फ़ुकुशिमा का असर जैतापुर में

  • 22 अप्रैल 2011
जैतापुर
Image caption जैतापुर परमाणु संयंत्र का विरोध कर रहे लोग जापान के फ़ुकुशीमा की मिसाल दे रहे हैं.

जैतापुर में प्रस्तावित परमाणु संयंत्र की जगह के आसपास कई जगह बड़े-बड़े बैनर्स और पोस्टर्स लगे हैं, जिनमें जापान में हाल ही में आए सुनामी और भूकंप की वजह से तबाही और परमाणु ख़तरे की तस्वीरे हैं.

यहाँ लोगों का ध्यान जापान से आने वाली ख़बरों पर हैं, वो टीवी पर जापान से आ रही तस्वीरें देख रहे हैं, अख़बारों में लेख पढ़ रहे हैं.

इस यात्रा के दौरान हमें कई लोगों ने कहा- हम पहले ही परमाणु संयंत्र से पैदा ख़तरों के बारे में बोल रहे थे. हमारी बात आख़िरकार सच निकली.

एक व्यक्ति ने कहा, "सरकार का सुरक्षा का आश्वासन कोरी बकवास है. 26/11 के मुंबई हमलों के पहले भी सरकार सुरक्षा की बात करती थी, लेकिन आपने देखा वहाँ क्या हुआ."

लोग जापान की घटना से डरे और सहमे हुए हैं.

फ़ुकुशिमा का प्रभाव

पास ही माडबन गाँव में रहने वाले सागर मांजरेकर कहते हैं, "जो वहाँ हुआ वो यहाँ नहीं होना चाहिए. इसलिए हम प्रोजेक्ट के ख़िलाफ़ हैं."

कृषि वैज्ञानिक एसबी कादरेकर कहते हैं कि जापान की घटना ने जैतापुर परमाणु संयंत्र के ख़िलाफ़ आंदोलन को बहुत प्रभावित किया है और लोगों का विरोध ज़्यादा कड़ा हुआ है.

वो कहते हैं, "जापान में जो हुआ वो एक दुर्घटना थी. वहाँ जो हुआ वो सुनामी और भूकंप की वजह से हुआ, लेकिन यहाँ ऐसा ख़तरा कम है क्योंकि जैतापुर संयंत्र ज़मीन से काफ़ी ऊंची जगह पर स्थित होगा. लेकिन इलाक़े के आसपास रहने वाले ज़्यादातर लोग बहुत पढ़े-लिखे नहीं हैं. उन्हें ये समझाना मुश्किल है."

जैतापुर संयंत्र का विरोध कर रहे डॉक्टर मिलिंद नारायण देसाई इन दलीलों से प्रभावित नहीं हैं.

वो कहते हैं, "लोगों ने फुकुशिमा के बारे में जो देखा और पढ़ा है वो भीषण है. फुकुशिमा डायची के आसपास के 30 किलोमीटर के दायरे में अब कोई नहीं रहता. वहाँ 460 मेगावॉट का प्लांट था. हमारा प्रोजेक्ट क़रीब 10 हज़ार मेगावॉट का है. क्या हालत होगी हमारी?"

यहाँ पर लोग पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश से ख़ासे नाराज़ हैं.

जयराम रमेश

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Image caption जापान में आए भूकंप और सुनामी के कारण फ़ुकुशीमा परमाणु संयंत्र क्षतिग्रस्त हो गया था.

फ़ुकुशिमा हादसे के बाद जयराम रमेश का बयान आया था, जिसमें उन्होंने जैतापुर सहित बड़े परमाणु पार्कों की फिर से समीक्षा की बात की थी.

उस बयान के बाद लोगों को उम्मीद बंधी थी कि जैतापुर को लेकर सरकार का रवैया बदलेगा. लेकिन कुछ दिनों बाद जयराम रमेश का एक और बयान आया जिसमें उन्होंने जैतापुर संयंत्र को बनाने की बात दोबारा की. इससे स्थानीय लोगों को काफ़ी धक्का पहुँचा है.

वो बार-बार तर्क देते हैं कि सरकार कुछ छिपाने की कोशिश कर रही है.

वो उन वरिष्ठ वैज्ञानिकों की बात करते हैं जो संयंत्र के ख़िलाफ़ हैं और इससे होने वाली तबाही की बात करते हैं. उनका कहना है कि जब बड़े-बड़े वैज्ञानिक संयंत्र पर सवाल उठा रहे हैं, तो फिर सरकार मामले को क्यों आगे बढ़ा रही है.

वो परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व चेयरमैन अनिल काकोदकर की बात सुनने को तैयार नहीं हैं.

लोगों का कहना है कि ऐसा लगता है कि किसी को उनकी जान-माल की कोई फ़िक्र नहीं है और उनका आरोप है कि सरकार अंतरराष्ट्रीय दबाव के सामने झुक रही है.

वो बार-बार कहते हैं कि जब जापान जैसे विकसित देश में, जहाँ सुरक्षा को इतनी प्राथमिकता दी जाती है, वहाँ इतना बड़ा हादसा हो सकता है, तो भारत की क्या हैसियत है.

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