दिनाकरन के ख़िलाफ़ जांच पर रोक

  • 29 अप्रैल 2011
दिनाकरन
Image caption राज्यसभा के 75 सांसदों ने जस्टिस दिनाकरन के ख़िलाफ़ महाभियोग चलाने की मांग की है.

उच्चतम न्यायालय ने कार्यालय के दुरुपयोग, ज़मीन के अधिग्रहण और भ्रष्टाचार के कथित आरोप झेल रहे सिक्किम उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पीडी दिनाकरन के ख़िलाफ़ महाभियोग पूर्व जांच पर रोक लगा दी है.

दिनाकरन के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोपों की पड़ताल के लिए राज्यसभा ने एक समिति बनाई थी और उसे महाभियोग के पहले जांच का ज़िम्मा सौंपा था.

यदि यह समिति दिनाकरन को दोषी पाती है और उन्हें पद से हटाने की सिफ़ारिश करती है तो मामले को संसद में मतदान के लिए पेश किया जाएगा.

उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को जस्टिस दिनाकरन की एक याचिका पर फ़ैसला सुनाते हुए यह रोक लगाई. इस याचिका में दिनाकरन ने तीन सदस्यीय न्यायिक समिति द्वारा पक्षपातपूर्ण जांच की आशंका जताई थी.

'पक्षपात की आशंका'

समिति में सुप्रीम कोर्ट के जज आफ़ताब आलम, कर्नाटक होई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस जेएस खेहर और वरिष्ठ वकील पीपी राव शामिल हैं.

इक्सठ साल के जस्टिस दिनाकरन की तरफ़ से उनके वकील अमरेंद्र शरण ने सुप्रीम कोर्ट के जज एचएसस बेदी और जस्टिस सीके प्रसाद की बेंच के सामने दलील दी कि राव उन वकीलों के प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे, जिन्होंने 2009 में दिनाकरन की उच्चतम न्यायालय में पदोन्नति के विरोध में भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायधीश केजी बालाकृष्णन से मुलाक़ात की थी. उन्होंने कहा कि जांच समिति में राव के शामिल होने से पक्षपात होने की आशंका है.

अपनी याचिका में जस्टिस दिनाकरन ने कहा, ''अगर जांच के दौरान न्याय के बाधित होने और पक्षपात की संभावना है तो संबंधित न्यायधीश को जांच का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए. न्याय का बुनियादी सिद्धांत है कि न्याय न सिर्फ़ होना चाहिए बल्कि प्रतीत भी होना चाहिए.'' बेंच ने दलीलों को सुनने के बाद समिति की कार्रवाई पर रोक लगा दी और समिति के अध्यक्ष जस्टिस आफ़ताब आलम और वकील पीपी राव को नोटिस जारी किया.

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