'कई क़ानूनों को बदलने की ज़रुरत'

विनायक सेन
Image caption विनायक सेन का कहना है कि कई क़ानूनों में बदलाव होने चाहिए.

पेशे से डाक्टर और मानवाधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन का कहना है कि राजद्रोह से जुडी भारतीय दंड विधान की धरा 121, 124 और छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम ऐसे कानून हैं जो सिर्फ सरकारों के खिलाफ उठ रहे विरोध के स्वरों को कुचलने के लिए बनाए गए हैं.

बीबीसी के सन्डे के सन्डे कार्यक्रम में उनका कहना था कि राज द्रोह के कानून उस ज़माने के हैं जब ब्रितानी साम्राज्यवाद को मज़बूत करने के लिए हर उस आवाज़ को कुचल दिया जाता था जो ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ आवाज़ उठाने का काम करती थी.

वह कहते हैं कि आज़ाद भारत में इन कानूनों की कोई जगह नहीं होनी चाहिए और वह इस मुद्दे को लेकर पूरे देश में एक आम राय बनाने की कोशिश करेंगे.

सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत पर रिहा होने के बाद महाराष्ट्र के वर्धा स्थित उनके आवास पर बीबीसी ने उनसे एक लम्बी बातचीत की.

यह जो एक लम्बा अरसा रहा आपकी गिरफ्तारी का. फिर ज़मानत का और फिर जेल का और फिर एक बार ज़मानत आपको क्या लगता है कि इसके पीछे क्या कारण हैं.?

सबसे पहले हमें समझना पड़ेगा कि सरकार की भूमिका क्या है. जिस बस्तर के सुदूर इलाके में मैं काम कर रहा था वहां के आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोग प्राकृतिक संसाधनों पर अपना हक समझते हैं. सबसे पहले जब मैंने बस्तर के इलाके में अपना काम शुरू किया तो वहाँ पर मैंने लोगों की पोषण की स्थिति का जायजा लिया जो काफी चौकाने वाला था. वैसे भी देश के 37 प्रतिशत लोग कुपोषित हैं. उसी तरह पूरे देश में अगर आदिवासियों कि स्थिति को देखा जाए तो 50 प्रतिशत से ज्यादा आदिवासी कुपोषण का शिकार हैं. वहीँ 60 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के लोग भी कुपोषण का शिकार हैं. हाल ही में सच्चर कमिटी की रिपोर्ट के अनुसार अल्पसंख्यकों में भी एक बड़ा तबका कुपोषण से जूझ रहा है. मैं मानता हूँ कि कुपोषण ढांचागत हिंसा का सुबूत है. इस ढांचागत हिंसा के मारे हुए लोग अगर जिंदा हैं तो वह इस लिए क्यों कि वह काफी हद तक प्राकृतिक संसाधनों पर आश्रित हैं. अब इन प्राकृतिक संसास्धनों पर सरकार अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहती है. ऐसा होने से लोगों के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा हो जाता है. जब एक नागरिक के नाते मैंने इसके खिलाफ आवाज़ उठाई या फिर सरकार द्वारा प्रायोजित सलवा जुडूम और कोया कमांडो जैसे हथयारबंद समूहों के खिलाफ मैंने आवाज़ उठाई तो उसका परिणाम हुआ कि मेरे खिलाफ राज द्रोह का मामला दर्ज किया गया.

अचानक आपको कह दिया गया कि आप माओवादियों के समर्थक हैं. ऐसा क्यों कहा गया?

यह बात बिलकुल बेमानी है. मैं किसी का समर्थक नहीं हूँ. एक मानवाधिकार कार्यकर्ता हूँ. वैसे भी मुझे ज़मानत देते हुए सुप्रीम कोर्ट नें कहा है कि मेरे खिलाफ राज द्रोह या देश द्रोह के कोई सुबूत नहीं हैं.

आप मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल के उपाध्यक्षों में से एक हैं. आप जब जेल गए तो देश भर से सामाजिक संगठन आपके साथ खड़े नज़र आए. इसके अलावा नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने भी आपके समर्थन में गोलबंद होना शुरू किया. मगर देश की विभिन्न जेलों में ऐसे कितने बिनायक सेन होंगे जो इसी तरह के आरोपों में जेलों में क़ैद हैं.

मेरे लिए यह ख़ुशी की बात है कि इस बहाने कम से कम राजद्रोह या छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम और यूएपीए जैसे कानूनों पर समाज में चर्चा हो रही है. मेरे मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने भी अब इन कानूनों पर बहस छेड़ दी है. हाल ही में देश के कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने भी कहा कि इन कानूनों की फिर से समीक्षा होने चाहिए और इन कानूनों को आज़ाद भारत के परिप्रेक्ष्य में देखने की ज़रुरत है. चाहे वह भारतीय दंड विधान की धरा 121, 124 हो या फिर यूएपीए और छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा अधिनियम. इन कानूनों के तहत सैकड़ों लोग भारतभर की जेलों में बंद हैं. यह वह लोग हैं जो सरकार की ग़लत नीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाते रहे हैं. अब वक़्त आ गया है कि ऐसे सब मामलों की समीक्षा हो जिन मामलों में इन धाराओं का इस्तेमाल किया गया है.

