मीडिया भी संदेह के घेरे में

  • 27 अप्रैल 2011
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल
Image caption मीडिया भी भ्रष्टाचार के आरोपों से अछूता नहीं है.

जब आप अख़बार या मैगज़ीन में किसी भी ख़बर को शुरू से अंत तक पढ़ते है या फिर न्यूज़ चैनल पर किसी ख़बर को देखते है तो आपको क्या लगता है कि वो निष्पक्ष होती है.

भारत में जहाँ चारों ओर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर गर्मागर्म बहस हो रही है, वहीं इस बीच मीडिया भी भ्रष्टाचार के आरोपों से अछूता नहीं है.

दिल्ली में ट्रांसपरेंसी इंटरनेशल और फ़ाइव पिलर के बैनर तले 'भ्रष्टाचार से मुक्ति' मुद्दे पर हुई बैठक में चौथे स्तंभ की भूमिका पर सवाल उठाए गए.

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर हुई इस बहस में मीडिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए इकॉनॉमिक टाइम्स के पत्रकार मनोज मित्ता का कहना था कि मीडिया पर कॉरपोरेट संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के कारण वह समाज के प्रति अपने दायित्व को पूरा नहीं कर रहा है.

उनका कहना था, "मीडिया पर दबाव रहता है कि जिस कहानी की मार्केट वैल्यू हो यानि जिस ख़बर से सर्कुलेशन बढ़े या वो ख़बर टीआपी बढ़ाए, उस पर ज़ोर देने की बात की जाती है. जिस भी ख़बर में हितों का टकराव हो, उस ख़बर को नज़र अंदाज़ कर दिया जाता है."

पिछले दिनों कॉरपोरेट लॉबिंग करने वाली नीरा राडिया के फ़ोन टैपिंग की बात सामने आई थी और उस फ़ोन रिकॉर्डिंग में कुछ जाने-माने पत्रकारों के नाम भी आए थे.

इस बैठक में ये आवाज़ उठी कि भारत में क़ानून तो है, लेकिन लोगों में क़ानून का डर होना भी ज़रूरी है.

महत्व

सुप्रीम कोर्ट में वकील अशोक अरोड़ा का कहना था कि इस समस्या से निपटने के लिए लोगों को शिक्षा का महत्व समझाना होगा और लोगों को उनके कर्तव्यों के बारे में जागरूक करना होगा.

उनका कहना था, "अच्छे लोगों को राजनीति में लाने के लिए नेतृत्व का निर्माण करना जरूरी है साथ ही साथ क़ानून को सख़्त बनाना होगा."

भ्रष्टाचार केवल रिश्वत लेने-देने से संबधित हो ऐसा नहीं है, बाज़ारीकरण के युग में भ्रष्टाचार के एक और पहलू को समझना ज़रूरी है.

कॉरपोरेट जगत के इस युग में प्रतिस्पर्धा ज़्यादा है और इसके चलते निजी कंपनियाँ, सरकारी कंपनियों से साँठ-गाँठ कर सरकार की नीति बनाने वाली प्रणाली में शामिल हो जाती है और फिर नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश करती हैं.

एशिया के इंटरनेशनल बेबी फूड ऐक्शन नेटवर्क के क्षेत्रीय संयोजक डॉक्टर अरूण गुप्ता ने कहा," हितों के टकराव के चलते निजी कंपनियों को सरकारी नीतियों में शामिल नहीं किया जाना चाहिए. इसके लिए क़ानून होना चाहिए जो पता लगाए कि कहाँ हितों का टकराव हो रहा है."

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के अध्यक्ष पीएस बावा ने कहा है कि इस बहस के ज़रिए जो भी मुद्दे उठाए जा रहे हैं और समाधान सुझाए जा रहे हैं, उन्हें सरकार के पास ले जाया जाएगा ताकि भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जा सके

बहरहाल इस बैठक में आए ज़्यादातर वक्ताओं का मानना था कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए क़ानून के तहत सख़्त कार्रवाई और लोगों की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत है.