यहां बेटियां पसंद नहीं?

  • 7 मई 2011
Image caption हरियाणा के झज्जर ज़िले में महिलाएं चाहती हैं कि गर्भ में बच्चे की लिंग जांच ना की जाए.

भारत की जनगणना-2011 के मुताबिक़ हरियाणा के झज्जर ज़िले में लड़कों के मुक़ाबले लड़कियों का अनुपात देश में सबसे कम है.

यहां हर 1000 लड़कों के मुक़ाबले 774 लड़कियां ही हैं, जबकि पूरे देश में ये अनुपात 1000:914 है.

झज्जर में इस कम लिंगानुपात की एक बड़ी वजह गर्भ में ही बच्चियों को मार दिया जाना है.

इस ज़िले में आख़िर लड़कियों को पसंद क्यों नहीं किया जाता, यही जानने के लिए हम झज्जर के एक गांव ‘कोहन्द्रा वाली’ पहुंचे.

लिंग-जांच कर भ्रूण हत्या

लेकिन ये सवाल पूछे जाने पर इस गांव में रहने वाली 65 वर्षीय महिला, विद्या उत्तेजित हो गईं.

वो कहने लगीं कि ये सवाल सरकार से पूछा जाना चाहिए, जिन्होंने गर्भ में लिंग जांच करने की तकनीक (अल्ट्रासाउंड मशीन) उप्ल्ब्ध कराई.

उन्होंने कहा कि, सरकार ने छोटे परिवार बनाने की बात कह कर बेटे की चाहत रखनेवाले परिवारों को बच्चियों को मारने की एक और वजह दे दी है.

Image caption लिंग जांच के लिए अल्ट्रासाउंड मशीनों का गैरकानूनी इस्तेमाल किया जा रहा है.

हालांकि विद्या के घर में बेटों से ज़्यादा बेटियां हैं.

मुझसे बात करते हुए वो रुंआसी हो गईं और बोलीं, “मैं कहती हूं कोख में जो है, बेटा या बेटी उसे होने क्यों नहीं देते, बेटियों ने ऐसा क्या किया जो उन्हें मार देते हो.”

गांव की और महिलाओं ने भी उनसे हां में हां मिलाते हुए कहा कि अल्ट्रासाउंड मशीन ना होती तो बच्चियों को मारा नहीं जाता.

इस गांव में तो अल्ट्रासाउंड की सुविधा नहीं है लेकिन झज्जर और उसके आस-पास के शहरों, बहादुरगढ़ और बेरी में ये आसानी से उप्ल्ब्ध है.

लिंग-जांच विरोधी कानून में कमियां

1994 में भारत सरकार ने पीसी-पीएनडीटी क़ानून पारित किया था जिसके तहत गर्भ में लिंग जांच करना ग़ैरक़ानूनी है.

इसके बावजूद अल्ट्रासाउंड मशीनों का ग़लत इस्तेमाल कर ऐसा किया जा रहा है.

एक निजी क्लीनिक में अल्ट्रासाउंड का इस्तेमाल करने वाली डॉ पुनिया ने बताया, “पहले मेरे पास भी लिंग जांच करवाने के लिए गांवों से महिलाएं आतीं थीं, लेकिन धीरे-धीरे ये बात फैल गई कि यहां ऐसा नहीं होता, तो अब कोई नहीं आता.”

क़ानून को लागू करने की ज़िम्मेदारी हर ज़िले के सिविल सर्जन या चीफ़ मेडिकल अफ़सर को दी गई है.

जब मैं झज्जर के सिविल सर्जन डॉ. भरत सिंह से मिली, तो उन्होंने माना कि ग़ैरक़ानूनी ढंग से लिंग जांच हो रही है लेकिन अपनी सफ़ाई में उन्होंने क़ानून की ख़ामियां गिना दीं.

डॉ सिंह ने कहा, “ये सुविधा देने के लिए डॉक्टर को पैसे मिलते हैं और परिवार को अनचाहे गर्भ से निजात, तो कोई भी शिकायत क्यों करे, वो भी तब जब क़ानून के तहत डॉक्टर और लिंग जांच करवाने वाले परिवार दोनों को सज़ा का प्रावधान है.”

डॉ सिंह ने ये भी बताया कि अब ये क़ानून अल्ट्रासाउंड मशीनों को मोबाइल वैन में ले जाने की अनुमति भी देता है, ऐसे में दूसरे राज्यों से आने वाली वैन्स पर नज़र रखने की ज़रूरत है जो की मुश्किल है.

लड़के की चाहत क्यों

यानि क़ानून होने के बावजूद बेटे की चाह प्रबल है और परिवारों को उसका उल्लंघन करने को उकसाती है.

Image caption झज्जर के सिविल सर्जन मानते हैं कि कानून का उल्लंघन हो रहा है.

झज्जर के ‘कोहन्द्रा वाली’ गांव में रहने वाले युवा विनोद कुमार मानते हैं कि सबके मन में एक बेटे की इच्छा है, क्योंकि बेटियों को पालना घाटे के सौदे की तरह देखा जाता है.

विनोद ने कहा, “इसकी प्रमुख वजह दहेज प्रथा है, और अब ज़्यादा दहेज देने का दबाव है क्योंकि दहेज को समाज में प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाने लगा है.”

हरियाणा के अन्य गांवों की तरह यहां भी महिलाएं घर संभालती हैं और पुरुष ज़्यादातर खेती के ज़रिए जीविका चलाते हैं.

एक बुज़ुर्ग रामधारी कहते हैं कि, बेटों को ही आमदनी का ज़रिया और बुढ़ापे का सहारा माना जाता है.

हालांकि यहां मिली कई महिलाओं ने पुरुषों से नज़रें बचाते हुए कहा कि अक्सर बेटियां ही अपने मां-बाप और सास-ससुर दोनों की देखभाल करती हैं.

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि बेटियां पैदा होने के बाद भी पुरुष प्रधान समाज इनके पालन-पोषण में फ़र्क़ करता है.

नैश्नल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक़ पैदा होने से एक साल की उम्र तक, बेटों के मुक़ाबले बेटियों के मर जाने की संभावना 40 फ़ीसदी ज़्यादा है.

वहीं पहले और पांचवे वर्ष की उम्र में तो ये और भी ज़्यादा, 61 फीसदी है.

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