'टीबी लेकर ब्रिटेन आते हैं भारतीय'

  • 22 अप्रैल 2011
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Image caption विश्व स्वास्थय संगठन के मुताबिक टीबी एक महामारी है

एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ब्रिटेन में हवाई अड्डे की स्क्रीनिंग मशीनें ख़ासतौर पर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले आप्रवासियों में टीबी के छिपे हुए प्रकार को पता लगाने में विफल हो रही है.

विज्ञान पत्रिका लैंसेट की इस रिपोर्ट में कहा गया कि इसका मतलब ये है कि जिस स्क्रीनिंग प्रणाली का इस्तेमाल हो रहा है उसके ज़रिए 70 प्रतिशत छिपे हुए टीबी के प्रकार का पता नहीं चल पा रहा है.

वैज्ञानिकों ने ये जानने की कोशिश की कि टीबी की जांच प्रणाली कितनी प्रभावी है. उन्होंने साल 2008 से 2010 के बीच तीन आप्रवासी स्क्रीनिंग सेंटर से मिले आंकडो का आकलन किया.

लैंसेट में प्रकाशित नतीजों से पता चला कि भारतीय उपमहाद्धीप से 20 प्रतिशत आप्रवासी और क़रीब 30 प्रतिशत अफ्रीकी क्षेत्रों के आप्रवासियों में टीबी का छिपा हुआ प्रकार पाया गया.

नीति

ब्रितानी सीमा नीति के मुताबिक़ जिन देशों में प्रति एक लाख लोगों पर 40 में टीबी के मामले सामने आते हैं, उन देश के लोगों के ब्रिटेन आने पर टीबी के लिए टेस्ट किया जाता है.

इन देशों में अफ्रीकी देश आते है और इनमें एशियाई देशों जैसे भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को नहीं गिना जाता है

लंदन के इम्पीरियल कॉलेज में ट्यूबरकुलोसिस रिसर्च यूनिट के निदेशक प्रोफ़सर अजीत लालवानी का कहना है, "हमारे शोध से ये पता चलता है कि ब्रिटेन में जो लोग दूसरे देशों से आते है उनमें टीबी के छिपे हुए प्रकार का संक्रमण होने की ज़्यादा संभावना होती है ."

उनका कहना था, "ब्रिटेन में टीबी की जांच के लिए जो राष्ट्रीय दिशानिर्देश हैं, उनमें ये बात नहीं लिखी कि किस उम्र के आप्रवासियों में टीबी के इस छिपे हुए प्रकार की जांच की जाए. हमने बताया है कि अगर जांच को बदला जाए और इसके दायरे में भारतीय उपमहाद्धीप के आप्रवासियों को भी शामिल किया जाएगा तो हम 92 प्रतिशत टीबी का पता लगा सकेंगे. "

विश्व स्वास्थय संगठन के मुताबिक़ दुनिया भर में टीबी को एक महामारी के तौर पर देखा जाता है.15 देशों में टीबी के सबसे ज़्यादा मामले 13 अफ्रीकी देशों में है. वहीं एक तिहाई नए मामले भारत और चीन से आते है.

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