबके बावजूद वो विवादों और आलोचनाओं से नहीं बच सके. जहां बुद्धिजीवी उन पर ढोंगी होने और लोगों को बेवक़ूफ़ बनाने का आरोप लगा रहे थे वहीं विदेशी यात्रियों ने उन पर समलैंगिकता और लड़कों से साथ यौन दुराचार का आरोप लगाया.

इन आरोपों की गूंज यदा-कदा भारतीय समाचार माध्यमों में भी सुनाई देती रही.

इनमें से दो घटनाओं ने बहुत बड़ा तूफ़ान खड़ा कर दिया.

हैदराबाद में एक समारोह में उन्होंने हवा में हाथ लहराकर सोने की ज़ंजीर अपनी भक्तों को दिखाई लेकिन बाद में उसका वीडियो देखने से पता चला की वो ज़ंजीर उन्होंने अपनी आस्तीन से निकाली थी.

इस घटना के बाद कई बुद्धिजीवियों ने साईं बाबा को चुनौती दी कि वो अपना लबादा निकाल कर और आम कपड़े पहने कर उनका सामना करें और चमत्कार दिखाएं.

एक बार बंगाल के मशहूर जादूगर पी सी सरकार ने भी उन के मुकाबले में हाथ की सफ़ाई दिखाई. जहाँ बाबा ने कीमती घड़ी हवा में से निकालने का दावा किया वहीं उसी आश्रम में मौजूद सरकार ने रसगुल्ला पेश कर के हंगामा मचा दिया. साईं बाबा के कर्मचारियों ने उन्हें वहां से निकाल बाहर किया.

इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption उनके दर्शन के लिए विशाल भीड़ जुटती थी.

उस के कुछ ही समय बाद चार युवा उनके प्रशांति निलयम में सुरक्षा कर्मियों के हाथों मारे गए. आश्रम के अधिकारियों ने कहा कि उन्होंने साईं बाबा के बेडरूम में घुस कर उन्हें मारने की कोशिश की थी. इस घटना ने कई दूसरी अफ़वाहों को जन्म दिया लेकिन सच्चाई कभी सामने नहीं आ सकी.

अगर इस तरह की घटनाएं किसी और गुरु के साथ होतीं तो शायद उसका अस्तित्व ख़तरे में पड़ जाता लेकिन जिस गुरु के भक्तों में मंत्री से लेकर संतरी सभी शामिल हों उस का कुछ नहीं बिगड़ सका.

साईं बाबा का सिक्का किस तेज़ी से चलता रहा उसका एक अंदाज़ा इस बात से भी होता है कि नक़ल करने वाले भी काफी सफल रहे हैं. उन के जीते जी एक और साईं बाबा “बाला साईं बाबा” को भी काफ़ी लोकप्रियता मिली है.

अब सब की ज़ुबान पर ये सवाल है कि साईं बाबा के बाद उन की जगह कौन लेगा और हज़ारों करोड़ रुपए की संपत्ति किस को मिलेगी. उनके ट्रस्ट में उन के दिवंगत बड़े भाई जानकी राम के पुत्र रत्नाकर का काफी प्रभाव है. लेकिन अगर कोई उत्तराधिकारी बन कर सामने नहीं आता है तो साईं बाबा की सल्तनत में फूट भी पड़ सकती है.

साईं बाबा ने खुद यह कह रखा है की उनका उत्तराधिकारी कर्नाटक के मंडिया ज़िले में प्रेमा साईं के रूप में जन्म लेगा. उन की इस भविष्यवाणी को 50 वर्ष गुज़र चुके हैं लेकिन अब तक उस का कोई पता नहीं.

कहा जाता है कि शिर्डी के फ़क़ीर साईं बाबा ने भी 1918 में अपनी मृत्यु से पहले यह भविष्यवाणी की थी कि उनका उत्तराधिकारी मद्रास प्रेसिडेंसी में जन्मेगा और अनंतपुर ज़िला उस ज़माने में मद्रास का हिस्सा था.

ये और बात है कि जो शिर्डी के साईं बाबा गरीबी में जन्मे और गरीबी में ही लोगों की सेवा की, उनका उत्तराधिकारी एक अरबपति निकला.

संबंधित समाचार