छत्तीसगढ़ का जो माहौल है फिलहाल -- यह एक रक्त रंजित भूमि बन गयी है. यहाँ युद्ध जैसे हालात हैं. बड़े पैमाने पर हिंसा हो रही है. चाहे वह माओवादियों की तरफ से हो रही हिंसा हो या सुरक्षा बलों की तरफ से. इस हिंसा में आम आदमी पिस रहा है. इस हिंसा को आप कैसे देखते हैं ?

सबसे बड़ी हिंसा का उदाहरण यही है कि एक बड़े इलाके में लोग अकाल जैसी परिस्थितियों से जूझ रहे हैं. इससे बड़ी हिंसा और क्या हो सकती है? हिंसा का दूसरा रूप है विस्थापन. यहाँ की प्राकृतिक संपदाओं के दोहन के लिए बड़े पैमाने पर स्थानीय लोगों या आदिवासियों को हटाया जा रहा है. ताज़ा मिसाल है बस्तर जहाँ लगभग 640 गावों को विस्थापित किया गया है. हिंसा किसी रूप में हो वह निंदनीय है. हम माओवादियों द्वारा की गई हिंसा की निंदा करते हैं साथ ही सरकार द्वारा प्रायोजित हिंसा की भी निंदा करते हैं. अब प्रयास यह होना चाहिए कि बातचीत के ज़रिये हिंसा को रोका जाए.

लेकिन बातचीत कैसे हो सकती है जब दोनों ही पक्ष अपनी अपनी जिद पर अड़े हों. माओवादी भी बातचीत के लिए शर्तें रखते हैं और सरकार भी. कोई झुकना नहीं चाहता है.

मुझे लगता है कि अगर ऐसी परिस्थितियां पैदा की जाएँ जिसमे सभी पक्ष बैठ कर बात करें तो ऐसा हो सकता है.

क्या यह संभव है कि दोनों तरफ से युद्ध विराम हो और बातचीत की जा सके ?

मुझे पूरा विश्वास है कि लोग युद्ध विराम करने के लिए तैयार हैं. मुझे लगता है कि अगर हम बातचीत की परिस्थिति पैदा करेंगे तो युद्ध विराम भी ज़रूर होगा.

आपके मामले में एक और बहस छिड़ी. वह है निचली अदालतों की कार्यशैली पर. रायपुर की निचली अदालत के फैसले के बाद कई कानूनविदों ने अपनी अपनी राय रखी. आपका क्या कहना है?

मैं तो एक बहुत छोटा आदमी हूँ और अदालत का मारा हुआ हूँ. मेरे मामले में एक तरफ सत्र न्यायलय नें मुझे राजद्रोह का दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मेरे मामले में राजद्रोह का कोई सुबूत नहीं है. मैं जेल में रहा और वहां जिन कैदियों से मिला और उनके मामलों के बारे में जानकारी ली तो मुझे लगता है कि मानिटरिंग यानि के निचली अदालतों के काम काज और फैसलों पर निगरानी तो होनी ही चाहिए.

लोकपाल विधेयक में मांग की जा रही है कि न्यायपालिका को भी इसके दायरे में लाया जाए?

लोकपाल विधेयक के बारे में मैं ज्यादा नहीं जानता मगर मुझे लगता है कि अदालतों खास तौर पर निचली अदालतों में क्या हो रहा है इसकी निगरानी के लिए एक सिस्टम बनना चाहिए.

जेल जाने से पहले आप बस्तर के सुदूर इलाकों में आदिवासियों के बीच रहकर काम कर रहे थे. उन्हें चिकित्सा मुहय्या करा रहे थे. फिर एक लम्बा अरसा आपने जेल में बिताया. आप पर मुक़दमा दर्ज किया गया. अब आप ज़मानत पर रिहा हुए हैं. तो क्या अब आप फिर एक बार बस्तर के उन इलाकों में वापस लौटकर उसी तरह काम करना चाहेंगे जिस तरह आप जेल जाने से पहले कर रहे थे.

मैं अब उस तरह काम कर सकूंगा या नहीं कर सकूंगा यह एक बड़ा सवाल है. जब मैं सुदूर इलाकों में जाता हूँ और जिन लोगों से मिलता हूँ उन लोगों पर निगरानी रखी जाती है. पुलिस जाकर उन लोगों से पूछ ताछ करती है. इसको लेकर मैं काफी पशोपेश में हूँ. उन इलाकों में फिर से जाकर काम करने का मौक़ा मिलेगा या नहीं, तय नहीं कर पा रहा हूँ. वहां के लोगों से सलाह करके ही कोई फैसला कर पाऊंगा.

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